गुरु ज्ञान और ईश्वर

गुर बिनु भव निध तरइ न कोई।
जौं  बिरंचि  संकर  सम  होई॥

Guru gyan aur Ishwar

तुलसी बाबा गुरु के महत्व के बारे में कहते हैं:  गुरु के बिना कोई भी भवसागर पार नहीं कर सकता, चाहे वह ब्रह्मा जी और शंकर जी के समान ही क्यों ना हो। गुरु का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है और बिना ज्ञान के परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती।

उनके कहने का तात्पर्य है यहां यह है कि गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। जब तक गुरु के प्रति समर्पण ना हो। जब तक गुरु के प्रति आदर भाव ना हो। तब तक भक्त उनके विचारों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं कर पाता।

आज के समय भी देखने को मिलेगा। जो बच्चा स्कूल में टीचर के प्रति सम्मान नहीं रखता अथवा टीचर के आज्ञा का पालन नहीं करता वह कभी भी शिक्षण में आगे नहीं मिलेगा। ऐसा उद्दंड बालक कभी भी पढ़ने में तेज नहीं होता है। सिर्फ नाम के लिए गुरु बनाने का कोई मतलब नहीं है।

यदि अपने गुरु बनाया है तो गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव होना चाहिए। तुलसी बाबा गुरु को भगवान भोलेनाथ के सदृश प्रस्तुत करते हैं। रामायण में राम जी अपने से बड़ा भगवान शंकर को मानते हैं। यानी की गुरु देवता से भी बड़ा है।

इसका दृष्टिकोण समझने के लिए गुरु और भगवान दोनों को विस्तार रूप से समझना आवश्यक है। हमारे वैदिक परंपरा में गुरु मंत्र आथवा गुरु ज्ञान का प्रचलन है। आज के समय लोग बुढ़ापे में भी गुरु बनाया करते हैं। परंतु प्राचीन काल में छोटे बच्चे में ही एक गुरु के छत्रछाया में भेज दिया जाता था। बच्चे को यह पूर्ण रूप से शिक्षा थी कि आप ईश्वर से भी अपने गुरु को बड़ा मानो।

क्योंकि समर्पण कभी भी एक समय दो स्थानों पर नहीं हो सकता। यदि ऐसा हुआ तो समर्पण का पद्धति फेल हो जाएगा। देवता और गुरु दोनों एकदम अलग-अलग हैं। एक प्रकार से देवता परलोक में है और गुरु इस लोक में है। जब तक गुरु के शब्दों में स्वीकारता नहीं होगा तब तक ईश्वर के प्रति समर्पण भी नहीं हो सकता।

जो निराकार ईश्वर है उसे भक्त अपने भक्ति के जरिए सिद्ध करता है। भक्त अपने अतः प्रेम-भक्ति भाव से उस निराकार ईश्वर को अपने सामने साकार रूप में देखता है।
जबकि जिस समय गुरु  सामने भक्त प्रस्तुत होता है गुरु उसके सामने पूर्ण रूप से विद्यमानरहते हैं।

वास्तव में गुरु भी उस परमात्मा का अंश कहा गया है जीस परमात्मा के पास हमें गुरु के सहारे पहुंचना है। वास्तव में परमात्मा को पाने के लिए दृष्टि तो एक ही चाहिए। वह दृष्टि है गुरु के अंदर संपूर्ण ब्रह्मांड को देखना। जिस दिन भक्त के अंदर यह आभास हो जाता है कि परम शक्ति परमेश्वर सर्वव्यापी है उसी दिन वह एक प्रकार से ईश्वर को पा लेता है।

परंतु इस दृष्टि को पाने के लिए गुरु के प्रति श्रद्धा परम आवश्यक है। बात यहां ध्यान में रखनी पड़ेगी। गुरु दृष्टि नहीं देता गुरु दृष्टि का ज्ञान देता है। उस ज्ञान के अंदर डूब कर अभ्यास करने का काम भक्त का होता है। आज के समय तो गुरु भी एक प्रकार से प्रचलन के लिए बनाए जाने लगे हैं। जितना बड़ा गुरु उतना बड़ा चेला।

आज के समय अधिकतर जब गुरु सामने रहते हैं तो भक्त अपना भाव प्रकट करता है नहीं तो वह अपने आप में रमा रहता है। हां यहां यह भी निर्भर करता है कि गुरु बनाने के पीछे भक्त का उद्देश्य क्या हो? यदि सिर्फ भौतिक सुखों को प्राप्त करना है तो फिर ईश्वर के मार्ग में कोई आगे कैसे बढ़ सकता है।

ऐसा भी है यदि कहीं आज के समय कोई गुरु हीं भौतिक सुखों में फंसा हुआ है तो वह ईश्वर का मार्ग कैसे बता सकता है। परंतु इसका पहचान करना एक पहुंचे हुए भक्त की बस की बात है। कुछ भी हो गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण आवश्यक है। किसी भक्त ने यह दिल निश्चय कर लिया कि उसे भगवान की प्राप्ति करनी है तो निश्चित तौर पर वह अपने अनुसार गुरु का भी खोज कर लेता है।

