इस कहावत का गूढ़ अर्थ यह है कि जब किसी कार्य में असफलता मिलती है, तो व्यक्ति अपनी असमर्थता स्वीकार करने के बजाय बाहरी कारणों को दोष देता है। जैसे नृत्य करना न आना कोई असामान्य बात नहीं है – कोई भी हर क्षेत्र में दक्ष नहीं हो सकता। लेकिन दोष अपने अभ्यास या प्रयास में न ढूंढकर, आंगन की बनावट को दोषी ठहराना एक हास्यास्पद बचाव मात्र है।

यह प्रवृत्ति न केवल आत्मविकास में बाधक बनती है, बल्कि यह व्यक्ति की सोच और दृष्टिकोण को भी संकुचित करती है। आत्मविश्लेषण की बजाय दूसरों पर दोषारोपण करना, एक तरह से अपनी संभावनाओं से मुँह मोड़ लेना है।
कई बार व्यक्ति किसी क्षेत्र में थोड़ा बहुत ज्ञान प्राप्त कर लेता है, और उसे ही पूर्णता मान बैठता है। यह स्थिति और भी चिंताजनक होती है क्योंकि यहां व्यक्ति को यह भ्रम हो जाता है कि वह जानता है। जब वह उस अधूरे ज्ञान के बल पर कार्य करता है और विफल होता है, तब दोष अपने ज्ञान की कमी को देने के बजाय वह परिस्थितियों या सहायक व्यक्तियों पर थोप देता है।
आंगन टेढ़ा
समस्या तब और भी गंभीर हो जाती है जब व्यक्ति अपनी विफलता के बाद न केवल दूसरों को दोष देता है, बल्कि उस क्षेत्र से ही मुँह मोड़ लेता है और किसी नए क्षेत्र की ओर मुड़ जाता है – बिना यह समझे कि समस्या बाह्य नहीं, आंतरिक थी। यह स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि एक अस्थायी पलायन है। जब तक व्यक्ति आत्ममूल्यांकन नहीं करता, तब तक सफलता की कोई भी दिशा स्थायी नहीं हो सकती।
जब नाचने में मास्टरी ना हो तो आंगन को टेढ़ा बतला कर, अपने आप को संतुष्ट किया जा सकता है परंतु वास्तविकता को बदला नहीं जा सकता। कुछ ना जानना अथवा किसी क्षेत्र में थोड़ा जानना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’ आश्चर्य की बात तब होती है जब व्यक्ति उस क्षेत्र में विशेष अनुभवी बनने के बजाय सहायक को दोष देता है और दूसरे क्षेत्र में मुड़ जाता है।