भ्रम और प्रार्थना

परमेश्वर भक्ति में अनेकों प्रकार के क्रियाएं कहा गया है। उन क्रियाओं में सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है परमेश्वर से प्रार्थना। प्रार्थना पर भ्रम के ऊपर चिंतन करें उससे पहले हम कुछ और चिंतन करें।

आप एक सामान्य व्यक्ति हैं और कोई भी आपके पास आकर अपने प्रेम का इजहार करें। जब वह प्रेम का इजहार करेगा तो आप यह समझ जाओगे कि इसका प्रेम सच्चा है अथवा झूठा। अब इस प्रकार से जो परमेश्वर हमारे अंदर ही बैठा है उसे कैसे नहीं मालूम पड़ेगा कि आप प्रार्थना कैसा कर रहे हो।

Vichar Tantra

आज के समय अधिकांश प्रार्थना ऐसा होता है जैसा मानो प्रार्थना रटा हुआ है। अनेक प्रकार की चालीसा लिखा हुआ है, अनेंक प्रकार की स्तुति लिखे हुए हैं। स्तुति के अंत में स्तुति के फायदे लिखे हुए हैं और बचपन से हम एक ही प्रार्थना रटे जा रहे हैं।

स्तुति के अंत में जो फायदे लिखा होता है यदि वास्तविक विचार करें तो वह कितना पूरा होता है, यह विचारणीय बात है। यहां फिर एक बात है यदि पूजन है ,वैदिक अनुष्ठान है तो लिखा हुआ हर  एक शब्द सत्य है। परंतु यदि अपनी पुकार परमेश्वर तक पहुंचाना है तो लिखा हुआ शब्द का कोई अर्थ नहीं है।

ऐसी स्थिति में ज्यादातर देखा गया है कि व्यक्ति एक स्तुति गाते रहता है और उसके मन में कोई और बातें चलते रहता है। क्योंकि वह स्तुति और प्रार्थना उसे भली-भांति याद है इसलिए मुंह अपना काम करता है और मन अपना काम करता है।

जब चालीसा पाठ करते हुए मन किसी और तत्व का पाठ कर रहा है तो फिर चालीसा अपने द्वारा कहां हुआ। जब स्तुति पाठ करते हुए मन और दिल अपना अलग पाठ कर रहा है तो वास्तव में स्तुति का पाठ कहां हुआ। यह तो ऐसा हुआ मानो व्यक्ति संसार को पाने के लिए संसार की प्रार्थना कर रहा है।

इस प्रकार का प्रार्थना फलीभूत नहीं हो सकता। अपने किसी साहूकार के पास भी जाकर गिड़गिड़ाने से साहूकार सुन लेता है। परंतु आश्चर्य की बात है हम इतने महीनों सालों से स्तुति चालीसा गाए जा रहे हैं ,परंतु परमेश्वर को मानो कोई फर्क ही नहीं पड़ता। दोष भक्ति के सिद्धांत में नहीं है। दोष परमेश्वर के विधान में नहीं है। दोष हमारे अपने कार्य शैली में है।

अब बात आता है कि यदि ऐसा है तो फिर हम परमेश्वर से प्रार्थना कैसे करें। एक नवजात शिशु अपनी मां से यह नहीं कह पाता की माता मुझे दूध पिला दो। हे माता मुझे भूख लगी है मुझे खाना दे दो। उस छोटे से शिशु को जैसा आता है वैसा करता है, उस छोटे से शिशु को रोना आता है और वह रो कर मां को बता देता है कि मां अब समझ जाओ कि मेरी भूख लग चुकी है।

अक्सर ऐसा ही होता है बच्चा जब रोने लगता है तो मां समझती है कि बेटा बच्चा भूखा है और वह उससे खाना दे देती। जब एक बच्चा अपने तरीके से अपनी मां को अपना हृदय की बात पहुंचा सकता है । हम वयस्क  होकर भी अपने आप को भक्त कहते हैं और उसके बाद भी परमेश्वर तक अपना बात न पहुंचा पाए इसका मतलब है हमारे शैली में कमी है।

सनातन साहित्य बार-बार कहता है परमेश्वर बुद्धि से प्राप्त नहीं हो सकता। फिर परमेश्वर की भक्ति के लिए बुद्धि क्यों लगाना। परमेश्वर के लिए तो प्रार्थना वैसा हीं होना चाहिए जैसा आपका दिल मानता। यदि आपका दिल कहता है ,परमेश्वर नहीं है तो  उससे कहें कि परमेश्वर नहीं है।

