अमृत छोड़ विष सेवन

एहि तन कर फल बिषय न भाई।
स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥

amrut chhod vish sevan


ये श्री रामचरितमानस का बहुत चर्चित दोहा है। तुलसी बाबा यहां स्पष्ट कहते हैं।  हे भाई! इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषयभोग नहीं है। क्योंकि शरीर के सामने  स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अंत में दुःख देने वाला है। अतः जो लोग मनुष्य शरीर पाकर विषयों में मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृत को बदलकर विष पी लेते हैं।

हमारा शास्त्र सिद्धांत कहता है 84 लाख योनियों के चक्कर लगाने के उपरांत अंत में मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। यह सिद्धांत हमारे पूर्वजों द्वारा प्रमाणित है। वैसे कुछ ऐसा भी मत है जो यहां नहीं मानते की पुनर्जन्म होता है।

यदि कोई पुनर्जन्म के सिद्धांत को खंडित करता है तो उसे यह भी सोचना पड़ेगा। अन्य जीवों को छोड़ दें तो सिर्फ मानव में ही कितने प्रकार के जन्म हैं। कोई फुटपाथ पर जन्म लेता है।  कोई किसी बहुत बड़े अधिकारी अथवा किसी बहुत बड़े धनवान के घर जन्म लेता है। कोई ऐसा भी है जिसे सुख मिलता है कोई ऐसा है जिसे दुःख भी मिलता है।

ऐसा भी गरीब लाचारी व्यक्ति है जिसने जीवन में कभी सुख को स्पर्श नहीं किया। अगर पुनर्जन्म नहीं होता तो निश्चित तौर पर सभी मानव का जन्म एक समान स्थिति में होता। सबको दुःख भी बराबर मिलता और सुख भी बराबर मिलता। परंतु समाज में ऐसा नहीं है। कुछ ऐसे भी हैं जो सदैव सुख की कामना करते हैं और दुःख से परेशान हो जाते हैं।

वैसे जीवन में सुख और दुख एक सिक्के के दो पहलू के समान हैं। ऐसा भी नहीं है कि भगवान से सुख देगा और दुःख भोगने के लिए अलग से संसार बना कर रखेगा। यदि करीब से विचार करें तो धरती के प्रत्येक जीव के अंदर सुख और दुःख है।

सुख का सिद्धांत कहता है-  “मेरा भोग बहुत संभल के करो। मेरे जाने की एक समय निश्चित है। क्योंकि मेरे पीछे दुःख खड़ा हुआ है। मैं जैसे जाऊंगा वैसे हीं दुख प्रस्तुत हो जाएगा। सुख कहता है मुझे अंधा बनकर मत भोगो। क्योंकि ऐसे में मेरे जाने के बाद दुःख को झेलना भारी पड़ेगा।

दुख का सिद्धांत कहता है- “मैं आया हूं इसलिए परेशान ना हो। मैं परमानेंट नहीं रहूंगा। मेरे रहने की एक समय अवधि है। मेरा समय जैसे पूरा होगा वैसे ही मैं यहां से निकल जाऊंगा। मेरा दुःख इसलिए लग रहा है क्योंकि तुमने सुख का भोग किया है और यह सोचा था कि दुःख नहीं आएगा। दुःख वापस कहता है यह भी सत्य है!  मैं जाऊंगा मेरे बाद सुख आएगा और मैं फिर पलट के आऊंगा।

एक दृष्टि से देखें तो सुख और दुःख दोनों एक ही बात कहते हैं। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है किस सुख की हम तमन्ना करते हैं और दुःख को दूर करने की कोशिश करते हैं। या तो हम सुख को खींच कर लेकर आते हैं या फिर सुख के हम करीब जाते हैं। कभी-कभी तो हम जहां सुख समझ का जिसके पीछे जाते हैं वहां दुःख निकलता है।

