भाग दो में हमने पढ़ा आत्मा और शरीर एक सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना एक का अस्तित्व नहीं।
आगे यह जानने की कोशिश की आत्माएं सिर्फ अपनों के पीछे क्यों पड़ती है। आत्मा मरने के बाद किसी दुश्मन के पीछे क्यों नहीं पड़ती जिससे उसके अपनों का भला हो सके।
इस बात को भली-भांति समझने के लिए पहले हमें कुछ और समझना चाहिए। क्या वाकई में आत्मा होती है और यदि हां तो फिर वह किसी के पकड़ में क्यों नहीं आता। और यदि आत्मा नहीं होता है फिर वह क्या है जिसके शरीर से निकलने के बाद शरीर निष्क्रिय हो जाता है। आत्मा है और होती है यह बात आप एक बार नहीं अनेक बार सुन चुके हैं।
सबके दिलों में एक वहम है फलाना आत्मा फलाने के पीछे पड़ी है। क्या आप जानते हैं आज तक आपने जाने अनजाने में कितने हत्याएं करी हैं। 84 लाख प्रकार की धरती पर जीव बताए गए हैं। फूल चौरासी लाख जीवों में मच्छर कीड़े मकोड़े तथा अन्य प्रजाति के छोटे जीव भी हैं। क्या उन जीवों की आत्माएं नहीं होती। क्या कोई ऐसा रहेगा कि छोटे जीव की आत्मा नहीं होती। यदि बड़े जीव की आत्मा की बात करें तो फिर बड़े जीव भी अनेक प्रकार के हैं। जैसे हाथी बैल बड़ी मछली तथा अनेक प्रकार के जीव।
आत्मा को समझने के लिए इन सब जीवों के आत्माओं के ऊपर चिंतन करना होगा। हमारे हाथों से अनेक बार अनेक मच्छर मरे। कभी कोई मच्छर की आत्मा हमारे पीछे नहीं पड़ीं। जो नॉनवेज खाया करते हैं वे न जाने अपने पूरे उम्र में कितने जीवों को खो गए। परंतु कोई जीवों की आत्मा उनके पीछे नहीं पड़ी। यदि दुनिया का लॉजिक कहता है की आत्मा पीछे पड़ जाया करती है। ऐसे में जिन्होंने एक जीव की हत्या करी उसे जीव का उसे व्यक्ति के पीछे पड़ना ज्यादा समझदारी वाला बात लगता है।
मैं अपने पीछे बातों को फिर दोहराऊंगा। यह जगत में प्रचलित है आत्माएं परायों के पीछे नहीं अपनों के पीछे ही दौड़ा करती है। यह बिल्कुल उल्टा लगता है, उल्टा लगता क्या है यह उल्टा है। यदि मैं सीधे शब्दों में कहूं आत्मा होती है परंतु वह किसी के पीछे नहीं पड़ती। इस समय सिद्ध करूंगा, संक्षेप में कारण सबको पता है आत्मा आज तक सिर्फ सुना गया है। आत्माओं की सिर्फ कथा व्यक्त की गई है।
ऐसा क्यों होता है, ऐसा कैसे जब आत्मा को किसी ने देखा ही नहीं फिर इतने सारे आत्माएं चर्चा में कैसे आ जाता है। जो सिद्ध महात्मा हुए अथवा हमारे वेद पुराण स्पष्ट कहते हैं। मन ही संसार है अर्थात यदि मन निकाल दे अथवा मन जो भावना है उसे निकाल दें फिर कोई चिंतन नहीं।
मछली में सेंस नहीं होता एक मछली दूसरे मछली को खाता है। मछली को इस बात का डर नहीं है कि उसकी आत्मा उसके पीछे पड़ जाएगा। वैसे धरती पर अनेक ऐसे जीव हैं जो अपने स्वरूप के जीव का भकछन नहीं करते। अर्थात विचार करें जिन जीवों का अपनें जाति के प्रति भावना है वह उन जीवों का संघार करने से डरते हैं अथवा संघार नहीं करते हैं।
जैसे शेर! दूसरे शेर से लड़ता तो है परंतु दूसरे शेर का मांस नहीं खाता। कुछ जीव धरती पर ऐसे हैं जो अपने ही जाति के जीव को मार कर खाते हैं। ऐसे जीव इतिहास में कभी पालतू नहीं हुए। कारण ऐसी जीवों के पास सेंस नहीं होता अथवा कह सकते हैं भावना नहीं होता।
