दिल में बसा ईश्वर का चिंतन कौन करै।
जब मोह-माया से फुर्सत मिलै तब करै।।
ईश्वर के चिंतक को निश्चित तौर पर मार्ग मिलता है। परंतु ईश्वर का चिंतक तो बनना पड़ेगा। जब ईश्वर से अटूट प्रेम होगा तब वह दिल में बस जाएगा।
वास्तव में सबको सिर्फ आनंद चाहिए। वह जो सिर्फ आज का आनंद है। वह आनंद जो आने के बाद भी शांति नहीं देता है। ऐसे में ईश्वर का विचार चिंतन कौन करें?
वेदांत का सार श्रीमद्भागवत गीता भी कर्मों के त्याग की बात नहीं करता। ना किसी सुख को स्वरूप से त्याग करने की बात करता। गीता तो अंतःकरण की विचार स्थिति को बदलने की बात करता।
श्रीमद्भागवत गीता जी कहती हैं – किसी भी सूरत में संपूर्ण कर्मों का त्याग असंभव है। कर्म का त्याग करके कोई भी कर्म से पिंड नहीं छुड़ा सकता। ईश्वर का चिंतन पाने के लिए मोह-माया को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ और सिर्फ मोह-माया का चिंतन-विचार छोड़ना है।
वेदांत कहता है – “मोह-माया के चिंतन-विचार को आसानी से छोड़ा नहीं जा सकता। परंतु एक भक्त की दृष्टि से देखें तो ईश्वर से दिल लगाकर मोह-माया के चिंतन-विचार को छोड़ा जा सकता है।”
वास्तव में यदि ईश्वर का चिंतक बनना है तो मोह-माया के चिंतन को फुर्सत देना होगा। यदि नहीं दे सकते तो ईश्वर का चिंतक बनने की कोशिश करना होगा। जैसे-जैसे ईश्वर का चिंतन बढ़ेगा वैसे-वैसे माया का चिंतन कम होगा। जिस दिन ईश्वर चिंतन में भक्त पूर्णतया डूब गया उसी दिन उसका कल्याण हो जाएगा।
ऐसा चिंतक बनने के बाद वह दुःख में तो ईश्वर का सुमिरन करेगा साथ में वह सुख में भी ईश्वर का चिंतन-विचार करता रहेगा। उसके बाद भक्त को भक्ति करने के लिए किसी सहारे अथवा माध्यम की आवश्यकता नहीं पड़ता। उसके बाद उसे ईश्वर चिंतन विचार के लिए मोह-माया से फुर्सत की आवश्यकता ही नहीं होगा।
यह एक बहुत ही गहन पाठ है, जो हमें याद दिलाता है कि सच्चा आध्यात्मिक मार्ग संसार से भागने में नहीं, बल्कि मन और हृदय को ईश्वर की ओर मोड़ने में है।
जी सही बात है…. सुन्दर! कमेंट आपके दिल को प्रदर्शित करता है। आपका विशेष धन्यवाद!🙏
💐