सुख और दुख जीवन का वह खेल है जिसे कोई झूठला नहीं सकता। छोटे बड़े अमीर गरीब कोई भी रहने दो। यह सुख और दुःख किसी भी सूरत में किसी का पीछा नहीं छोड़ने वाले हैं। इसीलिए यहां तुलसी बाबा कहते हैं “स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥” स्वर्ग का आनंद भी बहुत थोड़ा है। स्वर्ग का आनंद लेने के बाद वापस इसी धरती पर पटक दिए जाओगे।

आज जी दुःख से भाग रहे हो , वापस यही दुःख तुम्हारा पीछा करेगा और तुम भागते रहोगे। क्योंकि जिस सुख के पीछे भाग रहे हो वास्तव में उसके पीछे दुःख छुपा हुआ है। बहुत बार तो सुख मृग मरीचिका की भांति होता है। दूर से सुख का बहुत बड़ा प्रतिबिंब दिखता है। करीब गए तो वहां कुछ नजर नहीं आता।

बेचारा वहां जाकर कहता है अच्छा भला मैं वही बढ़िया था। परंतु आगे बढ़ाने के बाद पीछे लौट ना कभी होता नहीं। ना बचपन लौटेगा न जवानी लौट वाली है। जीवन को करीब से देखा तो पता चलता है मौत का तूफान बहुत तेजी से बढ़ते हुए आ रहा है।  इसलिए हमारे पूर्वजों ने कहा है सुख में इतना ना डुबो की पता ना चले कब दुःख में हम डूब गए।

दुःख से बार-बार निकलोगे और वापस दुख में फेंक दिए जाओगे। इसलिए वेदांत कहता है ” सुख में डुबो मत सुख को जियो। दुःख में दुःखी ना हो उसके ऊपर शोध करो। जीस सुख को तुम अमृत समझ कर पी रहे हो वास्तव में वह दुःख का द्वार है।

इसलिए हमारे महात्माओं ने कहा है कि यह तन संसार के विषय भोगो में लगाकर समाप्त करने के लिए नहीं है। अपने इस शरीर का उपयोग करो।  सुख और दुःख को सामान समझो। यह जीवन ईश्वर का नाम लेकर अपना जन्म सफल करने के लिए है। अमृतसर समझ कर विषय का सेवन ना करो।

यदि कोई यहां कहे कि हम सुख में सुख से जिए क्यों नहीं?  आप जियो ना यहां कौन मना कर रहा है। परंतु यह सोचो यदि दुख से लड़ने में यदि तुम मास्टर हो गये। तुमने यदि दुःख में भी आनंदित होकर जीना सीख लिया।  दुःख के ऊपर तुमने विज्ञान की जैसा सोचा शुरू कर दिया। एक दिन निश्चित तौर पर तुम अपने दुःख पर विजय प्राप्त कर लोगे।  ऐसे में यहां तुम्हारा गया क्या? सुख में जीने की बात तो है हीं है दुःख से भी प्रेम करने लगो।

यदि दुःख से प्रेम हो जाए तुम अपनी आंखों से देखोगे सुख और दुःख दोनों तुम्हारे सामने बैठे हुए हैं। सुख भी तुम्हें देखकर हंसेगा और दुःख भी तुम्हें देखकर हंसेगा। ऐसी स्थिति में तुम सुख और दुःख दोनों से अलग होगे। वहां पर तुम अपने ईश्वर का शुक्रिया अदा करोगे। तुम्हें यह आभास हो जाएगा कि ना तुम्हें सुख से प्रेम है ना दुःख से प्रेम है तुम्हें तो उसे अपने ईश्वर से प्रेम है।

यह विषय सुनकर अथवा किसी से लेने से नहीं होगा। यह विषय एक शोध है, यहां किसी के सहायता की कोई जरूरत नहीं है। जिस ईश्वर को मानते हो बस उसके पीछे पड़े रहो। यकीन मानो यदि तुमने उससे प्रेम कर लिया तो वह तुम्हें निराश नहीं करेगा। कल्पना करो उस छन को जिस समय इस स्थिति को प्राप्त हो जाओगे। स्वर्ग और नरक,  सुख-दुख सब  तुम्हारे लिए एक खेल लगेगा।

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