वास्तविक नायक – बोस

इतिहास छुपाने से नहीं छुपता। आजादी के बाद जितने भी सरकार में सम्मिलित महत्वपूर्ण समाज सेवक ‌व्यक्ति थे, सभीं को लगभग सरकार से धीरे धीरे पृथक कर दिया गया, या वैसे स्थिति उत्पन्न किया गया कि वे स्वत: दूर हो गए। कहा जाता है व्यक्ति का विश्वास जीवित रहता है। जिन्हें आजादी के बाद देश को बनाने के लिए और अनेंक वर्ष जीवित रहना था वे, ‌ गंदे राजनीति का शिकार होकर जल्द ही निपट लिए। जिन्हें राजनीति का भूख था वे बाद में अपने स्वार्थ सिद्ध करते रहे।

Vastvik Nayak Boss

भारतीय आजादी के वास्तविक नायक
श्री सरदार बल्लभ भाई पटेल, श्री अंबेडकर जी तथा अनेकों महान देश के लिए अपने खुशियों को बलिदान करने वाले महामानवों को, मानों सरकार से तड़ीपार कर दिया गया‌। कुछ नेताओं को तो जैसे मानो पंगु बना दिया गया।

जो वास्तव में देश को संवारने वाले थे, जो वास्तव में देश की संस्कृति के लिए, देश की जन भावनाओं के लिए, अपनें सगे संबंधी तथा परिवारों का जिन्होंने कुर्बानी दी, उनको हीं अपने स्वार्थ के लिए राजनीतिक बलि दे दिया गया।

श्री गांधी जी का योगदान देश के लिए अभूतपूर्व रहा, और वे अतुलनीय है। गांधी जी अथवा अलग से जितने भी देश के लिए अपनी खुशियों का कुर्बान करने वाले जो महामानव हुए ,‌वे सभीं सदैव के लिए अतुलनीय हैं तथा उनका पराक्रम अतुलनीय रहेगा। 

आजादी के बाद गांधी जी ने स्पष्ट कहा कि अब मेरे नाम का सहारा मत लो। उनका स्पष्ट वक्तव्य था, मेरे नाम पर देश में कोई भी विशिष्ट काम नहीं होगा। देश का विडंबना ऐसा है, देश का राजनीति ऐसा रहा की गांधीजी के लिए जो किया गया वह उनकें ना चाहते हुए भी सबके एवं देश  लिए आवश्यक था। वह हुआ और इस बात से संपूर्ण देशवासियों को बेहद खुशी भी है।

परंतु जिस कांग्रेस के लिए गांधी जी ने अपना योगदान दिया  और एक समय उस कांग्रेस को भी खत्म कर नया पार्टी निर्माण करने की बात की।‌ नया पार्टी तो दूर! मानों गांधी शब्द को हीं पार्टी बना दिया गया। गांधी जी के टाइटल को सरकार चलाने का एक ब्रांड बना दिया गया। मानो गांधी सरनेम कहता हो जिसको यह है वही सिर्फ सरकार चला सकता है अथवा सरकार का मुखिया बन सकता है। श्री गांधी जी महात्मा थे, तथा उनके त्याग के ऊपर किसी भी प्रकार से प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता।

श्री गांधी जी को महज एक “गांधी” शब्द से परिभाषित नहीं किया जा सकता। ‌गांधी जी के बातों को कोई भी कहने के लिए स्वतंत्र है, परंतु गांधी शब्द को लेकर देश में इतनी राजनीति हुई की, आज के गांधी के सामने वह गांधी भी छोटा हो गया। श्री गांधी जी किसी एक के नहीं थे फिर किसी एक का अधिकार कैसे हो सकता है?

