आत्मा का रहस्य – 01

किसी के बस में नहीं होता कि निकलने के बाद वह वापस उस शरीर में प्राण डाल दें। कारण सबको पता है आत्मा किसी का गुलाम नहीं होता। वास्तव में अपना शरीर भी किसी का गुलाम नहीं है। यदि बड़ी की से देखे तो पता चलता है शरीर सिर्फ और सिर्फ प्रकृति का गुलाम है।

Aatma Ka Rahasy


दुनिया में वर्षों से शरीर के साथ-साथ आत्मा बहुत बड़े शोध का विषय रहा है। हमारे महान महात्माओं हमारे पूर्वजों ने अनेक तरीके से अनेक बार आत्मा और शरीर के ऊपर शोध किया। आज भी आत्मा और शरीर में जिसकी रुचि है वह शोध का विषय मानते हैं वे कोशिश करते हैं अधिक से अधिक समझने के लिए।

हम यहां किसी दूसरे आत्मा की बात नहीं कर रहे । हम तो आपकी आत्मा और आपके शरीर की बात कर रहे हैं। कहते हैं धरती पर 84 लाख प्रकार के जीव रहते हैं। आपको क्या लगता है जितने प्रकार के जीव हैं क्या उतने प्रकार की आत्माएं भी होती हैं। आपको क्या लगता है आपका आत्मा और आपके सामने वाले का आत्मा दोनों अलग-अलग हैं। यदि आत्माएं सब की अलग-अलग है तो यह आत्माएं कौन से कारखाने में बना करती है।


हम आपको आत्मा और शरीर के विषय से अलग नहीं होने देंगें। अपनी आत्मा को समझने के लिए संसार के सभी आत्माओं को समझना होगा। अपने शरीर की भाषा अथवा शरीर की क्रिया को समझने के लिए। संसार के सभी जीवों का जो शरीर है उन सभी को समझना होगा। परंतु यदि एक-एक कर सभी जीवो की आत्मा को समझने में लगा जाए तो शायद करोड़ों जन्मों में भी हम आत्मा को नहीं समझ पाए।

अपने संसार में देखा होगा अनेक बार अनेक लोग ऐसे मिल जाते हैं जैसे लगता है उनके पास अनेक आत्मा गुलाम है। अनेक बार किसी ने अपने आप को प्रस्तुत किया होगा कि वह आत्माओं को अपने इशारों पर नचाया करता है। श्रीमद् भागवत गीता के माध्यम से भगवान कहते हैं आत्मा को कोई जला नहीं सकता, आत्मा पानी में भीग नहीं सकता, आत्मा को सुख या नहीं जा सकता। आत्मा ना जन्मता है और नहीं आत्मा मरता है।

ऐसे में क्या आपको यह लॉजिक अच्छा लगता है अथवा उन व्यक्तियों के लॉजिक पर विश्वास होता है। कि किसी ने अनेक आत्माओं को अपना गुलाम बना रखा है। क्या हम ईश्वर की बातों को झूठ ला सकते हैं। जब कोई आत्मा गुलाम बन सकता है तो वह आत्मा को किसी मृत शरीर में प्रवेश भी कर सकता है।

वेदांत तो आत्मा को साक्षात ईश्वर का अंश मानता है। वही वेदांत कहता है उसे ईश्वर को देखने वाला किसी को साबित नहीं कर सकता है कि मैं ईश्वर को देखा है। जो संसार में चिल्ला कर कहता है कि मैं ईश्वर को देखा है वह वास्तव में ईश्वर को देखा होता ही नहीं। यह उदाहरण हमने आत्मा के लिए कहा है।


एक तरीके से आत्मा को कोई गुलाम नहीं बन सकता। आत्मा को कोई देख भी नहीं सकता कहता है कि मैं आत्मा को देखा है। निश्चित तौर पर उसमें आत्मा को नहीं देखा। ऐसा नहीं है कि किसी ने आत्मा को देखा ही नहीं। परंतु यह कैसे हमारी ही बातों को हम कैसे काट सकते हैं। वास्तव में आत्मा अनुभव करने की चीज है। आत्मा अनुभव में तो आ सकता है परंतु व्यक्त नहीं किया जा सकता। आत्मा के विषय पर हम चर्चा कर सकते हैं चिंतन कर सकते हैं। जो आत्मा को देखने का दावा करता है वह वास्तव में संसार को भ्रम में डालकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। मेरे कहने का तात्पर्य आप समझ गए होंगे।

