ईश्वर कहां नहीं

ईश्वर कहां नहीं,जगत के कन-कन में भगवान।
जिनका गुणगान करते थकते नहीं वेद पुराण।।

eeshvar kahaan nahin

विज्ञान इस ब्रह्मांड को गुरुत्वाकर्षण के बल पर संचालित होने की बात करता है। परंतु ईश्वर का सत्ता स्वीकार नहीं करना चाहता क्योंकि वह ईश्वर नजर नहीं आता। वेद विज्ञान से पहले से कहता  हुआ आ रहा है , एक चींटी को जो सुनने की शक्ति है वह ईश्वर है। मनुष्य के अंदर सोचने, समझने और कार्य करने की जो शक्ति है वह ईश्वर है।

जिस पंचतत्व से सृष्टि का निर्माण हुआ है वह सभीं तत्व के पीछे जो शक्ति है वह ईश्वर है।  संपूर्ण जगत दूसरे का सुनकर मान लेता है ईश्वर कैसा है परंतु वेद ईश्वर को प्रस्तुत करता है वह कैसा है।

ब्रह्मांड के अंदर जो सबसे छोटा तत्व परमाणु है उसकी शक्ति भी वह ईश्वर है। जो प्रकृति एक विशेष स्थिति में जीव को उत्पन्न करती है उस प्रकृति के पीछे कि जो शक्ति है वह ईश्वर है।

आज का विज्ञान जिसे करके अपना पीठ थपथपाता है वेद में जिसे ईश्वर का मुख कहा गया है वह सब कुछ पहले प्रस्तुत कर चुका है। वेद कोई एक पद्धति नहीं है , वेद तो स्वयं ईश्वर को देखने के लिए, समझने के लिए, संपूर्ण प्रकृति को समझने के लिए , इस धरती का महा विज्ञान है। वेद सर्वत्र ईश्वर को देखने के लिए चक्षु प्रदान देता है।

इस जगत में लोगों को आश्चर्य बहुत कुछ दिखता है। परंतु यह मानने को वह तैयार नहीं होते हैं कि जो आश्चर्य है वही भगवान है। जो आश्चर्य है वही ईश्वर है। यह सब को पता है इस धरती के बाहर भी एक बहुत विशाल जगत है। इस संपूर्ण जगत को बनाने वाला कोई साधारण कैसे हो सकता है। वेद एक महान शक्ति की ओर इंगित करता है। विज्ञान महान शक्ति समझकर अंततः रुक जाता है।

दिल से देखो! विज्ञान की दृष्टि से देखो! वेद की दृष्टि से देखो! दुनियां के कण कण में भगवान दिखेंगे। परंतु जो जानकर देख कर समझ कर जो यह मानने को तैयार नहीं कि भगवान सर्वत्र हैं उन्हें कोई बता नहीं सकता। जिन्होंने भगवान को कण-कण में मानव भी साधारण व्यक्ति नहीं रहे। फिर एक साधारण व्यक्ति उन्हें कैसे समझ सकता है।

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