मां-बाप और आशा

बच्चे माता-पिता के उस बाग के फूल हैं, जिस बाग के सिवा माता-पिता  के पास और कुछ नहीं होता। बहुत ऐसे बच्चे हैं जो अपने माता-पिता के ऊपर ऐसे इल्जाम भी लगाते हैं, कि हम तो अपने मां बाप के रोमांस का फल है। यह कहने वाला निहायत ही महामूर्ख हो सकता है, क्योंकि पर्दे के पीछे क्या होता है सबको पता है।

मां-बाप और आशा

रोमांस किसी व्यक्ति की खास परंपरा नहीं है, रोमांस तो प्रकृति की अपनी परंपरा है, जिसके अनुसार शरीर अपने आप समय अनुसार ढलता है। क्या ऐसा कभी सुनने में आया है, या इस प्रकार ऐसा कोई सोच सकता है, की गलती से बच्चा पैदा हुआ हो और माता पिता ने अपने खाने के सामने बच्चे को भूखा रखा हो।

यदि मन और तन की गलती से कोई बच्चा पैदा हुआ हो और अकेली मां स्वीकार करने की स्थिति में ना हो तो वैसा स्थिति अलग होता है। वैसी स्थिति में अधिकांश मां बच्चों का त्याग नहीं करती। कुछ प्रस्तुति में कोई मां दुनिया से लड़ने में हार भी जाती है। उसका मजबूरी भी समझना होगा, कारण प्रकृति में मां का मातृत्व जन्मजात है, और यह सभी जीवो में पाया जाता है। दूसरे जीवो में सामाजिक अनिवार्यता नहीं होता।

वास्तव में एक मां-बाप क्या चाहता है? मां-बाप तो यही चाहता है कि जिस बच्चे को उंगली पकड़ कर चलाया हो, एक दिन शारीरिक कमजोरियों में वही बच्चा मां-बाप का हाथ पकड़कर चलाएं। जिस बच्चे को मां एक बार नहीं हजार बार पूछती है ”बेटा क्या खाएगा भूख लगा है” पिता बच्चे के मनभावन चीजें देकर बच्चे को खुश करना चाहता है। उसी बच्चे से मां बाप एक दिन आशा करते हैं, कि बच्चा अपने मां-बाप की इच्छा पूछे, मां-बाप की भावना को समझने की कोशिश करें।

विचार तंत्र कहता है – यदि इस प्रकार का सोंच की मां बाप का गलत है, अथवा मां-बाप को ऐसा नहीं सोचना चाहिए तो फिर इस दुनिया में समाज का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इस दुनिया में गांव मुहल्लों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इस दुनिया में जाति धर्म अमीर गरीब का कोई अर्थ नहीं रह जाता। क्योंकि वास्तव में मां बाप मनुष्य जाति की चेन में अहम हिस्सा है, जिसके बिना मनुष्यता का कल्पना नहीं किया जा सकता।

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