“जिसने ईश्वर को देखा है, वह ईश्वर को व्यक्त नहीं कर सकता। यदि कोई ईश्वर को व्यक्त किया है इसका मतलब उसने ईश्वर को नहीं देखा।”
आज तक प्राप्त जानकारी से हमें पता है कि ईश्वर के ऊपर, चिंतन करोड़ों वर्षों से होते रहा है। जिस किसी ने भी उस परम शक्ति ईश्वर से मन लगाया हुआ है , अथवा जिसने ईश्वर के करीब जाने की कोशिश किया। कोई ऐसा भी नहीं मिला जिसने कहा हो कि “उसने ईश्वर को देखा है। “
जबकि वेद यह स्पष्ट रूप से कहता है, “जिसने ईश्वर को देखा है, वह ईश्वर को व्यक्त नहीं कर सकता। यदि कोई ईश्वर को व्यक्त किया है इसका मतलब उसने ईश्वर को नहीं देखा।” ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि आज तक ईश्वर को किसी ने नहीं देखा। मित्रों इसका चिंतन और फैसला आप करो तो ज्यादा उत्तम होगा।
वेद शास्त्र यह भी कहता है, संसार में प्राप्त दृष्टिगोचर होने वाले समस्त स्वरूपों के पीछे जो शक्ति है , वह शक्ति ईश्वर है। हवा को हमने कभी नहीं देखा फिर भी मानते हैं हवा है। आधुनिक युग में बिजली को किसी ने नहीं देखा परंतु बिजली की शक्ति सबको पता है।
हमें इस बात का अनुभव है एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। एक समय दोनों नजर नहीं आता। यदि ईश्वर का अस्तित्व समझ में आ जाए तो ईश्वर भी समझ में आ जाएगा। रात के बिना दिन का अस्तित्व नहीं है। देवता के बिना दानव का अस्तित्व नहीं है। बुरा के बिना अच्छे के अस्तित्व कल्पना करना संभव नहीं।
आज तक हमने ईश्वर के बारे में अनेंक सुना है। ईश्वर के बारे में पढ़ा भी बहुत है। यहां पर एक विशेष प्रश्न उठता है । वह प्रश्न यह है ईश्वर के बारे में सुनकर, पढ़कर भी क्या हम उस ईश्वर के ऊपर पूर्ण रूप से भरोसा करते हैं? क्या ऐसा है कि आपके अंदर कोई सवाल ना हो ईश्वर के लिए? क्योंकि सिद्धांत यही कहता है , सुनी सुनाई बातों पर लोगों को कभी भी यकीन नहीं होता। बीच मझधार में हो , कोशिश करोगे तो किनारा मिल जाएगा।
आप क्या सोचते हो ईश्वर के बारे में , आप अपने भगवान को किस नाम से ,किस रूप से याद करते हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उस ईश्वर ने अपना नामकरण कभी नहीं किया। उस ईश्वर का नाम और रूप देने वाले हमारे और आपके जैसे लोग हीं हैं। मैं समझता हूं यह लेख बहुत गहरा पर विषय है। आप यकीन करो, मेरा इरादा आपको बीच मझधार में छोड़ने की अथवा बीच मझधार में लेकर जाने की नहीं है।
लगभग मैंने करीब से देखा है, इंसान को सब कुछ उसके अनुसार से चाहिए। कोई कहता है “स्वयं को पहचानो , स्वयं को पहचानो।” मैं कहता हूं स्वयं को पहचानना बहुत कठिन है। स्वयं को पहचानने के लिए स्वयं से अलग होना पड़ेगा। स्वयं से अलग होने के लिए सांसारिक विषयों से पूर्ण रूपेण विरक्त होना पड़ेगा। यह कहना बहुत आसान है , परंतु ऐसा करने में अच्छे-अच्छे तपस्वियों के पसीने छूट जाते हैं।
आप तपस्वी नहीं हो, यदि आप मानते हो तपस्वी हो तो निःसंकोच तपस्या करो। कुछ भी हो आपको शोधक तो बनना पड़ेगा। ईश्वर के प्रति मार्ग पर स्वयं चलना होता है। किसी का साथ और नहीं किसी का हाथ काम में आता है। जो भी मिले माध्यम बनाओं और आगे बढ़ो।
