विचारों का अधार

जीव का  रूप, आचरण और विचार उसके प्रकृति को व्यक्त करता है। प्रकृति अपने आप में एक रहस्य है। लोगों ने अनेक एलियन के बारे में चर्चा सुना होगा। वैज्ञानिक कहते हैं ब्रह्मांड में ऐसे सैकड़ो पृथ्वी हो सकते हैं जहां पर जीवन हो।

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यह सत्य बात है। यदि चिंतन-विचार करें आभास होगा की धरती से बाहर क्या धरती पर करोड़ों लोक मौजूद है।
एक दुनिया के अंदर करोड़ दुनिया है जिसे हम अपनी आंखों से देखते हैं पर मानने को तैयार नहीं होते।

इस धरती पर जी जीव के साथ हमारी भावनाएं जितना जुड़ा हुआ होता है हम उसके बारे में उतना चिंतन करते हैं। बंदर, कुत्ता, मछली, पक्षी इत्यादि। ऐसे करोड़ जीव है जिनकी अपनी दुनिया है जिनके बारे में कोई सोचता नहीं।

यदि अनेक जीवों को करीब से देखें तो पता चलता है सबकी एक अपनी दुनिया है। एक चींटी जो फौज की तरह चला करती है। फैक्ट्री में जैसे कार्य होता है उसे प्रकार के अपना कार्य किया करती है। फौजी जैसे डिसिप्लिन में रहता है वैसे ही चींटीयां भी अपने नियम पर काम किया करती है।

पानी के अंदर समंदर का दृश्य अनेक लोगों ने देखा होगा। मछली एक झुंड में चला करती है उनका नियंत्रण वे स्वयं करती है। आसमान में पक्षी एक दिशा में परेड करती हुई चलती है। उनके बीच जरा सा भी फासला काम ज्यादा नहीं होगा। उस तरीके का परेड करने के लिए फौजी को भी लंबा ट्रेनिंग लेना पड़ता है।

इस धरती के जी कोने में जिस तत्व के साथ जीव जन्म लेता है वह प्रायः वहीं के लिए है और वही उसकी दुनिया है। तत्व कहने का अर्थ यहां पर है प्रकृति। पानी में रहने वाला जीव बाहर नहीं रह सकता। बाहर रहने वाला जीव पानी में नहीं रह सकता।

मच्छर पानी से उत्पन्न होता है परंतु पानी में वापस जाएगा तो मर जाएगा। सर के अंदर बालों में जो जूं होता है वह अपनी तरह का एक अलग प्राणी है। ऐसा प्राणी सिर्फ बालों में ही होता है।

प्रकृति के इन जीवों को यहां कहने का तात्पर्य क्या है अथवा दिखाने का तात्पर्य क्या है? वह यह कि व्यक्ति जिस प्रकृति के साथ रहता है वह उस प्रकृति के अनुसार ढल जाता है। यदि उसी प्रकृति में उसका जन्म हुआ हो फिर वह अपने प्रकृति के विपरीत कैसे हो सकता है।

हमने लेख का शुरुआत  विचारों से किया। प्रकृति के आधार पर हीं व्यक्ति का विचार निर्भर करता है। मानव में ऐसा भी देखने को आया है कि जो जिस विचार का होता है वैसी प्रकृति में रहना पसंद करता है। यदि किसी का जन्म विशेष प्रकृति में हुआ है तो वह निश्चित तौर पर अपनें प्रकृति के अनुरूप होगा और अपने प्रकृति को प्रस्तुत करेगा।

शास्त्र इसीलिए बार-बार कहता है
जैसा अन्न वैसा मन।

अर्थात जो जैसा भोजन करता है उसका मन भी वैसा हीं होता है। इसे दूसरे तरह से कहा भी जा सकता है। जिसका जैसा मन होता है वह उसके अनुरूप अन्य अथवा भोजन का सेवन करता है।

कोई अच्छे के साथ रहता है तो अच्छा प्रकृति है और वह दूसरे के साथ भी वैसा ही अच्छा व्यवहार करता है। कोई बुरे के साथ रहता है अथवा बुरे प्रकृति का अनुसरण करता है उसका व्यवहार भी उसी प्रकार का होता है। जिसका जैसा प्रकृति में संलिप्तता वैसा उसका विचार।

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