सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
समस्त ग्रंथों का सार श्री रामचरितमानस में तुलसी बाबा कहते हैं: पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि सबके हृदय में रहती है। अर्थात अच्छी बुद्धि और दुष्ट बुद्धि सबके हृदय में रहता है।
तुलसी बाबा अपने विचार से कहते हैं- अच्छा और बुरा प्रत्येक इंसान में रहता है। जिसके अंदर अच्छा की मात्रा ज्यादा होता है उसके ऊपर अच्छाई का प्रभाव ज्यादा रहता है। जिसके अंदर बुराई ज्यादा होता है उसके ऊपर बुराई का प्रभाव ज्यादा होता है।
इसे ऐसे भी समझा जा सकता है जो व्यक्ति बुराई का अनुसरण करता है। वह ज्यादातर बुराइयों से लिप्त होता है। उसका विवेक अच्छाई छोड़कर बुराइयों को अपनाने की सलाह देता है। अर्थात सीधी तौर पर बुराई युक्त बुद्धि उसके द्वारा ना चाहने पर भी अपना कार्य कर लेती है।
ठीक इसी प्रकार जो व्यक्ति सदैव अच्छाइयों का अनुसरण करता है। वह स्वयं अच्छाइयों से लिप्त होता है। उसका विवेक बुराई को बुराई मानता है। उसका विवेक बुराई को छोड़कर अच्छाई को अपनाने का सलाह देता है। अर्थात सीधी तौर पर अच्छाई युक्त बुद्धि उसके द्वारा न चाहने पर भी बुराई युक्त कार्य नहीं करने देती।
व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसका फल भी वैसा ही उसके सामने आता है। जो बुराई से लिप्त होकर कार्य करेगा तो निश्चित तौर पर उसका फल भी वैसा ही उसके सामने आएगा। इसी तरह जो अच्छाई को लेकर कर्म करेगा तो निश्चित तौर पर उसके परिणाम भी उसके सामने अच्छे आएंगे। इसलिए यहां कहां जा रहा है “बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से पाए।”
हमारा कर्म खेत और बीज के जैसा है। जैसे बीज डालते वक्त मौसम को भी देखा जाता है। खेत की साफ सफाई भी देखी जाती है। सब कुछ अच्छा होने पर भी बीज का गुणवत्ता भी देखा जाता है। अगर सब कुछ अच्छा है और बीच अच्छा नहीं है तो उसके द्वारा फसल भी अच्छा नहीं होगा।
अगर किसी को यह पता ही ना हो जो बीज हम डाल रहे हैं। वह दरअसल आम का नहीं है बबुल का है। किसी को यदि भ्रम है की बबुल का बीज डालकर हम आम का पेड़ उत्पन्न कर देंगे। तो वहां दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख होगा। क्योंकि प्रकृति में ऐसा नहीं होता जो करोगे वही पाओगे।
जैसे स्वास्थ्य खराब होता है तो अच्छी चीजों का सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा हो जाता है। ऐसे ही यदि बुरे चीजों का सेवन करने से स्वास्थ्य खराब भी होता है। इसी तरह व्यक्ति के अंदर अच्छे कर्म और बुरे कर्म फलते और फूलते हैं। वह स्वयं जानता है यह समझ सकता है। वह जो खाद पानी डाल रहा है वह अच्छे कर्म में डाल रहे हैं अथवा बुरे कर्म में। इसी संतुलन को सिद्ध करने के लिए हमारे महात्माओं ने बार-बार कहा है “बोए पेड़ बबूल की तो आम कहां से पाए।”