सनातन संस्कृति में आज भी कितने महान महामानव उपस्थित है इसका गणना नहीं हो सकता। परधर्मी विचारक अपनें को अच्छा बनाने के लिए सनातन धर्म का परिहास करते हैं और अपने अनुसार परधर्म की खूबियां गिनाते हैं। सनातन संस्कृति के महामानव खामोश! अपनें योग साधना में अथवा अपने कर्म में लीन रहते हैं। चुकी सनातन संस्कृति पूर्ण रूप से चरित्र के ऊपर आधारित है और इसलिए सनातन धर्म के जो महामानव हैं वे अपने चरित्र को बनाने में हीं लगे रहते हैं।

अपना भारत विश्व में एक संत भूमि है। सनातन धर्म एक तरीके से उत्तम विचारों से निकला हुआ उत्तम चरित्रवान धर्म है। अपने पूर्वज महात्माओं का शोध! सनातन साहित्य! आज भी एक से बढ़कर एक उत्तम विचारवान महान संत का निर्माण करता है। हमारे सनातन में एक पुरानी कहावत है जो वास्तव में महान होते हैं वे अपने महानता को व्यक्त नहीं करते। किसी को पहचानना समाज का काम है, हमारे अपने सनातन संस्कृति समाज का काम है। लेख में चर्चा श्रद्धेय श्री 108 रामप्रसाद जी महाराज का। रामसनेही संप्रदाय बड़ा रामद्वारा सूरसागर जोधपुर।
श्री रामप्रसाद जी महाराज आज के समय एक उत्तम कोटि के संत है। व्यक्ति जितना जानता है उसी के अनुसार से वह तुलना भी करता है। श्री रामप्रसाद जी महाराज कैसे हैं, जो उन्हें करीब से जानते हैं सब वास्तविक समझते हैं। श्री रामप्रसाद जी महाराज जोधपुर के सूरसागर में स्थित रामसनेही संप्रदाय का तपोभूमि “बड़ा रामद्वारा” के वर्तमान महंत है।
श्री रामप्रसाद जी महाराज एक महान संत हैं और उच्च विचारों से युक्त हैं। श्री महाराज जी एक उच्च कोटि के कथाकार हैं। जहां तक मेरा अनुभव है महाराज जी के बारे में मैंने इनकें शब्दों में तनिक भी आडंबर नहीं देखा। वैसे रामसनेही संप्रदाय में विशेष तो यही है, की यह संप्रदाय राम नाम को महत्वपूर्ण मानते हुए लोक कल्याण की बात करते हैं। वास्तविक राम को किसी ने नहीं देखा, जिसने देखा वह अपने अनुभूति को बयां नहीं कर सकता। राम से बड़ा राम का नाम है,जो सबके लिए सुलभ है। वह राम सबके अंतरात्मा के अंदर शक्ति के रूप में संचार हो रहा है।
श्री महाराज जी को मैंने विचलित स्वभाव में शायद कभी नहीं देखा। शांत चित्त ह्रदय व्यक्ति! महाराज जी के ऊपर ईश्वरीय कृपा एवं उनका व्यक्तित्व स्पष्ट रूप से दर्शन में दिखता है। निश्चित तौर पर आज के समय श्री महाराज जी के विचार के बहुत कम संत मिलेंगे। सनातन सत्य श्री महाराज जी को हार्दिक नमन करता है तथा सनातन संस्कृति में योगदान के लिए आभार प्रकट करता है।
संत श्री रामप्रसाद जी महाराज जी का सनातन संस्कृति में योगदान!