आत्मा और शरीर दोनों एक सिक्के के दो पहलू के जैसा हैं। एक के बिना एक का अस्तित्व नहीं है। ऐसे में आत्मा और शरीर का संयोग कैसे होता है और क्यों होता है। मरने से सबको डर लगता है। मृत्यु इस संसार का अब तक का सबसे बड़ा रहस्य है। मृत्यु के ऊपर से पर्दा उठाने का अनेक लोगों ने कोशिश किया। एक लोग मृत्यु का रहस्य समझने के लिए आज भी लगे हुए हैं। परंतु मृत्यु का रहस्य अब तक कोई समझ नहीं पाया। हम यहां समझने की कोशिश करेंगे,  आखिर मृत्यु और जीवन का सच्चाई क्या है।

हम चिंतन करेंगे और निष्कर्ष तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे की आत्मा का कार्य क्या है और शरीर का कार्य क्या है। मित्रों सच्चाई बहुत कड़वा होता है। कहते हैं ज्ञान की बात सबको अच्छा नहीं लगता। ज्ञान उसे ही अच्छा लगता है जिसके अंदर स्वत पहले से ज्ञान भरा हुआ होता है। हम यहां चिंतन के माध्यम से सभी का समय बिल्कुल खोटी नहीं करेंगे। ईश्वर ने निश्चित तौर पर कुछ तो हमें दे रखा है जिसके ऊपर हम विस्तार से बात को रखने आए हैं।


जैसे आपने अनेक बार सुना होगा घर में किसी की मृत्यु होता है। तो लोग कहते हैं वह व्यक्ति आसपास भटकता है। अभी अनेक प्रकार से डरा करते हैं। परंतु आपने कभी सोचा है मरा हुआ व्यक्ति अपने ही सगे संबंधियों के पीछे क्यों आता है। क्यों घर का एक-एक आदमी उसे मरे हुए व्यक्ति से डरा करते हैं। उसे मोहल्ले अथवा कॉलोनी में और भी अनेक लोग रहा करते हैं। परंतु वह मरा हुआ आत्मा किसी दूसरे के पीछे नहीं जाता।


व्यक्ति ने अनेक बार कहा होता है फलाना दुश्मन है। उसे व्यक्ति से बचकर रहना परंतु वही व्यक्ति जब मर जाता है तो वह अपनों के पीछे ही क्यों पड़ जाता है। यह बहुत चिंतन का विषय है। इस विषय पर सबको सोचना चाहिए।

उदाहरण कहता है जो खोजना है वह पता है। जो कोशिश करता है वह हासिल भी करता है। जो दरवाजा खटखटा आएगा उसका दरवाजा खुलेगा भी। परंतु यह जीवन और मृत्यु की बात है से हमें स्वयं ही समझने का कोशिश करना पड़ेगा। यहां किसी दूसरे का कोशिश कोई काम नहीं आएगा।

अगले भाग में आपको मिलेगा आत्मा मरने के बाद अपनों के पीछे ही क्यों पड़ा करती है। करने के बाद उसे दुश्मन के पीछे क्यों नहीं पड़ती जिन दुश्मनों को दिखा दिखा कर हमें सचेत किया करती है। वह आत्मा यदि करने के बाद दुश्मनों के पीछे पड़ जाए तो कितना अच्छा होता। फिर तो हमारे दुश्मन दुश्मन नहीं रह जाएंगे। मरने के बाद आत्मा दुश्मनों के पीछे क्यों नहीं जाती। आत्मा और शरीर की बातें बहुत गहरी है, दोस्तों यदि विषय से ऊब जाएं तो भी पढ़ना ना छोड़े। इस लेख में वह सब मिलेगा जो आपके जीवन को आनंद में बनाएगा।

शेष भाग 02 में पढ़ें

 

4 thoughts on “आत्मा का रहस्य – 01”

  1. Dear Ved
    I was able to somehow catch up with WordPress blogs & and I’m happy to read your post.
    Thank you very much for liking my post, ‘Sacrifice’. 🙏❤️

    1. Dear Sir,
      I’m so glad you connected with WordPress blogs; it’s always a pleasure to hear from you! 😊
      Thank you for reading my post, and I’m really honored that you liked it.
      Your post was very touching. Thank you for your like and comment! 🙏

      Best wishes,
      Vedant

  2. Vedansh.. The topic on which you have written is in itself very interesting. I agree that it’s not an object and can’t be enslaved. The soul, even after leaving the body, appears to be deeply influenced by the relationships it cultivated in life, both positive and negative. Whereas, I was of a different opinion. Your promise to explore why the soul pursues kin and not foes will be an excellent way to dissect the nature of karma and attachment beyond the physical body.

    1. Thank you for your thoughts! Your perspective is very important and thought-provoking. It is true that the soul’s bonds are not limited to the body—they are deeply connected to relationships, values, and actions. Your suggestion that I will delve deeper into this topic is an inspiration for me. The soul’s ability to stay close to loved ones and away from enemies perhaps indicates that the force of love and attachment is deeper and more stable than others. Your support and sensitive perspective further enrich this reflection. 🙏🙏

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