मानव में त्रिगुण का जाल

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || २/४५ ||

मानव में त्रिगुण का जाल
  1. भगवान श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन से स्पष्ट कहते हैं।वेदों में मुख्यतया प्रकृति के तीनों गुणों का वर्णन हुआ है ।हे अर्जुन! इन तीनों गुणों से ऊपर उठो | समस्त द्वैतों और लाभ तथा सुरक्षा की सारी चिन्ताओं से मुक्त होकर आत्म-परायण बनो ।

    अर्थात भगवान कहते हैं वेद तीन गुण का वर्णन करता है। जिसे सात्विक राजसी और तामसी कहा गया है। पहले सात्विक गुण की बात करते हैं । सात्विक गुण वह है जिसमें स्थित व्यक्ति परलोक के सुखों को ध्यान में रखकर कर्म करता है। अर्थात वह मरने के उपरांत स्वर्ग में अथवा अन्य उत्तम लोक की कामना से कम करता है।  ऐसा सात्विक पुरुष परलोक के सुखों के लिए इस लोक में दुःख तक उठा लेता है।

    राजसी गुण वह है जिसमें स्थित पुरुष इसी जन्म में आनंद को दृष्टि में रखकर संपूर्ण कर्मों को करता है।  राजसी गुण में स्थित पुरुष किसी परलोक को ध्यान में रखकर कर्म नहीं करता। उसका सोच इसी जीवन में संपूर्ण सुखों को प्राप्त कर लेना होता है। ऐसा पुरुष आज के सुख को पाने के लिए दूसरों को दुःख तक देने को तैयार हो जाता।

    तामसी गुण वह है जिसमें स्थित पुरुष सिर्फ शारीरिक भोगों के ऊपर केंद्रित रहता है। मन और शरीर की इच्छाएं अनंत है। ऐसा पुरुष समाज के अंदर मान, मर्यादा, ऐश्वर्य तथा धन को इकट्ठा करके उसका भोग करना इस प्रकार के भावनाओं से दूर रहता है। तामसी पुरुष इस जीवन में सदैव भोग करना है यह भी नहीं सोचता। वह सिर्फ अभी की बात सोचता है। वह सिर्फ यह सोचता है कि आज उसे सुख कैसे मिलेगा। यह एक प्रकार से अज्ञानता को दर्शाता है।

    सबको पता है आज के लिए आज को सुधारा नहीं जा सकता। आज जो भी कोई भोग कर रहा है उसके पीछे उसी के द्वारा किया गया भूतकाल का परिणाम है। आज वह जैसा कर्म करेगा इसी के आधार पर उसका भविष्य निर्भर करेगा। वर्तमान से वर्तमान को कोई सुधार नहीं सकता। आज वर्तमान में यदि वह मेहनत करता है, परिश्रम करता है, त्याग करता है तो उसका फल निश्चित तौर पर भविष्य में मिलेगा।

    भगवान यहां स्पष्ट करते हैं हे अर्जुन! तू इन तीनों गुणों से ऊपर सोच। सब प्रकार के मेरा-तेरा लाभ-हानि सब कुछ का त्याग कर । तू अपने मस्तिष्क को सभीं प्रकार के द्वन्दों से मुक्त कर दें। तू सिर्फ अपने आत्मा का अनुसरण कर। तू चिंता ना कर निश्चित तौर पर तू इसमें विजय प्राप्त करेगा। वह कहते हैं कि यह तीनों गुण एक प्रकार से भ्रमित करते हैं। तीनों गुण अपने-अपने तरीके से अपने फल के प्रति खिंचाव प्रस्तुत करते हैं। जिसके कारण व्यक्ति स्वतंत्र होकर सोच नहीं पता।

    जब तू इन गुनों से ऊपर होकर सोचेगा तब तेरा जो विचार होगा वह शुद्ध होगा। ऐसे सोच से तू जो कुछ भी करेगा वह उत्तम करेगा। ऐसे सोच से तू जो कुछ भी करेगा उसमें भूल नहीं होगा। भगवान यहां कहते हैं तो किसी का अनुसरण मत कर।  यहां तक की तू अपने शारीरिक आवश्यकताओं को भी ध्यान में मत रख। तू सभीं चिताओं को छोड़कर  विचार कर। तू चिंता ना कर निश्चित तौर पर तू जो करेगा उसमें सफल होगा।

2 thoughts on “मानव में त्रिगुण का जाल”

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