आज भारत में अपने प्राकृतिक संस्कृति के योगदान में जिसका भी कहीं कुछ विशेष योगदान है तो उसे समाज को जानना चाहिए। साधु-संत-महात्माओं की समाज में कहीं कुछ आलोचना होता है तो वह बहुत जल्दी वायरल भी हो जाता है। समाज में आलोचनाओं से कहीं दूर ऐसे संत-महात्माओं की कमी नहीं है जो अपने सांस्कृतिक धरोहर को संजोए अपने नियमों का पालन किए जा रहे हैं।
श्री महाराज जी अपने उत्तम विचारों के माध्यम से जन जन कल्याण में नित्य लगे हुए। अपने सनातन संस्कृति ,अपने हिंदू धर्म के अनुयायियों के अंदर ईश्वर भक्ति के लिए प्रकाश जगाना, ईश्वर कृपा कैसे मिले इसका संदेश प्रकट करना। जो भी महाराज जी के पास आता है, वह एक प्रकार से एक मार्ग लेकर जाता है। वह मार्ग व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण भाग साबित होता है। नित्य दिन उनके दर्शन और सानिध्य के लिए भक्त आते रहते हैं। श्री परमहंस 108 श्री रामप्रसाद जी महाराज आज भक्तों के बीच में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वैसे तो किसी के बारे में जानने के लिए पूरा जीवन पर्याप्त नहीं होगा और व्यक्ति पूरी तरह से किसी को जान भी नहीं सकता।
मेरे अनुभव में जितना आया है उसे व्यक्त करने की कोशिश किया हूं। भारत में अच्छे महात्माओं की आज भी बहुत कमी है। अपना सनातन समाज इस बात को नजरअंदाज करता है। आज यदि भारत में सनातन धर्म फल फूल रहा है, तो उसका कारण हमारे यही संत महात्मा है।
वैसे तो संत महात्मा नाम के भूखे नहीं होते,परंतु अपने सनातन संस्कृति को बचाए रखना जिस किसी का भी योगदान हो निश्चित तौर पर समाज के द्वारा उसे हमेशा प्रोत्साहन मिलना चाहिए, तथा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
रामस्नेही संप्रदाय विशेष
भारत के सभीं संप्रदाय खास और उत्तम है। भारत में रामसनेही संप्रदाय- सभी विशेष में एक अपना अलग हीं महत्व रखता है। रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक श्री रामचरण वैश्य जी थे। इनका जन्म जयपुर के सोड़ा गांव में हुआ।
इस संप्रदाय के शिष्य दाढ़ी-मूंछ और सिर के बाल नहीं रखते, गुलाबी रंग की पोशाक धारण करते हैं तथा मूर्ति पूजन नहीं करते हैं। नैतिकता, सदाचरण, सत्यनिष्ठा और धार्मिक अनुशासन पर अधिक जोर देत हैं
इस संप्रदाय की चार मुख्य शाखाएं हैं –
शाहपुरा शाखा – राजस्थान भीलवाड़ा के निकट स्थित है। यह संत श्री रामचरण जी महाराज की गद्दी है।
रैण शाखा-दरियापंथ की पीठ: मारवाड़ में मेडता के समीप रैण में संत दरियावजी के शिष्यों की गद्दी स्थित है। इनका जन्म जैतारण, पाली में हुआ।
सिंहथल शाखा-बीकानेर
इस पीठ के संस्थापक हरिरामदास जी है।
खेड़ापा शाखा-जोधपुर के प्रवर्तक संत रामदासजी थे।
ये सभीं निर्गुण उपासक रहे। इन पीठों में खेड़ापा पीठ का महत्त्व अधिक है।
रामस्नेही संप्रदाय ईश्वर के अनेक रूप के बजाए ईश्वर की शक्ति को महत्व देता है एवं ईश्वर के नाम को विशेष महत्व देता है। इस संप्रदाय में समाज में प्रचलित पाखंडों एवं आडंबरों का खंडन किया जाता है। सांख्य और योग- राम के बिना रोग हैं और इन्द्रिय सुख दुखःदायी हैं।
सनातन संस्कृति और बड़ा रामद्वारा सूरसागर!
