आत्मा और शरीर को बिल्कुल अलग-अलग समझना होगा। जब तक बिल्कुल अलग-अलग रूप में नहीं देखेंगे तब तक हम इन दोनों से भावनाओं को अलग नहीं देख पाएंगे। क्योंकि हमारी भावनाएं ही है जो सब कुछ करने पर मजबूर करता है। ऐसा की कहां की हम बचपन से अपने भावनाओं के निर्माण करता है और आज भावनाओं के गुलाम बन कर बैठे हैं।
जिस बच्चे को जिस रूप में जैसे संसाधन और स्थिति मिलता है उसे अनुसार से उसकी भावनाओं का निर्माण होता है। बचपन से एक मानव का जो बुद्धि विकास होता है वह उसके निरंतर इच्छाओं के ऊपर आधारित होता है। इच्छा आकर्षण पैदा करता है, आकर्षण से व्यक्ति उस वस्तु तथा तत्व के करीब जाता है। सीधे तौर से कहें कि जिसकी जैसी भावना होती है उसके अनुरूप वह ज्ञान अर्जन करता है अथवा ज्ञान का संचय करता है।
एक छोटे से बच्चे को जो जो चीज है बचपन में दिया जाता है। वह उन चीजों को भावनाओं में क्रिएट करता है। बचपन से उसे जिस वस्तु जी साथ के साथ संयोग रहता है उसके अंदर उससे संबंधित भावनाएं अधिकायक होता है।
मानव बचपन से दिन में चाहत के अनुसार काल्पनिक सपना देखा है। वह उसे अपने समर्थ के अनुसार कोशिश कर सच में तब्दील करने की कोशिश करता है। दिन के सपने और काल्पनिक दुनिया उसका इतना मजबूत हो जाता है कि वह रात में भी इस भावनाओं में खोया रहता है। जिसका परिणाम रात का स्वप्न नजर आता है।
एक छोटे से बच्चे को हम कोई भी खिलौने अथवा वस्तु दें। वह उसे अपने हृदय के अंदर किस प्रकार लगा। अथवा उसका मस्तिष्क उसे वस्तु को किस प्रकार स्वीकार करता है यह कोई नहीं कह सकता। किसके अंदर कौन सा इच्छा पनप रहा है यह कोई बात नहीं सकता। इच्छा एक शारीरिक प्रतिक्रिया है। जिसे कोई बदल नहीं सकता अपना परिवर्तित कर सकता है।
आज मनुष्य समाज में सभी व्यक्ति का अपना-अपना लक्ष्य है, इच्छा है, सोच है। कौन सा व्यक्ति कौन से मुद्दे अथवा सपने को ज्यादा महत्व देता है यह वह स्वयं जानता है। यह निर्भर करता है कि व्यक्ति के अंदर कौन से भावनाओं का जाल है। कोई परिवार को महत्व देता है। कोई परिवार में माता-पिता को महत्व देता है। कोई परिवार पत्नी अथवा बच्चों को महत्व देता है। कोई दोस्तों को महत्व देता है, कोई दोस्तों से मिलने वाले सुख को महत्व देता है।
इसी प्रकार कोई धन को महत्व देता है। कोई ऐसा भी है जो नाम को महत्व देता है। कोई ऐसा है जो आराम को महत्व देता है। कोई ऐसा है जो पर्सनल सेटिस्फेक्शन को महत्व देता है। कोई एक ऐसा है जो अपने अहम को महत्व देता है। इस आधार पर देखा जाए तो मनुष्य के अपने-अपनी प्राथमिकताएं हैं। और यहां सब के स्वयं के भावनाओं के ऊपर निर्भर है।
यह भावनाओं का जल छोटा बच्चा होता है तब से बनना चालू होता है। इसीलिए कहते हैं की मां-बाप का संस्कार बच्चों के ऊपर आधिकाधिक पड़ता है। बच्चा बचपन से जिस वस्तु के साथ, जिस व्यक्ति के साथ, जीस प्रकृति के साथ रहता है, उसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। भावनाएं उत्तम भी हो सकता है माध्यम भी हो सकता है अथवा भावनाएं अशुद्ध भी हो सकता है।
भावनाएं ऐसा नहीं है की दूसरा कोई किसी और के अंदर उत्पन्न करता है। यह भावनाएं स्वयं अपने आप से जिस परिवेश में जिस परिस्थिति में रहते हैं अपने आप निर्माण होता है। परंतु उसे भावनाओं के निर्माण होने का मुख्य कारण हम स्वयं हैं। क्योंकि हम किसके साथ रहेंगे किसी वस्तु का साथ लेंगे, यह सब कुछ हमारे स्वयं के निर्णय के ऊपर आधारित होता है।
