मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
अगामापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || २/१४ ||
श्रीमद् भागवत गीता में सुख दुःख के ऊपर भगवान कितना सुंदर विचार रखते हैं। वे कहते हैं – हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है | हे भरतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे |
सबको सिर्फ सुख की तलाश है। सभीं सिर्फ आनंद की तलाश में भटक रहे हैं। क्या लगता है सुख और दुःख कोई अलग दुनिया के तत्व हैं? नहीं कतई ऐसा नहीं है। सुख और दुःख सिक्के के दो पहलू के बराबर है। यदि सुख आएगा तो उसके पीछे स्वत: दुःख चलकर आने वाला है। ऐसे हीं दुःख के पीछे भी सुख आता है।
सुख को कोई गुलाम नहीं बन सकता। सुख को कोई बांध के रख भी नहीं सकता। अपनें हिस्से का दुःख किसी को दे भी नहीं सकता और न हीं दुःख को मार कर भाग सकता है। यह मत सोचो कि दुःख सिर्फ तुम्हारे लिए चल कर आया है। ऐसा बिल्कुल नहीं है, अपना दुःख तो सबको दिखता है परंतु दूसरे का दुःख कभी किसी को दिखता नहीं।
सुख और दुःख तो वास्तव में सर्दी गर्मी जैसे मौसम के अनुसार आते हैं और आते रहेंगे। कोई आने-जाने का समय भी निश्चित नहीं कर सकता। इसलिए हमारे सिद्ध महात्मा कहते हैं तुम यदि सुख का उपभोग करोगे तो उसके पीछे दुःख को भी सहन करना होगा।
जैसे सिक्के में दो पहलू होते हैं एक पहलू के बिना सिक्का हो ही नहीं सकता। इस प्रकार सुख और दुःख भी दोनों सिक्के के बराबर है। इसे सरल भाषा में कहा जाए तो दुःख के बिना सुख का कोई अस्तित्व नहीं है। यह ऐसे ऐसे भी कहा जा सकता की सुख के बिना दुःख का भी कोई अस्तित्व नहीं है।
भगवान यहां कहते हैं जैसे सर्दी गर्मी को सहन करने के लिए तुम बराबर तैयार रहते हो। वैसे ही सुख और दुःख को भी सहन करने के लिए हमेशा तैयार रहो। यदि सामने आता है तो उसके साथ दो-दो हाथ करो। चक्कर चलेगा आज दुःख है तो कल सुख भी आएगा। लेकिन इस चक्र को कभी भूलो मत। बच्चा हमेशा बच्चा नहीं रहेगा। बच्चा रोज जवान हो रहा है। जवान रोज वृद्धावस्था की तरफ आगे बढ़ रहा है।
सुख और दुःख को सामान समझो। इनको सहन करना इंद्रिय का काम है। अपने मन को कभी विचलित न होने दो। सामने जो कर्तव्य कर्म है उसे बड़ी ही निष्ठा से करते जाओ। यदि नहीं कर सकते तो इसे करने की लगातार कोशिश करो। अपने विचार तंत्र को मजबूत करो। जरूर एक दिन तुम जीत जाओगे। फिर तो तुम्हें वास्तव में सुख और दुःख हंसी के जैसा लगेगा। अपने स्वभाव को कभी विचलित मत होने दो।
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