अपने-अपने विचार से कुछ लोग श्रीमद् भागवत गीता के ऊपर प्रश्न उठते हैं। एक बहुत ही चर्चित श्लोक है “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” सभी धर्म का परित्याग करो और मेरी शरण में आ जाओ।
इसका अर्थ वे बताते हैं “सभी धर्म को छोड़कर कृष्ण का धर्म मान लो।” उस समय हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चियन इत्यादि कोई दूसरा धर्म था ही नहीं। फिर यहां धर्म की व्याख्या आज के धर्म के अनुसार कैसे हो सकता है।
वास्तव में अर्जुन कर्तव्य कर्म के फल को चिंतन कर युद्ध से पीछे हटने की सोच रहे थे। वहां पर भगवान श्री कृष्ण कहते हैं तेरा जो कर्तव्य धर्म है उसके फल की चिंता छोड़कर मेरे शरण में आ जा। तू चिंता ना कर तू सिर्फ कर्म योग का पालन कर, मैं तुझे पाप युक्त नहीं होने दूंगा।
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