इसलिए मैं कहता हूं ईश्वर के अस्तित्व का चिंतन करें। कुछ छोड़ना नहीं है, कुछ पकड़ना भी नहीं है। स्वयं से ईश्वर के ऊपर शोध करें। इस संसार में जिस तत्व के अंदर उर्जा दिखता है, वह सभीं ऊर्जा शक्ति ईश्वर है। संक्षेप में कहूं कि जहां कहीं भी आपको किसी चीज के अंदर कोई शक्ति दिखाता है, वह शक्ति संपूर्ण रूप से ईश्वर की शक्ति। आप इसे और एक अलग तरीके से समझ सकते हैं। प्रत्येक जीव के अंदर प्राण रूपी शक्ति मौजूद है। जीस प्राण के ऊपर शरीर के सभी अंग काम करते हैं। आज तक उस प्राण को किसी ने नहीं देखा।
यह आपको भी ज्ञात होगा , वह प्राण कितना बड़ा है और कितना छोटा, यह भी किसी को ज्ञात नहीं। एक हाथी के अंदर स्थित प्राण और एक चींटी के अंदर स्थित प्राण, दोनों प्राण शक्ति समान है। चिंतन करो, मेरे कहने के ऊपर भी मत जाओ। वास्तव में मैं कहूं तो तुम्हारे बुद्धि को वहां नहीं जाना है, उस ईश्वर के पीछे तुम्हारे मन को जाना है। उस ईश्वर के पीछे तुम्हारे अपने अनुभव को जाना है। जब स्वयं से स्वयं का प्रयास करोगे, यह अनुभव होगा वास्तव में ईश्वर सर्वत्र है, संपूर्ण ऊर्जावान वस्तुओं पर ईश्वर का पूर्ण रूपेण सत्ता है। जिस दिन यह बात तो समझ में आएगा दुनिया रोती रहेगी और तुम हंसते रहोगे। क्योंकि उस दिन ईश्वर का अनुभव स्वयं से स्वयं का होगा।
विज्ञान ईश्वर के चमत्कार को स्वीकार नहीं करता। परंतु विज्ञान जीस शक्ति को समझ नहीं पता उसे परम शक्ति अथवा अज्ञात शक्ति कहकर संबोधित करता है। जब ईश्वर के लिए स्वयं से स्वयं शोध किया जाए तो यह आभास होगा वहीं शक्ति तो ईश्वर है। इसलिए मैं कहता हूं दूसरे क्या कहते हैं, दूसरे किसी ने कहा कि भगवान ऐसा है, वैसा है, कैसा है जाने दो। ईश्वर का चिंतन करो, जिधर नजर जा रहा है उस नजारे के पीछे देखने की कोशिश करो। पत्थर में भी अपना शक्ति है , क्योंकि पत्थर जब अपना शक्ति छोड़ देता है तब वह चूर्ण के रूप में परिवर्तित हो जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो उस ईश्वर की हीं शक्ति है , बरगद का बीज की शक्ति। अपने अंदर बहुत विशाल बरगद को समेटे हुए हैं। यहां ऐसा भी कह सकते हैं कि वह छोटा सा बीज, उस ईश्वर की शक्ति लेकर एक विशाल बरगद का रूप धारण करता है। उस ईश्वर की शक्ति से आगे चलकर असंख्य बरगद उत्पन्न करता है। इसलिए यदि ईश्वर की प्राप्ति करना है तो स्वयं से ईश्वर का चिंतन करो। दूसरे का चिंतन किया हुआ नाम और दूसरे का चिंतन किया हुआ स्वरूप तुम्हारे किसी काम का नहीं है।
अगर नाम और स्वरूप मिला हुआ है, तो उस नाम और स्वरूप के भी पीछे जाओ। क्योंकि नाम तो एक पहचान है। स्वरूप एक सुंदर सा नजारा है। उदाहरण के तौर पर ऐसा चिंतन करो, छोटा सा बालक जब मुस्कुराते हुए तुम्हारी तरफ देखा है , तो यह विचार करो वह ईश्वर तुम्हें कितना प्यार से मुस्कुराते हुए देख रहा है। उस मुस्कुराते हुए बच्चे के देखने के पीछे जो शक्ति है वही तो ईश्वर है।
चिंतन करो, रात दिन ईश्वर का चिंतन करो, स्वयं से स्वयं का चिंतन करो और उस ईश्वर से हजारों प्रश्न करो। एक दिन तुम्हें हर प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा। ईश्वर किसी एक का नहीं है जो सिर्फ एक ही सुनता है। बड़े-बड़े महात्माओं के करीब जितना ईश्वर था वह तुम्हारे भी उतना हीं करीब है।
Dear Ved
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