राजनीति इसी को कहते हैं, “गुरु तो गुर! हीं रहा, परंतु चेला शक्कर! हो गया।”

बचपन में मैंने अपनी आंखों से कांग्रेस के लिए,अपने पिता को लड़ते देखा है। यह देश भारतीय जनता पार्टी की जागीर नहीं है। यह देश कांग्रेस का भी जागीर नहीं है।यह देश किसी विशेष पार्टी, समुदाय, जाति अथवा धर्म का नहीं है। इस देश की मिट्टी के लिए जिसका दिल रोता है यह देश उन सभीं का है।

नायक वह नहीं होता जो स्वयं को नायक बनाने के लिए दूसरे को कुर्बान करें, वास्तविक नायक तो वह है , जो दूसरों की खुशी के लिए अपनों का सुखचैन कुर्बान किया करते हो। जिसने अपने सभीं प्रकार के सुख आनंद को देश के लिए बलिदान कर दिया हो। जिन वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों की बात देश करता है,उन्होंने देश के लिए अपनी खुशी का तो कुर्बान किया , साथ में अपनों के भी खुशियों का कुर्बान किया। उनके अपनों का क्या कसूर था, जो देश की खुशी के लिए अपने खुशियों का कुर्बान होते हुए देखते रहे। उनके अपनों को देश के राजनीतिज्ञों ने हमेशा हाशिए पर रखा।


जय हिंद
श्री सुभाष बाबू के ‘जय हिंद’ शब्द के अंदर, क्या कोई विशेष जाति और धर्म वाला व्यक्ति हीं था और क्या ऐसा कहीं प्रमाण मिलता है?  सुभाष बाबू जाति और धर्म देखकर स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे। सवाल उठाने वाला और विचार करने वाला मूर्ख के सिवा और कुछ नहीं हो सकता।

आज हिंद में रहकर हिंद का कहलाना कुछ लोग अपमान समझते हैं और प्रदेश में वही हिंद शब्द सम्मान जनक लगता है। भारतीय संस्कृति का तुलना दूसरे देश से नहीं हो सकता। भारत में किसी भी धर्म और संप्रदाय, जाति वाला व्यक्ति क्यों ना हो, सभीं के ऊपर भारतीय संस्कृति का अपना एक अलग हीं प्रभाव है। भारतीय संस्कृति हर एक भारतीय को खास बनाता है। यह भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ी खूबसूरती है।

जय हिंद! इंडिया शब्द अंग्रेजो के द्वारा फेमस किया गया, उससे पहले भारत हिंदुस्तान नाम से प्रचलित रहा। अंग्रेज अपने अंग्रेजी को छोड़कर गए, वे यहां के राजनीतिज्ञ को यह कह कर नहीं गए कि सबको अंग्रेज बना दो। परंतु कोशिश तो कुछ वैसा ही हुआ।

हिंद शब्द हिंदू से निकला है। इसलिए हिंदू और हिंदुस्तान शब्द को मानो जेल में बंद कर दिया गया हो। जब तक आजादी के महामानवों का वश चला, उन्होंने भारतीय संस्कृति को भारत में जागृत रखने की कोशिश की। उसका प्रमाण है श्री गांधी जी के द्वारा श्रीमद्भागवत गीता का आत्मसात, राम! नाम का जप तथा बाबासाहेब के द्वारा रचित भारतीय संविधान में श्री राम दरबार का चित्र।

वर्तमान में चिंतक व्यक्ति! इस बात का कल्पना कर सकते हैं , की आजादी के महामानवों का आजादी के बाद , वास्तव में भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप का अवसर मिला होता तो,आज भारत का स्वरूप तथा इतिहास कुछ और होता।

सनातन संस्कृति के साथ सौतेला व्यवहार
उस समय सनातन संस्कृति के द्वारा अनेकों गुरुकुल चलाए जाते थे। आज लगभग सभीं गुरुकुल हाशिए पर चले गए। अंग्रेज़ीयत तथा पर धर्म के लोगों को अपने विषेश धर्म विस्तार का अवसर दिया गया। सनातन संस्कृति अपना विस्तार ना कर पाए, इसके लिए सभीं मंदिरों को सरकार के अधीन करके, सभी दान पेटी के मुंह को सरकार की तरफ मोड़ दिया गया।

