दिल कभी जिद करता है, कभी हँसता है, तो कभी रो देता है। उसकी बेचैनी भी वैसी ही होती है मासूम, स्वाभाविक और अस्थायी। जैसे बच्चा खिलौना न मिलने पर रो देता है, वैसे ही दिल भी किसी अधूरे ख्वाब पर तड़प उठता है।
अगर हम हर बार उसके पीछे भागते हैं, तो हम अपनी हीं शांति से दूर हो जाते हैं। दिल को अगर अकेला छोड़ दिया जाए, उसे बस महसूस होने दिया जाए, तो ऐसे में एक समय आयेगा , जब वह खुद हीं थक जयेगा।
इसलिए महात्मा कहते हैं – दिल बेचैन है तो होने दो।
“दिल तो बच्चे के जैसा बचकानी हरकतें करता है और फड़फड़ाते रहता है।” अपने दिल के पीछे मत भागो। एक समय में बेचारा दिल भी परेशान होकर थक जाएगा। और उसके बाद अथाह चैन।
बिल्कुल सही।
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