एहि महँ रघुपति नाम उदारा।
अति पावन पुरान श्रुति सारा॥
मंगल भवन अमंगल हारी।
उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥
श्री तुलसीदास जी महाराज रामचरितमानस के लिए अपना विचार रखते हुए कहते हैं : रामचरितमानस में श्री रघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, मंगल करने वाला और अमंगल को हरने वाला है, जिसे पार्वती जी सहित स्वयं भगवान शिव सदा जपा करते हैं।
चिंतन-विचार करें! श्री रामचरितमानस में है क्या? क्यों श्री रामचरितमानस को लोग भगवान की तरह पूजते हैं? इसका विश्लेषण करें तो सटीक पता चलेगा। परंतु मैं अपने पाठक मित्रों से आग्रह करूंगा कि वे स्वयं चिंतन और विचार करें। क्योंकि ईश्वरीय शक्ति को समझना है तो जब तक ईश्वर की चिंता में डूबेंगे नहीं तब तक संभव नहीं।
रामचरितमानस में जो विशेष है वह यह की राम जी के चरित्र का व्याख्यान है। सबको पता है रामायण कथा हीं राम चरित्र के रूप में तुलसी बाबा ने प्रस्तुत किया था। रामायण अर्थात जहां राम के रहने का स्थान है। इसीलिए श्री राम के साथ-साथ राम चरित्रमानस का भी पूजा होता है।
आश्चर्य की बात है कुछ लोग कुछ लोगों के द्वारा लिखे हुए उपन्यास ग्रंथ अथवा भ्रमयुक्त शब्दों से भ्रमित हो जाते हैं। जबकि रामायण के ऊपर किसी भी भ्रम से पहले यह विचार करना चाहिए। श्री राम की पूजा अथवा श्री राम चरित्र मानस की पूजा यह संसार किसी के द्वारा बाध्य होकर नहीं करता है।
स्वयं भगवान श्री राम ने भी अपने आप को भगवान कभी नहीं कहा। पूरे जीवन में उन्होंने किसी भी कर्म का अपना श्रेय नहीं लिया। एक समय हनुमान जी के प्रश्न के उत्तर में वह स्वयं कहते हैं “वास्तव में मैं कुछ करता ही नहीं, जो कुछ भी करती हैं वह जग जननी श्री सीता जी करती है।” राम जी ने कभी नहीं कहा कि मेरी पूजन करो।
राम जी ने कभी नहीं कहा मैं सबसे बड़ा ईश्वर हूं। अथवा श्री राम जी ने यह भी नहीं कहा कि मैं हीं आखिरी भगवान हूं अथवा देवदूत हूं। भगवान श्री राम कोई आकाश से उत्पन्न होकर नहीं आए थे। यह तो हमारे अपने पूर्वजों में से एक हैं। यह संसार ऐसे हीं राम को राम नहीं मानता। राम जी का चरित्र इतना पावन और पवित्र है यह संसार उन्हें साक्षात ब्रह्म का स्वरूप मानता है।
उनके भक्त बार-बार कथाओं के जरिए तथा अपने चिंतन-विचार में उनके गुना का बखान करते हैं। उनके भक्तों ने यह प्रमाणित किया किस राम जी ने जो किया वह भगवान के सिवा और कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। यह संसार राम को अपनी स्वेच्छा से भगवान मानता है।
राम का चरित्र इतना उत्तम है की राम के कर्म को समाज के अंदर समस्त सुकर्मों का मापदंड माना जाता है। भक्त कहते हैं भगवान का चर्चा होता है। चिंतन होता है, विचार होता है। भगवान स्वयं वहां उपस्थित हो जाते हैं अथवा उपस्थित रहते हैं। रामायण को भगवान का मन भी कहा गया है। जिसने रामायण को अपने मन में बसा लिया उसके अंदर राम भी बस जाते हैं और वह भी राम के अंदर बस जाता है।
तुलसी बाबा कहते हैं यह रामायण समस्त वेद-पुराण ग्रंथों का सार है। यह रामचरितमानस मंगल को करने वाला तथा अमंगल का नाश करने वाला है। यह रामायण वह रामायण है जिसके देवता भगवान भोलेनाथ के दिल में वास करते हैं।” उमा सहित जेहि जपत पुरारी।” उमा के साथ-साथ स्वयं भगवान शंकर जिनका सदैव जाप करते हैं।
प्राचीन काल से राम को भजने वाले तथा राम के प्रति श्रद्धा रखने वाले। रामचरितमानस को सर्वोत्तम ग्रंथ मानने वाले। राम चरित्र को सर्वोत्तम मानने वाले। बड़े-बड़े महात्माओं के साथ संपूर्ण जगत राम को पूजते हुए आ रहा है। जो राम को भजते हैं अथवा जो राम को भगवान मानते हैं। उनके ऊपर नहीं लगाया जा सकता।
मैंने कहा- उन्होंने कभी किसी के द्वारा डंडे के बल पर राम को भगवान नहीं कहा।
चंद्र भ्रमित लेखकों के द्वारा लिखे गए। समाज में फैलाए गए भ्रम के द्वारा राम के ऊपर प्रश्न चिन्ह अथवा राम के को मानने वाले के ऊपर प्रश्न चिन्ह नहीं खड़ा किया जा सकता। यदि विचार करें चिंतन करें तो स्वयं समझ जाएंगे कि सदियों से महान लोगों की आलोचनाएं होते रहा है। कुछ भ्रमित लोग स्वयं तो भ्रम में रहते हैं और जगत में भ्रम फैलाने का काम करते हैं। वास्तव में राम जी शंकर जी का भजन करते हैं और शंकर जी राम जी का भजन करते हैं।
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