वास्तव में सनातन संस्कृति से संबंधित जो दान है वह सिर्फ और सिर्फ सनातन संस्कृति के विस्तार के ऊपर खर्च होना चाहिए। अतीत के सभीं सरकारों ने लगभग सनातन संस्कृति का मजाक उड़ाया। भारतीय संस्कृति आज जिस वजह से महत्वपूर्ण है मानों उसी को ताबूत में बंद करके ताला जड़ दिया गया हो।

दूसरे संस्कृति वाले को प्रोत्साहन मिला और सनातन संस्कृति के गले को दबाया गया। कभी दबी जुबान से तो कभी खुले जुबान से कहा गया । मत बोलो यह धर्मनिरपेक्ष देश है। सनातन संस्कृति यह कभी नहीं सिखाता, दूसरे के घरों पर कब्जा कर लो। सनातन संस्कृति भूखे को रोटी देना सिखाता है ,दूसरे के सामने पड़े हुए थाली को छींनना नहीं सिखाता।दूसरे अपने धर्म को लेकर डुगडुगी बजा सकते हैं, परंतु सनातन तुम अपने धर्म को लेकर डुगडुगी नहीं बजा सकते। क्योंकि तुम्हारी डुगडुगी हमें बहुत तकलीफ देता है।

वास्तव में हिंद और सनातन अलग हो हीं नहीं सकते। जो अपने पूर्वजों के धर्म को छोड़कर! पर धर्म में आनंद से आनंदित हैं, उन्हें आनंद का साधुवाद है। आज अपने मां का तकलीफ सब समझते हैं, परंतु पूर्वजों के मां का तकलीफ कोई नहीं समझता।

सुभाष बाबू के पीछे
जिस दर्द ने, जिस व्यथा ने, जिस संस्कृति ने सुभाष बाबू को श्री सुभाष चंद्र बोस बनाया वह संस्कृति साधारण नहीं हो सकता। उस संस्कृति का तुलना किसी संस्कृति से नहीं हो सकता। सुभाष बाबू के पीछे सनातन साहित्य , सनातन संस्कृति मूल रूप से रहा।

देश की वीर स्वतंत्रता के लिए, अपने आनंद और खुशियों को कुर्बान करने वाले महामानवों की तुलना किसी से नहीं हो सकता। वे महामानव आज के जैसे सत्ता के लालची नहीं थे।

आज कुछ लोग नए इतिहास को सामने रखकर अथवा समझकर कुतर्क के जरिए, अपने शब्दों को ऊपर करने की कोशिश कर सकते हैं। वास्तविकता तो उन महामानव के उस समय के जीवन स्थिति को समझ कर पता चलेगा। जिंन महामानवों को देश की आजादी के बाद सरकार से बेदखल कर दिया गया , उनका कसूर सिर्फ इतना था,  कि उनका सोच भारत के समस्त जनमानस के लिए था। उनका सोच भारत की संस्कृति के लिए था।

अंग्रेज! भारत को इंडिया समझकर नहीं आए थे वह हिंदुस्तान समझ कर आए थे। परधर्मि क्रूर अत्याचारी शासक भारतीय संस्कृति के मंदिरों का खजाना लूटने के लिए आए थे। जिन हिंदू संस्कृति को लेकर जय हिंद कहा गया। जिस सनातन संस्कृति को लेकर जय हिंद कहा गया। उस हिंद को लूटने के लिए आए थे।

सनातन संस्कृति वास्तव में कोई विशेष जाति धर्म अथवा संप्रदाय नहीं है। सनातन संस्कृति तो भारतीय सनातन संस्कृति का वृहद स्वरूप है। हिंदुस्तान में रहने वाले सभीं जाति, धर्म, संप्रदाय, समूह का मिश्रण हीं सनातन संस्कृति हैं।

