सुख का दुश्मन

भोगैश्र्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||२/ ४४ ||

Sukh Ka Dushman

अर्थात श्रीमद् भागवत गीता में भगवान कहते हैं – जो लोग इन्द्रियभोग तथा भौतिक ऐश्र्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्त होने से ऐसी वस्तुओं से मोहग्रस्त हो जाते हैं, उनके मनों में भगवान् के प्रति भक्ति का दृढ़ निश्चय नहीं होता।

मनुष्य जन्म से हीं अपने इंद्रियों के भोगों के प्रति आकर्षित होते जाता है। एक तरीके से कहा जाए जीव जन्म से हीं अपने इंद्रियों  भोगों के लिए ही जीवन को जीता है। इसे सरल भाषा में और कहा जा सकता है कि जीव अपने इंद्रियों का गुलाम है।


जन्म के उपरांत से ही जीव सांसारिकता के बंधन में और गहरे होते जाता है। पहले सिर्फ उसके शुभचिंतक बनते हैं और बाद में भोगों के चक्कर में दुश्मन भी बन जाते हैं। यहां करीब से चिंतन करें तो पता चलता है की मित्र बनाना उसकी आवश्यकता परंतु दुश्मन बनाना उसकी मजबूरी।

शास्त्र इन्हीं बातों को अलग-अलग करके प्रस्तुत करता है। मनुष्य जितना भोग और ऐश्वर्या के करीब है उतना हीं वह ईश्वर से दूर है। जब मनुष्य का ईश्वर से लगाव होता है। जब मनुष्य को ईश्वर से प्रेम होता है ऐसे में वह धीरे-धीरे सांसारिकता से दूर होते जाता है। धीरे-धीरे वह संसार में रहकर हीं व्यक्ति संसार से अलग हो जाता है और ईश्वर के नजदीक पहुंच जाता है।

यहां पर भगवान अपने विचार से कहते हैं कि मनुष्य भोग और ऐश्वर्यादि से ग्रसित हो जाता है। अर्थात एक प्रकार से भोग और ऐश्वर्यादि रूपी रोग उस व्यक्ति को जकर लेता है।  इसलिए ही वह अपने ईश्वर के प्रति दृढ़  निश्चय नहीं कर पाता।

इसलिए हमारे पूर्वजों ने, भारतीय दर्शन के महान महात्माओं ने अनेंक जगह अनेकों प्रकार से कहा है। अपनें ईश्वर से दिल लगाओ। अपनें ईश्वर से प्रेम करो। संसार में सुख-भोग दुःख का सबसे बड़ा कारण है। इसे यदि मुख्य कारण कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

लोग सुख की तलाश में जाते तो हैं वे यह भी भूल जाते हैं कि दुःख ना होना भी सुख है। इस दृष्टि से जिसके जीवन में जितना सुख और भोग के प्रति आकर्षण जितना कम होगा  , उसके जीवन में सुख की स्थिरता उतना अधिक होगा। इसे और सरल भाषा में कहें तो ऐसा भी कहा जाएगा।  वह उतना ज्यादा सुखी होगा अथवा उतना ज्यादा सुखी रहेगा।

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