“मैंने तुझे नहीं देखा मुझे देखना है। हे परमेश्वर मैंने दुनियादारी के बहुत सिद्धांत तेरे पीछे लगा लिए परंतु फिर भी कुछ ना पाया। बुद्धि तो कहता है कि तू परमेश्वर है। यहां पर है लेकिन दिल मानता नहीं कि तू यहां पर है मैं क्या करूं।”

अपने इष्ट का स्मरण हृदय से होना चाहिए। जब प्रार्थना दिल से निकलेगा तो आप देखोगे कि आज तक मैं भ्रम में था। दिल से प्रार्थना के लिए कुछ नहीं लगता उसके लिए तो सिर्फ दिल हीं लगता है।

अपने परमेश्वर से प्रार्थना करना पड़ेगा ” हे ईश्वर शास्त्र और महात्मा कहते हैं कि तू कण-कण में विराजमान हैं। हे परमेश्वर तू कण-कण में है मुझे एहसास दिला। हे ईश्वर मैं तुझे महसूस करना चाहता हूं। हे जगत के राजा !हे मेरे स्वामी! हे सबके स्वामी !मेरी पुकार सुन! हे स्वामी !मैं इस लायक नहीं कि मैं तेरा दर्शन कर सकूं फिर भी मैं तेरे से प्रार्थना करता हूं।”

प्रार्थना करें  “हे परमेश्वर ! दुनिया कहती है परमेश्वर ऐसा है वैसा है। परंतु मुझे नहीं पता परमेश्वर कैसा है , हे परमेश्वर! तू जैसा भी है मुझे एहसास दिला। हे स्वामी! महात्मा तेरे रूप के गुणों का बखान करते हैं। हमने तो वैसा तुझे नहीं देखा! तू जैसा भी है मैं देखना चाहता हूं। हे स्वामी मैं तेरी शरण में हूं, कोई कहता है साधारण व्यक्ति तेरे से दर्शन नहीं कर सकता। हे स्वामी  तू जो चाहे वह कर सकता है, तू मुझे अपने अनुसार से बना दे। हे स्वामी आज मैं प्रकृति का गुलाम हूं । तू मुझे अपना गुलाम बना ले।”

यह आवश्यक नहीं है कि आप प्रार्थना कौन सी भाषा में कर रहे हो। यह आवश्यक नहीं है कि प्रार्थना आप कौन से स्थिति में कर रहे हो। यह भी आवश्यक नहीं है कि आप कौन से धर्म को मानते हो। यह भी आवश्यक नहीं है कि आप कौन से जाति धर्म संप्रदाय से हो। आप जहां भी हो जैसे भी हो।

जिसे भी आप ईष्ट मानते हो उस परमेश्वर के सामने अपने अनुसार से प्रार्थना करें। अक्सर देखा गया है व्यक्ति अपने आप से बातें करता। आज से! अभी से शुरू हो जाएं! उस परमेश्वर से बातें करने के लिए।

जब यह नित्य होने लगेगा तो आपको आपके सवालों का जवाब भी मिलेगा उस परमेश्वर का साथ भी मिलेगा। उसके बाद जीवन का आनंद बढ़ जाएगा। याद करके परीक्षा की तैयारी किया जाता है। याद करके परमेश्वर के सामने परीक्षा नहीं देनी है। जो भी निकले उस परमेश्वर के लिए वह सब दिल से निकले, आप जो भी हो उस परमेश्वर के सामने स्वीकार करो! मैं हूं तो हूं। उस परमेश्वर से बार बार कहो।

“अब तक मैं अपने अनुसार से बनना चाह रहा था। हे परमेश्वर! अब तू अपने अनुसार से बना ले मुझे।”

परमेश्वर के सामने प्रार्थना! स्कूल के बच्चे के समान प्रार्थना से नहीं चलेगा। स्कूल के लिए बच्चे का प्रार्थना अपनी जगह पर ठीक है। परंतु परमेश्वर का प्रार्थना जो जैसा है उसे वैसा ही करना पड़ेगा। याद किए हुए प्रार्थना में सामाजिक तौर पर बहुत अच्छे क्रमांक मिल जाएंगे। परंतु परमेश्वर के सामने क्रमांक कुछ नहीं होगा।

यदि वस्तु में ईश्वर को खुश करना है तो सामाजिक प्रार्थना रुपी भ्रम से बाहर निकलना होगा। ध्यान रखें भावना रूपी जल में आप स्वयं बंधे हुए हो। स्वयं से स्वयं के प्रार्थना पर विचार करना होगा। भ्रम और प्रार्थना को भलीभांति समझना होगा।

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