जैसे उदाहरण के तौर पर किसी को खाने में अधिक रुचि है। परंतु उसका पेट साथ नहीं देता। थोड़ी भी देखने में आया है कि व्यक्ति अपने खाने पर कंट्रोल नहीं रख सकता। वह जीवन में अनेक बार खाने को लेकर परेशानी उठा चुका है। परंतु फिर भी उसकी भावनाएं हैं जो उसका पीछा नहीं छोड़ता है। वह सदैव अपने शरीर के विपरीत भोजन करता है और पचा नहीं पता। वह अधिक बार चाहता है कि मैं आगे से ऐसा भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। उसका दिल मानता नहीं वह अपने भावनाओं के जाल में ऐसा जकड़ा हुआ है कि वह पीछा नहीं छोड़ता।
वह अपने भावनाओं की वजह से फिर उसे वास्तु के करीब जाता है जो उसके लायक नहीं अथवा अनुरूप नहीं। जीवन पर्यंत भावनाएं व्यक्ति के ऊपर हावी रहता है और वह भावनाओं से परवश हुआ सदैव न करने योग्य कर्म करते रहता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ भावनाएं विपरीत कार्य करने देता है। मैंने यहां पर भावनाओं का एक उदाहरण पेश किया है।
भावनाएं किस प्रकार काम किया करती है।
जिस व्यक्ति के अंदर उत्तम श्रेणी की भावनाएं हैं यह भावनाएं उसका सबसे बड़ा सहयोगी भी बनता है। क्योंकि इस उत्तम श्रेणी के भावनाओं के कारण वह जीवन में निरंतर संघर्ष करता है और एक दिन निरंतर संघर्ष उसे सफलता की ऊंचे सिंहासन पर वैठाता है। परंतु एक आश्चर्य की बात है भावनाएं अच्छी हो या बुरी अंत समय तक अपने जाल में बांधे रहता है। अपनी ही भावनाएं कभी सुख देता है और कभी आगे चलकर दुख भी देता है।
जब तक व्यक्ति भावनाओं से खेलने ना सीख जाए तब तक तो भावनाएं हीं व्यक्ति के साथ खेल खेलती रहेगी। श्रीमद् भागवत गीता सदैव एक ही बात करता है ‘समत्व योग’ का अनुसरण कर। समत्व योग विपरीत भावनाओं से लड़ने का शक्ति देता है। अर्थात सुख और दुख में समान व्यवहार करना अथवा रखना। अपने भावनाओं को ज्यादा हतोत्साहित न होने देना अथवा बहुत ज्यादा उत्साहित भी न होने देना। यह एक बहुत बड़ा योग है। जैसे-जैसे यह योग सिद्ध होने लगेगा आप भावनाओं से खेल खेलना सीख जाओगे।
…..
ऐसा नहीं है की भावना है तब पीछा छोड़ देंगी। परंतु उस समय भावनाओं का लगाम हमारे अपने हाथों में होगा। व्यक्ति उस समय भावनाओं के साथ-साथ किसी भी खाई में जाने को तैयार नहीं होगा। इसके पीछे भी एक कारण है भावनाएं शरीर के अंग के खुशामद करने के लिए लगी रहती है। भावनाओं का मानो ऐसा काम है कि वह शरीर के अंगों की गुलामी करने के सिवा और कुछ सोच ही नहीं सकती।
सबको पता है शरीर का अंग बहुत कुछ कहता है परंतु जहां सामाजिकता और बुद्धि की बात है वह हर विपरीत कार्य की अनुमति नहीं देता। परंतु बार-बार होता है ऐसा व्यक्ति अपने अंदर अनुभव कर सकता है। अनेक बार भावनाएं अधोगति की तरफ लेकर जाने का प्रयास करता है। जिसका लगाम अपनी भावनाओं पर नहीं होता तो वह भावनाओं के पीछे भाकर समाप्त हो जाता है।
जीवन में भावनाओं पर कैसे लगाम लगाया जाए यह सीखना अत्यंत आवश्यक है। “आत्मा और शरीर ” यह विषय जरूर हीं कुछ उबाऊ सा हो सकता है परंतु जिनको इसमें रुचि होगी वह इसे बहुत गहरे से समझने की कोशिश करेंगे। अगले भाग में पढ़ेंगे अपने भावनाओं पर लगाम लगाने की कोशिश कैसे करें।
मित्रों मुझे पता है बहुत कम ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अपने अंतर भावना का स्वयं से विश्लेषण करते हैं। क्योंकि यह प्रमाणित है जो अपने अंतर भावना का विश्लेषण कर लें लग जाए वे अपने भावना का सुधार भी कर सकते हैं। यहां तक पढ़ने और समय देने के लिए आपका विशेष धन्यवाद। अब आगे बढ़ते हैं अगले भाग में।
Dear Ved
It was essential to spend some time pondering on the post. Therefore, I am responding late. Your post is marvellous, as usual.
Thanks for liking my post, Reunion. 😊💖❤️🌹
Thank you so much for your thoughtful words! I’m truly grateful that you took the time to think before responding—it means a lot. I’m so glad you liked the post. Your likes and kind support never go unnoticed. 💐🙏