अतीत के सरकारों के बस में यदि होता, तो वे सेना से भी जय हिंद को निकाल बाहर कर देते परंतु यह संभव न था। विश्व में सनातन संस्कृति हीं एक ऐसा संस्कृति है जो धरती के सभीं संस्कृतियों को अपने अंदर समा सकता है। भारतीय संस्कृति हीं ऐसा संस्कृति है जिस संस्कृति के अंदर विश्व के सभी संस्कृतियों का सम्मान है और रहेगा।

हिंदू सभ्यता एक ऐसा सभ्यता है यह  विश्व के सभीं सभ्यताओं का समान रूप से सम्मान करता है। जय हिंद क्यों नहीं होना चाहिए। क्योंकि हिंद अपने आप निर्मित हुआ, स्वचालित प्राकृतिक संस्कृति है। यह संस्कृति तथा इसके नियम किसी के द्वारा प्रायोजित नहीं है।

आजादी के लिए देश के सभीं धर्म संप्रदायों का योगदान रहा। उसका कारण ही जय हिंद का हिंदू संस्कृति रहा। हिंदू संस्कृति अर्थात सनातन संस्कृति हीं ऐसा संस्कृति है जो दूसरे को बचाने के लिए अपने को कुर्बान करने की बात करता है।

जय हिंद! सनातन संस्कृति हीं ऐसा संस्कृति है,जो आम जनमानस के लिए अपनी खुशियों को कुर्बान कर सकता है।सनातन संस्कृति हीं ऐसा संस्कृति है, जो मानव की बात करता है तो धरती के सभीं धर्म ,व्यक्ति एवं विश्व समुदाय! मानव शब्द में समाहित रहता है।

सनातन संस्कृति एक ऐसा स्वचालित संस्कृति है, जो अपनी इच्छा के अनुसार से ईश्वर का चयन करता है। सनातन संस्कृति में हीं यह है, यदि ईश्वर भी अपने चरित्र को लेकर उत्तम नहीं है तो वह उसका त्याग कर देता है।

आजादी के बाद सनातन संस्कृति को एक तरीके से सौतेला समझकर नजरअंदाज किया गया। जो वास्तव में सनातन के उद्धारक थे, उन्हें हीं मजाक बना कर नया इतिहास दिखाया गया। सनातन संस्कृति के वास्तविक संरक्षण करता को कभी सामने आने नहीं दिया गया।

सनातन संस्कृति के रचयिता, जितने भी महान संत हुए उन सभीं को अछूत बनाकर पेश किया गया। जिस सनातन साहित्य को लेकर भारत हिंद बनकर विश्व में प्रचलित था, उसी सनातन साहित्य को सरकारों ने मजाक बनाया। जय हिंद हुआ, परंतु हिंद! को हमेशा जय रखने के लिए सनातन संस्कृति के मुख्य आधार सनातन साहित्य को हमेशा से नजरअंदाज किया गया। हिंद की संस्कृति सनातन संस्कृति है।

परधर्म के धर्मावलंबियों को अपने धर्म के अनुसार से चलने की आजादी दे दी गई। वहीं जय हिंद के मुख्य आधार! सनातन हिन्दू धर्मावलंबियों को यह कह कर चुप कर दिया गया, कि यह भारत सभीं धर्मों का है। तुम यदि अपने धर्म की बात करोगे तो तुम्हें गुनहगार बनाकर जेल में डाल दिया जाएगा। जिस संविधान में राम दरबार का जिक्र किया गया, जिन्होंने जिक्र किया उनके अर्थ को भी बदल दिया गया।

भारतीय संविधान के अनुसार दूसरे धर्म पर आक्षेप नहीं कर सकते, परंतु अपने धर्म को बड़ा करने में हमें संकोच भी नहीं कर सकते।

