मुफ़्त चीजें मिलती हैं तो उसकी कीमत आधी हो जाती है। मेहनत से पाई हुई चीज की कीमत ही ठीक तरीके से लगाई जाती है।
सरदार श्री वल्लभभाई पटेल
यह विचार है भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का। उनके बारे में विचार करने पर भी शरीर के रोम -रोम में कंपन होने लगता है। यह वह महापुरुष रहे जिन्होंने सिर्फ देश के लिए जिया। सिर्फ देश के लिए ही किया। शायद आज पटेल साहब होते तो देश की दिशा और दशा दोनों कुछ और होता।
यह वह महापुरुष नहीं थे जिन्होंने पढ़ा और उसके बाद बोला। इन्होंने अपने इच्छाओं की पूर्ति के लिए महात्मा गांधी को कभी बाध्य नहीं किया। पटेल भाई देश के उन महान दाताओं में है जिन्होंने सिर्फ देश को दिया है।
उन्होंने समाज के सामने जो बोला वह प्रामाणिकता के अनुसार बोला। सरदार भाई कहते हैं मुफ़्त की चीजें जो मिलती है उसकी कीमत आधी हो जाती है। कारण मुफ़्त की चीजों में व्यक्ति का पसीना नहीं बहता। अचानक मिली हुई वस्तु पर व्यक्ति चिंतन विचार भी नहीं करता।
सरल भाषा में कहें तो अपने आप आई हुई चीजों का लोग सम्मान नहीं करते, जैसा सम्मान उसकी तब करता है जब वह तकलीफ से मिलता है। यह सब कहने के पीछे उनका उद्देश्य था भाई कुछ भी करो हरामखोरी करके पैसे मत कमाओ। ऐसी चीजें है तुम्हें कभी आनंद नहीं देने वाली है। मुफ़्त के चक्कर में अपने ज़मीर को मत मारो।
परिश्रम से आई हुई वस्तु का मोल परिश्रम करने वाला व्यक्ति हीं समझ सकता है। एक कहावत है पीर पराई क्या जाने दर्द क्या होता है। जिसने मेहनत करके कोई फल प्राप्त किया है उसकी वास्तविक कीमत तो उसके पास हीं है। बहुत बार ऐसा होता है कोई आई हुई वस्तु का सरलता से त्याग कर देता है परंतु बाद में चला पता चलता है वह तो सोने से भी ज्यादा कीमती था।
अर्थात व्यक्ति बिना परिश्रम के आए हुए वस्तु को वह भाव नहीं देता जिसका वह हकदार होता है। जैसे आज के समय किसी ने पैसे से नौकरी खरीद लिया। जैसे किसी व्यक्ति को बनी बनाई पार्टी का मालिकाना हक मिल जाए। जैसे कोई दहेज मैं एक राज्य पा जाए। ऐसे समाज में आम नागरिक का क्या हाल होता है आप समझ सकते हैं।
ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण हो सकते हैं। काबिलियत से आई हुई कामयाबी का लोग जष्न मनाते है। जबकि गाल करके प्राप्त की हुई वस्तु पर लोग अधिकार जमाते हैं। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि पाप का घड़ा धीरे-धीरे भरता है और एक दिन वह फूटता भी है। पाप का घड़ा फटने में टाइम लग सकता है परंतु फटना जरूर है।
इसलिए पटेल साहब ने जो कहा है उसका अर्थ होता है। परिश्रम से आए हुए वास्तु का वास्तविक कीमत तो परिश्रम करने वाले के पास हीं होता है। ऐसा फल सदैव उपयोगी होता है और व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर चलाते हुए आगे लेकर जाता है।