September 2025

ईश्वर-शक्ति चिंतन

“जिसने ईश्वर को देखा है, वह ईश्वर को व्यक्त नहीं कर सकता। यदि कोई ईश्वर को व्यक्त किया है इसका मतलब उसने ईश्वर को नहीं देखा।” आज तक प्राप्त जानकारी से हमें पता है कि ईश्वर के ऊपर, चिंतन करोड़ों वर्षों से होते रहा है। जिस किसी ने भी उस परम शक्ति ईश्वर से मन […]

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एक राजकुमार आया था- एकादश रामायण-01

एक राजकुमार आया थापिता के अनेक यतन से था।आते ही वह सबके मन को भाया थाब्रम्ह स्वयं राम रुप में आया थाऔर वह अकेले नहीं अनेंक सेवक तथाअपनी सदैव की सहयोगीनी एवं जगत मातामहामाया को भी साथ लाया था एक राजकुमार आया थास्वयं ब्रम्ह होकर मनुष्य का जीवन जीने आया थावह मनुष्य जीवन जीते हूए

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निष्काम कर्म का विशेष फल

निष्काम कर्म  के आरम्भ का नाश भी नहीं होता और उल्टा फल भी नहीं होता। थोडा-सा भी निष्काम कर्म  महान भय से तार देता है। अन्त काल का थोडा भी भजन-ध्यान तार देता है। अंतकाल का थोडा भी निष्काम भाव भी वृद्धि को प्राप्त होकर कल्याण करता है।                  स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज इंसान पूरे

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अधिक बल बुद्धि का नाश

एक ताकतवर को खत्म करने के लिए भगवान दूसरा पैदा करता है। यदि वास्तविकता में देखें तो यह प्रकृति का महामंत्र है। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥ ॥परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 4.7-8 ॥ जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती

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कमजोरी लक्ष्य में बाधा

“कभी भी ईश्वर इंसान को कमजोरी देकर पैदा नहीं करता। प्रकृति में इंसान अपनी कमजोरियां स्वयं पैदा करता है।“ किसी भी स्थिति में ईश्वर को दोष दे देते हैं लोग। ‌ ईश्वर को दोष देना बहुत आसान है। जबकि हमारे पूर्वजों ने अपना विचार प्रकट किया है कि ईश्वर किसी के सुख-दुखों में सम्मिलित नहीं

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मुफ़्त की चीजों पर विचार

मुफ़्त चीजें मिलती हैं तो उसकी कीमत आधी हो जाती है। मेहनत से पाई हुई चीज की कीमत ही ठीक तरीके से लगाई जाती है।सरदार श्री वल्लभभाई पटेल यह विचार है भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का। उनके बारे में विचार करने पर भी शरीर के रोम -रोम में कंपन होने लगता है।

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ईश्वर की प्राप्ति धर्म

मनुष्य जिस वर्ण,धर्म,आश्रम,संप्रदाय, वेश-भूषा आदि में है। वह वहीं रहते हुए परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज। स्वामी श्री ने स्पष्ट कहा है व्यक्ति किसी भी वर्ण धर्म आश्रम का पालन करता हो। किसी भी संप्रदाय से हो अथवा किसी भी वेशभूषा में रहने वाला हो। वह वहीं

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दुनियां में कितना गम है

गम की दुनिया बहुत बड़ी है। इतनी बड़ी की गम में पड़ा हुआ इंसान उसकी गहराई माप नहीं सकता। जो व्यक्ति गम में जी रहा होता उसे गम की दुनिया एक प्रकार से दलदल के समान प्रतीत होता है। इन्हीं भावनाओं को  यदि शायरी में व्यक्त किया जाए। कोई यह न सोचो, गम में सिर्फ

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