डर को भगाओ

डर उसको लगता है जिसे सिर्फ अपनें ऊपर भरोसा रहता है।  वहीं जिसे ईश्वर पर भरोसा हो उसे डर और भविष्य की चिंता नहीं होता।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
अगामापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || २/१४ ||

डर को भगाओ

हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है । हे भरतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे ।

डर एक प्रकार से विचारों को बदलता है। भविष्य की चिंता व्यक्तिगत निजी सिद्धांतों को भी बदलने पर मजबूर करता है। इन बातों को करीब से विचार करें तो यह स्पष्ट सिद्ध होता है। प्रकृति की परिस्थितियों के परवश हुआ इंसान अपनें विचारों को बदलते रहता है। या इसे यह भी कह सकते हैं कि लोग परिस्थिति के अनुसार अपने विचारों को बदल लेते हैं।

परंतु सैद्धांतिक विचार वह नहीं होता जो बदल जाए। वहीं जो बदलने वाला विचार है वह सिद्धांत नहीं हो सकता। धरती पर जीव के अंदर डर एक ऐसा तत्व है जो जन्म से सबको मिलता है। डर अनेक प्रकार के हैं डर की व्याख्या कभी आगे करेंगे। डर ऐसा तत्व भी नहीं है जो इंसान नहीं जानता।

किसी को मौत का डर है। किसी को अपनें सपने टूटने का डर है। कोई कुछ पाने वाला है अचानक उसे वह न पाने का डर है।  किसी को बुढ़ापे का डर है,  किसी को बीमारी का डर है। किसी को किसी दूसरे के द्वारा शिकार हो जाने का डर है। कुछ लोग सवाल करते हैं ईश्वर क्यों ईश्वर का नाम क्यों लेना? ईश्वर को देखा नहीं इसलिए हम ईश्वर को नहीं मानते।

कौन बोलता है ईश्वर को मानने के लिए मत मानो। वह ईश्वर भी कभी किसी को नहीं कहता है कि मेरी गुलामी करो। यह इंसान इतना खुदगर्ज है कि ईश्वर का नाम भी अपने मतलब के लिए लेता है।

डर का उपाय भी लोग अनेंक प्रकार से अपने-अपने तरीके से करते हैं। कोई हथियार का संग्रह करता है। कोई धन का संग्रह करता है। कोई बॉडीगार्ड एकत्र करके रख। कोई छुपाने के लिए गुफा तैयार करता है। कोई डर से बचने के लिए पिता का नाम लेता है। कोई गुरु का नाम लेता है। कोई डर से बचने के लिए दवाई का सहारा लेता है।

कल्पना कीजिए यह जितने दर से बचने के उपाय हैं। यह सभी प्राकृतिक है और सबका एक दिन अंत होने वाला है। कहते हैं ईश्वर पर विश्वास इतनी जल्दी नहीं होता। परंतु ईश्वर पर जिसका भरोसा हो जाता है उसका भरोसा कभी टूटता नहीं। उसके पीछे भी विशेष कारण है। क्योंकि यह सब को पता है ईश्वर एक ऐसा शक्ति है संसार में जो कभी खत्म नहीं होगा। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने कहा है इस सृष्टि की रचना उस ईश्वर ने करी है।

जिसका डर पैसे से खत्म होता है पैसा खत्म होने के पास दर वापस आ जाता है। जिसका डर हथियार से खत्म होता है वह हथियार दुश्मन के हाथ में जाने पर वह डर वापस आ जाता है। जिसका डर पिता से खत्म होता है पिता के जाने के बाद वह डर वापस आ जाता है। जिसका डर गुफा से चला जाता है जब वह गुफा से बाहर निकलता है वह डर वापस आ जाता है। प्रकृति में जो कुछ भी है हम अपनी आंखों से उसको समाप्त होते देखते हैं। अर्थात उसे उस पर यदि किसी का विचार केंद्रित होगा तो वह प्रकृति के अनुसार विचार भी बदलता रहेगा।

परंतु जिनका विश्वास ईश्वर में हो जाता है वह अपनी मौत से भी नहीं डरता अर्थात वह मौत को जीत लेता है। जिसका डर ईश्वर से समाप्त हो जाता है उसका डर वापस कभी नहीं आता क्योंकि ईश्वर समाप्त नहीं होने वाला है। ऐसे व्यक्ति का डर रूपी विचार भी रोज नहीं बदलता।

कोई ऐसा है जो कहता है कि उसे ईश्वर पर भरोसा है फिर भी डरता है इसका मतलब है कि उसे  ईश्वर पर भरोसा नहीं है। अभी उसे अपने विश्वास को जागरूक करने के लिए बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।

इसी बात को प्रमाण देने के लिए गीता जी में भगवान ने कहा है
“सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है | हे भरतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे”

अर्थात भगवान कहते हैं जी सुख-दुख से लोग डरते हैं। जो सर्दी और गर्मी से परेशान हो जाते हैं उन्हें इनको सहन करना चाहिए। यदि वे सहन नहीं कर पाते हैं तो उन्हें सहन करना सीखना चाहिए। जैसे सर्दी गर्मी प्रकृति के आधीन है वैसे हीं सुख और दुख भी प्रकृति के आधीन है। सर्दी गर्मी से लड़ना शरीर का काम है। सुख और दुखों से लड़ना विचार रूपी विवेक का काम है।

इंसान मौसम की तरह अपने दर को पाले रखा है। एक डर जाता नहीं की दूसरा सामने हाजिर हो जाता है।  इंसान डर को सुलझाते सुलझाते अंतिम क्षण में चला जाता है फिर भी उसका डर जाता नहीं। वही जो भगवान का भक्त है ईश्वर का भक्त है। वह डर के आगे निडर बनकर खड़ा रहता है। उसे न सुख-दुख भ्रमित करते हैं ना सर्दी-गर्मी व्यथीत करता है। वैसा व्यक्ति मरने से पहले हीं अपने मौत को स्वीकार कर चुका होता है।  वैसा व्यक्ति जीने के लिए कर्म तो करता है परंतु मौत से भागता नहीं। वह अपने हर प्रकार के डर के सामने ईश्वर को प्रस्तुत रखता है।

एक प्रकार से वैसा व्यक्ति अपने डर को सदैव के लिए जीत में बदल देता है। ऐसा जीत जो कभी वह हारने वाला नहीं है। वैसे व्यक्ति को न ये प्राकृतिक चकाचौंध डरा सकता है ना उसे प्रकृति हरा सकती है। क्योंकि उसके डर के आगे ईश्वर है उसके डर के आगे जीत है।

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