हम समझने के और करीब चलते हैं। गांव मोहल्ले में यदि कोई मरता है तो सुनकर हमें दुख पहुंचता है। परंतु वह दुख उतना ही दिखता है अथवा महसूस होता है ,जितना मरा हुआ इंसान करीब होता है। हमने कभी देखा नहीं है तो फिर दुख भी नहीं होता। यदि हमने देखा है और उसके साथ यदि हमारी भावनाएं जुड़ी हुई होती है तो वह दुख होता है और कितने दिनों तक दुख होता है।
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यही हाल जब घर का कोई गुजर जाता है। यदि हमने गुजरते हुए नहीं देखा है अथवा हमारा उससे प्रेम संबंध नहीं है तो भी उतना दुख नहीं होता। यदि हमारे सामने कोई अपने शरीर का त्याग करता है अथवा जिससे हम प्रेम युक्त भावनाओं में बंधे हुए रहते हैं वह एक दोनों महीनो तक हम उसके चिंतन में रहते हैं। इसे एक तरीके से और समझा जा सकता है हम रास्ते से रोज गुजरते हैं। हमने रास्ते में अनेक मरे हुए जीव अथवा एक्सीडेंट भी देखे होंगे।
कोई दूसरा जीव मरा हुआ रहता है उसके लिए हमारे दिल में कोई दर्द नहीं उत्पन्न होता। परंतु कोई मानव किसी एक्सीडेंट का शिकार होता है उसके लिए हमारे अंदर अनेक भावनाएं उत्पन्न होता है। और यदि वह व्यक्ति हमारा अपना करीबी हो तो वह महीना और सालों तक भावनाओं में आते रहता है। क्यों कहे कि वह तो मर जाता है परंतु वह भावनाओं में आते रहता है, वह भावनाओं में जिंदा रहता है।
यहां चिंतन का विषय है मरा हुआ व्यक्ति भावनाओं में आता है अथवा हम उसे भावनाओं में लाते हैं। अपने भावनाओं पर हमारा अपना कब्जा है। तुम्हारे भावनाओं पर किसी दूसरे का कब्जा नहीं है। अथवा हमारा अपनी भावनाएं किसी दूसरे का गुलाम नहीं है। हमारी भावनाएं सिर्फ हमारा गुलाम है।
मैं कहूं कि नहीं हमारी भावनाएं हमारे गुलाम नहीं है तो भी मानना पड़ेगा। आप सच में पड़ जाएंगे यह कैसे। यह ऐसे की भावनाएं हमारे गुलाम नहीं है बल्कि हम अपने भावनाओं के गुलाम हैं। बचपन से एक मजबूत भावना ने हमें गुलाम बना रखा है। एक ऐसा मजबूत भावना जिसे बनाने वाले स्वयं हम हैं। हमने अपने भावनाओं का निर्माण स्वयं किया है। यहां आश्चर्य वाली बात है हमने अपने भावनाओं का निर्माण तो किया है परंतु भावनाओं को तोड़ना हमारे बस की बात नहीं है।
वास्तव में आत्मा और शरीर का संयोग से हम क्रिया होते हुए देखते हैं। और शरीर को एक भावना जाकर लेता है। कहीं की जब शरीर एक भावनाओं के कैद में चला जाता है उसके बाद हमारी अपनी भावनाएं प्रतिक्रिया देने लगता है। वेदांत इसकी भावना से छूटने के लिए रास्ता बताता है। अथवा हम यह भी कर सकते हैं की भावनाओं से निकलने के लिए ही बड़े-बड़े महात्माओं ने अनेक यत्न किए। प्राचीन काल से ही महात्माओं अनेक प्रकार के अनुसंधान किये।
आते हैं जो इस भावनाओं से निकल जाता है वह अमर हो जाता है। क्योंकि शरीर इस प्रकृति से मिला है और प्रकृति का है। आत्मा आता है और शरीर के साथ खेल-खेल कर चला जाता है। आत्मा जिसे कोई मार नहीं सकता , आत्मा सदैव के लिए अमर है। वास्तव में हमारे द्वारा निर्मित भावनाओं का ही खेल है कि हमें लगता है की आत्माएं हमारा पीछा कर रही है। आत्मा किसी का पीछा नहीं करता। रास्तों में हमारी भावनाएं ही हमारी पीछा किया करती है।
तीसरे भाग में पढ़ें फिर से निकलने के बाद आत्मा कहां जाती है। शरीर में आने के बाद आत्मा भावनाओं में कैसे बधकर कर जीवन गुजारा करती है।
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