सनातन संस्कृति के हिंदू धर्म अपने आप स्वचालित होता है , इसका मतलब तो यह नहीं कि इसे सदैव के लिए हाशिए पर छोड़ दिया जाए।

आज आवश्यकता नहीं है किसी को भारत छोड़ने के लिए। सनातन संस्कृति यह कभी कह भी नहीं सकता। परंतु सनातन संस्कृति का संरक्षण तो होना चाहिए। सनातन साहित्य का संरक्षण होना चाहिए।

सनातन संस्कृति के लिए अलग मंत्रालय
निश्चित तौर पर सनातन संस्कृति के लिए अलग मंत्रालय होना चाहिए। क्योंकि सनातन संस्कृति भारत की खूबसूरती है। जो अपने अज्ञानता के कारण सनातन को समझाने का प्रयत्न नहीं कर पाते हैं ,उनके बातों के ऊपर वाद विवाद नहीं हो सकता। सनातन संस्कृति समस्त विश्व को अपना परिवार मानता है, और अपने सिद्धांत के अनुसार से मानता रहेगा।

जब इंडोनेशिया अपनी संस्कृति को साथ लेकर चल सकता है, फिर भारत अपनी संस्कृति को छोड़कर चलने की बात क्यों करता है। सनातन संस्कृति की खासियत को बचाने के लिए तथा उसके प्रचार के लिए निश्चित तौर पर भारत सरकार में एक अलग से “सनातन संस्कृति मंत्रालय” होना चाहिए। सनातन संस्कृति मंत्रालय – अपने तरीके से सनातन संस्कृति के मूल भावनाओं का विचार- विस्तार करें यह उसका मुख्य कार्य हो।

सनातन संस्कृति को लेकर लोग बहुत भ्रम फैलाते हैं परंतु हिंद संस्कृति हीं एक ऐसा संस्कृति है जिसमें ईश्वर को उसके चरित्र के अनुसार से मान सम्मान और पूजन किया जाता है। जय हिंद होना चाहिए, और जय हिंद होता रहेगा।

सनातन संस्कृति किसी के द्वारा बनाया हुआ संस्कृति नहीं है ,इसलिए यह संस्कृति जब तक दुनिया चलेगा अथवा जब कभी फिर दुनिया बनेगा और अपने आप जो संस्कृति बनेगी वह सनातन संस्कृति होगा।

वह हिंदू संस्कृति होगा। वह हिंद संस्कृति होगा ,वह सनातन संस्कृति होगा। सनातन सत्य इसलिए बार-बार कहता है, सनातन संस्कृति को समझने के लिए सनातन साहित्य के वास्तविकता को समझना होगा।

सुभाष बाबू ने जय हिंद किया और आज सदैव के लिए जय हिंद है। जय को सब कोई समझता है, हिंद को भी समझना होगा। हिंद को समझने के लिए हिंदु‌ को समझना होगा। हिंदू को समझने के लिए सनातन संस्कृति को समझना होगा। सनातन संस्कृति को समझने के लिए सनातन साहित्य को समझना होगा। जय हिंद!

इंडिया गेट पर सुभाष बाबू
अतीत के सरकारों ने यदि जॉर्ज पंचम का मूर्ति हटाकर किसी और का लगा दिया होता, तो शायद यह नौबत नहीं आता। श्री सुभाष बाबू को यदि सम्मानजनक स्थान दिया गया होता तो आज यह नौबत नहीं आता।

आज विपक्षी आरोप लगाते हैं कि दो गुजरातियों का दिल्ली पर कब्जा है। भारत के बुद्धिजीवियों को यह पता है , कि यदि वर्तमान के सरकारों ने यदि यह अवसर नहीं दिया होता तो शायद ये गुजराती दिल्ली में ना बैठे होते। आज आरोप लगाने वाले यह भी आरोप लगाते हैं कि यह दोनों गद्दी के लायक नहीं हैं।