यह रामद्वारा जोधपुर के सूरसागर में स्थित है।
आए दिन इस रामद्वारा के द्वारा अनेंक प्रकार के लोक कल्याण युक्त एवं यज्ञ अनुष्ठान होते रहते हैं। यह स्थान इतना पवित्र है कि जो यहां आता है, यह स्थान उसके ऊपर प्रभाव दिए बिना नहीं रहता। यह बड़ा रामद्वारा महान संतों की तपोभूमि है। आज भी यहां अनेक संत अपने भक्ति में लीन रहते हैं। यह पूरे साल संतों का सेवा भी होता है। यहां पर अखंड राम नाम का जप चलता है।
किसी को बड़ा कहने का अर्थ यह नहीं होता की लेखक अथवा विचारक किसी को छोटा करने की कोशिश करना है। अपनें आप में सभीं स्थान महत्वपूर्ण है, यदि शब्दों के जरिए किसी विशेष को साबित करना है तो निश्चित तौर पर उदाहरण लेना अनिवार्य हो जाता है।
प्राचीन तपोभूमि बड़ा रामद्वारा सूरसागर के द्वारा पूरे साल सनातन संस्कृति तथा अपने धर्म से जुड़े अनेंक धार्मिक कार्यक्रम-प्रयास होते रहते हैं। यहां तक की इस तपोभूमि के संतो के द्वारा राज्य के दूसरे भाग में भी कथा यज्ञ , तीर्थ दर्शन यज्ञ एवं और भी धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए जाते हैं।
सनातन संस्कृति के लिए समाज का कर्तव्य!
सनातन संस्कृति के विस्तार के लिए, सनातन संस्कृति अपना स्थान पर यथास्थिति कायम रहे उसके लिए हर सनातन संस्कृति से जुड़े महानुभाव को इसके लिए नित्य प्रयास करने की आवश्यकता है। समाज में साधु संत महात्मा! सनातन संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग के अंदर रमन करते हैं। इसलिए वास्तविकता में अपनें संस्कृति के अंदर रचे बसे हुए हैं। सनातन के संपूर्ण समाज को साधु- संत-महात्मा आश्रम मंदिरों की अपनी जिम्मेवारी समझनी होगी। किसी एक साधु-महात्मा के अनैतिक कर्म को करने से समस्त साधु समाज को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
आज का समाज! साधु-महात्मा को तुरंत शास्त्रों से तौलने लगते हैं। जबकि साधु महात्मा कोई रूप नहीं होता। साधु महात्मा तो आचरण है ,विचार है, एक साधुत्व जीवन जीने का संकल्प है। जहां सनातन संस्कृति इतना विशाल है और रामायण में साधु-महात्मा का वेश धारण करने वाला रावण और कालनेमि भी हुए।
आज के समय साधु महात्माओं के बीच रावण और कालनेमि का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। परंतु एक की गलती के लिए संपूर्ण साधु समाज के ऊपर उंगली नहीं उठाया जा सकता। इसलिए सनातन संस्कृति के महानुभावों को अपने विचारों की शैली में साधु-संत-महात्मा-मंदिर एवं धर्म-ग्रंथ इन सबको महत्व देना हीं होगा।
जहां हमारे शास्त्र!चरित्र को उत्तम बनाने की अद्भुत मंत्र रूपी यंत्र है। जहां आज के समय सभीं ज्ञानवान हैं। एक साधारण सोच वाले व्यक्ति को भी श्रीमद्भागवत गीता, रामायण तथा अपने संप्रदायिक धर्म-ग्रंथ का ज्ञान है।
आश्चर्य! उसके बाद भी समाज के अंदर पुत्र-पिता, माता-पुत्र, पति-पत्नी, पड़ोसी-पड़ोसी, भाई-भाई, जनता और अधिकारी! यह सभीं एक दूसरे को पूरी तरह से खुश नहीं कर पाते हैं। उसका कारण ज्ञान का ना होना कारण नहीं है। उसका मूल कारण है अपने सांस्कृतिक, उत्तम चरित्र के ज्ञान को बनाने वाला अपने धार्मिक धर्म-ग्रंथों के वचन के शब्द को महत्व न देना बहुत बड़ा कारण है।
एक पिता पुत्र के लिए धन इकट्ठा तो करना चाहता है परंतु वह पिता! यह नहीं सोचता कि हम अपने पुत्र के लिए ऐसा समाज दें जिस समाज में हमारे पुत्र का अंत समय तक मान प्रतिष्ठा भरपूर मिलता रहे। हमारे अपने पूर्वजों के द्वारा शोध किए गए धर्म ग्रंथों का शब्द! सदैव अमर रहे और महत्वपूर्ण रहे। हमारे अपने धर्म ग्रंथों का मान प्रतिष्ठा सदैव कायम रहे। इस बात का प्रत्येक सनातनी को विचार और चिंतन करना चाहिए और करते रहना चाहिए।