September 2025

गुरु ज्ञान और ईश्वर

गुर बिनु भव निध तरइ न कोई।जौं  बिरंचि  संकर  सम  होई॥ तुलसी बाबा गुरु के महत्व के बारे में कहते हैं:  गुरु के बिना कोई भी भवसागर पार नहीं कर सकता, चाहे वह ब्रह्मा जी और शंकर जी के समान ही क्यों ना हो। गुरु का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। गुरु के […]

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इंद्रियों की भोग शक्ति

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || २/५९ || भगवान श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन से कहते हैं –  देहधारी जीव इन्द्रियभोग से भले ही निवृत्त हो जाय पर उसमें इन्द्रियभोगों की इच्छा बनी रहती है | लेकिन उत्तम रस के अनुभव होने से ऐसे कार्यों को बन्द करने पर वह भक्ति

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मानव में त्रिगुण का जाल

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || २/४५ || भगवान श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन से स्पष्ट कहते हैं।वेदों में मुख्यतया प्रकृति के तीनों गुणों का वर्णन हुआ है ।हे अर्जुन! इन तीनों गुणों से ऊपर उठो | समस्त द्वैतों और लाभ तथा सुरक्षा की सारी चिन्ताओं से मुक्त होकर आत्म-परायण बनो ।

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अमृत छोड़ विष सेवन

एहि तन कर फल बिषय न भाई।स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥ ये श्री रामचरितमानस का बहुत चर्चित दोहा है। तुलसी बाबा यहां स्पष्ट कहते हैं।  हे भाई! इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषयभोग नहीं है। क्योंकि शरीर के सामने  स्वर्ग का भोग भी बहुत

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सफल होने में विशेष गुण

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ किसी किसी को धर्य बिल्कुल नहीं होता। हर समय जल्दबाजी करते हैं। कबीर दास जी सुंदर विचार प्रकट करते हैं। वे कहते हैं “रे मन आराम से, धीरे-धीरे सब कुछ होता है। बाग में माली एक पेड़ को सैकड़ो घड़ों से

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विचारों का अधार

जीव का  रूप, आचरण और विचार उसके प्रकृति को व्यक्त करता है। प्रकृति अपने आप में एक रहस्य है। लोगों ने अनेक एलियन के बारे में चर्चा सुना होगा। वैज्ञानिक कहते हैं ब्रह्मांड में ऐसे सैकड़ो पृथ्वी हो सकते हैं जहां पर जीवन हो।   यह सत्य बात है। यदि चिंतन-विचार करें आभास होगा की

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मंगल विचार सुमंगल फल

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ श्री गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं : जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ  अर्थात सुख और समृद्धि रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ विभिन्न प्रकार की विपत्ति-दुःख का वाश होता है। यह विचार प्रचलित है – जब व्यक्ति को धन ऐश्वर्य आता है

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बोए पेड़ बबुल के

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।नाथ पुरान निगम अस कहहीं।। समस्त ग्रंथों का सार श्री रामचरितमानस में तुलसी बाबा कहते हैं: पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि  सबके हृदय में रहती है। अर्थात अच्छी बुद्धि और दुष्ट बुद्धि सबके हृदय में रहता है। तुलसी बाबा अपने विचार से कहते हैं- अच्छा

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रामचरितमानस चिंतन-विचार

एहि महँ रघुपति नाम उदारा।अति पावन पुरान श्रुति सारा॥मंगल भवन अमंगल हारी।उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥ श्री तुलसीदास जी महाराज रामचरितमानस के लिए अपना विचार रखते हुए कहते हैं  : रामचरितमानस में श्री रघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, मंगल  करने वाला और अमंगल को हरने वाला है,

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