उनके बातों पर हंसी आता है, यदि वास्तविक बात करें, यदि उनकें शब्दों में बात करें, तो वे आज गद्दी के लिए सबसे कम नालायक हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो समय किसी को भी गद्दी पर नहीं बैठता।

जॉर्ज पंचम के जगह पर सुभाष बाबू।अतीत के सरकारों द्वारा गलती के कारण आज सुभाष बाबू को वह मिला जो शायद जल्दी कोई समझ नहीं सकता। अतीत के सरकारों ने कभी सोचा भी नहीं होगा, कि सुभाष बाबू पीछे के गेट से कब सामने आकर गद्दी पर बैठ जाएंगे। आज कुछ पार्टियां विचार कर रही होगी, जॉर्ज पंचम के पुतले को क्यों हटाया? और यदि हटा भी दिया तो वहां किसी आंधी को क्यों नहीं बिठा दिया।

पहले से कोई बैठा होता तो शायद आज सुभाष बाबू ना बैठ पाते। सुभाष बाबू भारत के पहले प्रधानमंत्री रहे, जिसे दबी जबान में कहा और सुना जाता है। जॉर्ज पंचम भारत का राजा था, शायद इसलिए इंडिया गेट पर बैठा था। जॉर्ज पंचम का राज हट गया और वह किसी कोने में जाकर सट गया। सुभाष बाबू बैठे इंतजार करते रहे।  एक दिन ऐसा आएगा, मैं भी अपना स्थान उचित पाऊंगा।

जॉर्ज पंचम के जगह पर सुभाष बाबू बैठ गये। अब तो यह सिद्ध है कि स्वतंत्रता सेनानियों में सबसे कोई अग्रणी थे तो वह सुभाष बाबू थे। सुभाष बाबू वास्तव में भारत को आजादी दिलाने के लिए संघर्ष किए, जिसका प्रमाण इंडिया गेट देता रहेगा।

जब सुभाष बाबू ने आजाद भारत के अपने सरकार में मुद्रा का प्रचलन किया था, तो वास्तव में भारतीय रुपयों पर उनका अधिकार अपने आप सिद्ध हो जाता है। सुभाष चंद्र बोस का नाम यदि सुभाष चंद्र गांधी होता तो आज सुभाष चंद्र बोस रुपयों में घूम रहे होते।

श्री गांधी जी ने अपने विरासत को आगे बढ़ाने के लिए किसी से प्रार्थना नहीं किया, परंतु उपनाम बनाकर गांधीत्व‌ से श्री गांधी जी के नाम का भरपूर राजनीतिक उपयोग किया गया। श्री गांधी जी अपना बलिदान करके चले गए, गांधी शब्द के ऊपर औरों ने कब्जा जमा लिया।

श्री गांधी जी अब जहां भी होंगे  हाय राम कहकर विचार कर रहे होंगे। श्री गांधी जी कहते होंगे जैसे गीता के शब्द को लोग अपने अनुसार से लेता है और छोड़ता है। वैसे हीं मेरे कहे हुए वचन को लोग उदाहरण की टोकरी बना कर इस्तेमाल किया करेंगे।

सुभाष बाबू देश के लिए कुर्बान हो गए। यह सिर्फ यह भारत नहीं कहता है। सुभाष बाबू देश के लिए कुर्बान हो गए यह विश्व का हर कोना-कोना कहता है। जिस प्रधानमंत्री को विश्व के अनेंक देशों में स्वीकार किया, उसे प्रधानमंत्री कहने के लिए भी भारतीयों को संकोच करना पड़ता है।

सुभाष बाबू ने हिंद का जय किया। सदैव हिंद!  जय हिंद होगा और जय हिंद रहेगा। श्री सुभाष चंद्र बोस का जय होगा। श्री सुभाष चंद्र बोस सदैव भारतीयों के दिल में अमर रहेंगे। मैं समस्त देशवासियों के साथ सुभाष चंद्र बोस जी को श्रद्धांजलि के साथ नमन करता हूं।

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