मानव धर्म यह किसके लिए है? मानव धर्म वह धर्म नहीं जो हमें अपने धर्म समूह से मिला है। अपना धर्म समूह हमें अपने लिए धर्म सिखाता है परंतु मानव धर्म संपूर्ण समाज के लिए धर्म सिखाता है।

वास्तव में कोई धर्म छोड़ना नहीं है। संसार में यदि धर्म की चर्चा की जाए तो सबसे बड़ा धर्म मानव धर्म होगा। क्योंकि हमारे घर का रीति रिवाज पूरे समाज के रीति-रिवाज से बड़ा नहीं हो सकता। हमारे अपने घर का धर्म पूरे संसार का धर्म नहीं हो सकता।
मानव धर्म एक सामाजिक धर्म है जिसका निर्माण किसी धर्म समूह ने नहीं किया। मानव धर्म तो हम मानवों से भी कहीं ऊपर है। समाज से यदि कोई बच्चा बिछड़ कर जंगल में रहने लगे और वह मानवता को छोड़ दें। वैसा बच्चा किसी भी प्रकार मानव नहीं कहलाएगा।
मानव के अंदर हमदर्दी करुणा और विशेष भावना मौजूद है। मानव हीं है जो अपनों के लिए सोचता है, अपने अपनों के लिए सोचता है, अपने समस्त संसार के लिए सोचता है। देश के कानून भी मानव और मानव का व्याख्या करके हीं सजा देता है।
मानव का ही धर्म है कि वह समस्त संसार की रक्षा करें, मानव का ही धर्म है कि वह संसार के सभी मानवों को मानव जाति का समझे और सब से प्रेम करें। किसी व्यक्ति के ऊपर संसार निर्भर नहीं रहता संसार के ऊपर व्यक्ति निर्भर रहता है।
सभीं धर्मों में मानवता एक मुख्य धर्म है जिस धर्म के बाद हीं सभीं धर्म आते हैं। इसलिए मानव धर्म एक ऐसा धर्म है जो सभीं मानव के लिए आवश्यक है।
यदि वास्तविकत धर्म की बात करें तो वास्तव में धर्म कभी भी किसी दूसरे का नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्थिति और परिस्थिति के अनुसार से अपना धर्म है। दूसरे का धर्म बोला जाने वाला धर्म! धर्म हो हीं नहीं सकता।
यदि धर्म की वास्तविकता की बात करें तो धर्म कभी भी किसी का पराया नहीं हो सकता। कोई किसी विशेष धर्म समूह को आस्था मानकर चलता है, इसका मतलब यह नहीं कि सभीं एक हीं धर्म को मानकर चलें।
चाहे धर्म कैसा भी हो व्यक्ति को उसे अपने धर्म पर चलकर हीं सदगति मिलने वाला है। किसी का मां-बाप गलत हो या किसी को अपना मां-बाप पसंद नहीं हो तो वह अपने लिए नया माता-पिता जन्म नहीं दे सकता। क्योंकि जन्मदाता तो स्वयं हीं माता पिता है।
जैसा कि मैं अपने विचार से कहता हूं। प्रकृति में व्यक्ति बचपन से हीं अपने लिए एक भावनाओं का जाल बुनता है। वह भावना हजारों लाखों प्रकार के हो सकते हैं, उस भावना को व्यक्ति तोड़ पाए! यह किसी में ताकत नहीं। भावना प्रकृति तैयार से है और शरीर प्रकृति है।
भावना प्राकृतिक है ,व्यक्ति के पास पर्याप्त बुद्धि रहते हुए भावना बुद्धि को मोहित कर लेता है। सभी धर्म अपने लिए अच्छे हैं। सभी धर्मों के महात्माओं ने अनेंक यत्न करके एक उत्तम धर्म को प्रस्तुत किया है।
इसलिए धर्म! किसी दूसरे का होता है यह धर्म के ऊपर सबसे बड़ा भ्रम है। सबका अपना स्वयं का धर्म है।यह स्वयं अपनें को कल्याण करने वाला है, दूसरे का धर्म कभी कल्याण नहीं होगा। अपना धर्म छोड़ने से अपनें को हानि होता है दूसरे को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए अपना धर्म! सबका अपना धर्म है।