जिस दिन उसे वे गुरु मिल जाते हैं वह यह मानता है कि उसे साक्षात ईश्वर मिल गए। यानी कि ऐसी स्थिति में तुलसी बाबा का कथन स्वत: सिद्ध हो जाता है। क्योंकि एक दृष्टि से देखे तो स्पष्ट होता है। हमारे वैदिक क्रिया में पूजन भजन जो कुछ भी कहा गया है। वह सभी अंतःकरण के भाव को शुद्ध करने के लिए अथवा वैसे भाव को प्रस्तुत करने के लिए कह गए हैं।

क्योंकि वैदिक कोई भी क्रिया  हो उस क्रिया में यदि भाव का समर्पण ना हो, भाव ना हो तो वह क्रिया करना व्यर्थ है। बिना भावना के किया गया कोई भी पूजन-भजन अथवा सत्य कार्य कभी फलित नहीं होता। इस दृष्टि से कोई भी भक्त विचार कर सकता है कि उसकी भावना कहां लिप्त है। यदि कहीं दूसरी जगह लिप्त है तो वह कहां कोशिश कर रहा है लगाने के लिए।

हमारे शास्त्रों में एकलव्य की घटना सबको पता है। यदि गुरु के प्रति समर्पण हो तो वह पत्थर की मूर्ति बनाकर भी उससे ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ऐसे में यदि गुरु के प्रति समर्पण ना हो तो गुरु बनाकर अपने आप को भ्रम में डालना भी वैदिक दृष्टि से भ्रम में रहना हुआ। गुरु आपके‌ उत्तम भौतिक कार्यों को छोड़ने की बात कभी नहीं करता। गुरु को स्वीकार करें। गुरु के  प्रति स्वीकारता होगा तो भाव अपने आप शुद्ध हो जाएगा।

वास्तव में वैदिक सिद्धांत में गुरु और परमात्मा दोनों अलग है हीं नहीं। क्योंकि वैदिक दृष्टि है ईश्वर सर्वत्र है, सर्व व्यापी है। समाज में प्रचलित है ईश्वर कण-कण में विद्यमान है। ऐसे में विचारनिय है बात है जब गुरु हीं किसी को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं वह ईश्वर की सत्ता कैसे स्वीकार सकता है। इसीलिए तुलसी बाबा कहते हैं गुरु के ज्ञान बिना भगवान की प्राप्ति नहीं।

 

2 thoughts on “गुरु ज्ञान और ईश्वर”

  1. शायद इसमें वर्तनी की त्रुटियाँ हैं। ‘निध’ का क्या अर्थ है? तुलसी बाबा ‘रहते’ हैं, या ‘कहते’ हैं? और संभवतः सबसे बड़ी भूल है ‘अनवस्था दोष’ ! सवाल यह है कि गुरु की पहचान कौन कर सकता है? और यदि कोई कर सकता है तो उसे गुरु की आवश्यकता ही क्या और क्यों होगी! यह एक ऐसा चक्रव्यूह, ऐसी भूलभुलैया है जिससे निकल पाना बहुत मुश्किल है। कोई आपको मार्गदर्शन तो दे सकता है किन्तु उस मार्गदर्शन की समीक्षा तो आपको करना ही होगी। औपचारिक रूप से सांसारिक विषयों में कोई आपका मार्गदर्शन कर सकता है, लेकिन जीवन, “मैं” नामक वस्तु क्या है इसे कोई किसी को कभी नहीं समझा सकता। और जब तक हममें जिज्ञासा और धैर्य न हो तब तक गुरु कौन है, इसका कोई मतलब नहीं।

    1. जी सही कहा आपने! वर्तनी की त्रुटी है। समय के अभाव के कारण इसका मुझे खेद है। आवश्यकता तलाश का रूप लेता है। कितना भी महान गुरु हो परंतु बीज का स्वरूप कोई बदल नहीं सकता। सही कहा आपने कोई मार्गदर्शन दे सकता है। परंतु मार्गदर्शन को समझने वाला व्यक्ति भी होना चाहिए। “मैं” संसार रूपी भावना का वह जाल है जिसे व्यक्ति बचपन से स्वयं अपने लिए तैयार करता है। ज्ञान,जिज्ञासा और धैर्य न होने कारण व्यक्ति जाल को तोड़ना चाहता है और तोड़ नहीं पाता है। जी सही कहा आपने! जिज्ञासा और धैर्य के बिना गुरु का कोई मतलब नहीं है। आपके विचार उच्च कोटि के हैं। आपके हर एक शब्द का हृदय से सम्मान है। आपके विचार के लिए विशेष आभार एवं धन्यवाद ! 🙏

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