महानुभाव! श्रीमद्भागवत गीता के बारे में कितना भी कुछ कहा जाए, कम होगा। राम को पसंद करने वाले राम की भक्ति करते हैं। कृष्ण को पसंद करने वाले कृष्ण की भक्ति करते हैं। शिव को प्रसन्न करने वाले शिव की भक्ति करते हैं।इसमें यह कहते हुए किसी प्रकार भी किसी को भी दुविधा नहीं होना चाहिए कि जिसे जो पसंद है वो उनके करीब जाता है और उनका चिंतन करता है।

राम भक्त रामायण को महान मानते हैं, कृष्ण भगवान भक्त भागवत को महान मानते हैं और शिव भक्त शिव महापुराण को महान मानते हैं। ऐसे ही जो जिस के अनुयाई हैं वह उनसे जुड़े हुए ग्रंथ को महान और बड़ा मांगते हैं। यह सत्य है और ऐसा हीं होना चाहिए। धार्मिक रीति रिवाज ज्ञान नहीं हो सकता, वह जीने का शैली हो सकता है।
जीवन शैली हजारों प्रकार के हो सकते हैं। सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी देवता हैं। उनको मानने का तरीका 33 करोड़ हो सकता है। पूजन की एक निश्चित पद्धति हो सकता है। पूजन का एक निश्चित नियम कानून हो सकता है। जो पूज्य देवता के अनुसार मानना भी चाहिए।
परंतु ज्ञान रीति-रिवाजों से कहीं ऊपर होता है। रीति रिवाज समयानुसार हमेशा बदलते रहा है। ज्ञान कभी नहीं बदलता। ज्ञान का अर्थ हो गया शुद्ध ज्ञान। वह ज्ञान जो एक जीव रूपी इंसान को इंसान बनाता है। किसी व्यक्ति के पास यदि इंसानियत का ज्ञान नहीं है ,मानव धर्म का ज्ञान नहीं है तो वहां पूर्ण मानव नहीं हो सकता।
शुद्ध ज्ञान रीति-रिवाजों से, संघ संप्रदायों से नहीं निकलता।शुद्ध ज्ञान हमेशा इतिहास के पन्नों से छनकर निकलता है। शुद्ध ज्ञान को कहने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, एक वक्ता के लिए, लेखक के लिए, इतिहासकार के लिए, भक्त के लिए। ज्ञान को पेश करने के सबके अपने-अपने उदाहरण होते हैं।
अफसोस की बात है उदाहरण की तो चर्चा होता है, पर किस संदर्भ में उदाहरण दिया गया, उस पर आजकल चर्चे कम होते हैं। कहने वाले बहुत प्रकार से बहुत कुछ कहते हैं, इतिहास में भी कहते रहे,अभी भी कहते हैं ,और भविष्य में भी कहेंगे।
राम वास्तव में थे नहीं थे? राम ने ऐसा क्यों किया? कृष्ण थे नहीं थे? कृष्ण ने ऐसा क्यों किया? भगवान शंकर स्वरूप से हैं कि निराकार रूप से हैं। यदि इस प्रकार से आलोचकों की बात सुनी जाए और मान ली जाए। तो इसका मतलब होगा की सभी इतिहासकार मूर्ख थे, ग्रंथाकार मूर्ख थे। यह आश्चर्य होगा, और यह अपने पूर्वजों को गाली देने के बराबर होगा।
एक जज जब फैसले करता है, तो उसके सामने उस मुद्दे से संबंधित सभीं उदाहरणों को देखकर करता है। उदाहरण से अलग एक लिखित कानूनी मापदंड होता है जिससे कोई भी जज बाहर नहीं निकल सकता। उदाहरण समझने और समझाने के लिए होता है। उसी प्रकार ग्रंथों में पुराणों में, उदाहरण नाना प्रकार के हो सकते हैं परंतु ज्ञान सब में एक ही होता है।
सभी ज्ञानी कहता है बेवजह किसी को तकलीफ मत दो। सभी ज्ञान कहता है परिवार में संबंधों का एक मापदंड और दायरा होता है। तभी एक परिवार चलता है, गांव चलता है, शहर चलता है ,देश चलता। मानवता का नियम है तो एक ही होता है, अथवा हो सकता है। और यह नियम को आज नहीं बना है, यह नियम सदियों से चला आ रहा है। कोई मानवता रूपी नियम को ना माने और कुछ और मान ले। यह उसके ऊपर निर्भर करता है।
सनातन धर्म में कोई भी वेद पुराण ग्रंथ हो। उसमें कथाओं में अंतर हो सकता है,सबका मूल ज्ञान तो एक ही कहता है। मानवता! ज्ञान व्यक्ति को मानवता के शिखर पर लेकर जाता है। ज्ञान किसी मानव को जाहिलपन नहीं सिखा सकता।
अनेक बार, अनेक प्रकार से व्यक्ति आपस में, ग्रंथ, वेद पुराण, साहित्य को बड़े छोटे के लेबल पर मापने की कोशिश करते हैं। जबकि वास्तव में सभी अपने आप में बड़ा है। कोई छोटा नहीं है सबका अपना विशेष महत्व है और सभी हमें मानव बनाना सिखाता है, सभी हमें महान बनाना सिखाता है।
सनातन धर्म इतिहास अपने शब्दों के जरिए बार-बार एक ही बात कहता है!
विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
अर्थात – “विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म, और धर्म से सुख प्राप्त होता है ।”
श्रीमद्भागवत गीता महाभारत ग्रंथ का एक हिस्सा है। एक छोटा सा हिस्सा। परंतु एक छोटा होने के बाद भी गीता का इतना बड़ा विस्तार, धरती पर इतिहास में कोई दूसरा ग्रंथ का नहीं है।
महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास बताए जाते हैं, व्यास जी के एक नहीं अनेकों काव्य ग्रंथ सनातन धर्म में उपस्थित है। महाभारत की महत्ता अपने आप में कम नहीं परंतु महाभारत से निकलकर गीता महाभारत से कहीं गुना ज्यादा प्रचलित हो जाना यह भागवत गीता की अपने आप की विलक्षणता का प्रमाण है।
श्रीमद्भागवत गीता के बारे में अनेक धर्म संप्रदायों ने अपने अपने तरीके से कहां है। गीता जी के माहात्म्य का कोई अंत नहीं, गीता जी के बारे में अनेक महापुरुषों ने अनेक प्रकार से अपनी अनुभव व्यक्त की उनमें-
ब्रह्म स्वरूप भगवान श्री कृष्ण श्री कृष्ण गीता जी के लिए स्वयं कहा है-
गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारमुत्तमम्।
गीता मे ज्ञानमत्युग्रं गीता मे ज्ञानमव्ययम्।।
गीता मे चोत्तमं स्थानं गीता मे परमं पदम्।
गीता मे परमं गुह्यं गीता मे परमो गुरुः।।
अर्थात – “गीता मेरा हृदय है। गीता मेरा उत्तम सार है। गीता मेरा अति उग्र ज्ञान है। गीता मेरा अविनाशी ज्ञान है। गीता मेरा श्रेष्ठ निवासस्थान है। गीता मेरा परम पद है। गीता मेरा परम रहस्य है। गीता मेरा परम गुरु है।

महर्षि वेदव्यास जी गीता जी के लिए कहते हैं-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।
जो अपने आप श्रीविष्णु भगवान के मुखकमल से निकली हुई है वह गीता अच्छी तरह कण्ठस्थ करना चाहिए। अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या लाभ?
श्रीमद् आद्य शंकराचार्य जी का कथन है-
गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम्।
नेयं सज्जनसंगे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम।।
गाने योग्य गीता तो श्रीगीता का और श्रीविष्णुसहस्रनाम का गान है। धरने योग्य तो श्री विष्णु भगवान का ध्यान है। चित्त तो सज्जनों के संग पिरोने योग्य है और वित्त तो दीन-दुखियों को देने योग्य है।
संत शिरोमणि ज्ञानेश्वर जी कहते हैं-
गीता में वेदों के तीनों काण्ड स्पष्ट किये गये हैं अतः वह मूर्तिमान वेदरूप हैं और उदारता में तो वह वेद से भी अधिक है। अगर कोई दूसरों को गीताग्रंथ देता है तो जानो कि उसने लोगों के लिए मोक्षसुख का सदाव्रत खोला है। गीतारूपी माता से मनुष्यरूपी बच्चे वियुक्त होकर भटक रहे हैं। अतः उनका मिलन कराना यह तो सर्व सज्जनों का मुख्य धर्म है।
महान संत स्वामी विवेकानन्द क्या कहते हैं गीता जी के बारे में-
‘श्रीमद् भगवदगीता’ उपनिषदरूपी बगीचों में से चुने हुए आध्यात्मिक सत्यरूपी पुष्पों से गुँथा हुआ पुष्पगुच्छ है।
महामना मालवीय जी ने कहा है-
इस अदभुत ग्रन्थ के 18 छोटे अध्यायों में इतना सारा सत्य, इतना सारा ज्ञान और इतने सारे उच्च, गम्भीर और सात्त्विक विचार भरे हुए हैं कि वे मनुष्य को निम्न-से-निम्न दशा में से उठा कर देवता के स्थान पर बिठाने की शक्ति रखते हैं। वे पुरुष तथा स्त्रियाँ बहुत भाग्यशाली हैं जिनको इस संसार के अन्धकार से भरे हुए सँकरे मार्गों में प्रकाश देने वाला यह छोटा-सा लेकिन अखूट तेल से भरा हुआ धर्मप्रदीप प्राप्त हुआ है।
श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज जी गीता जी के मर्मज्ञ माने जाते रहे
और उन्होंने बार-बार कहा-
भगवद्गीता एक बहुत ही अलौकिक, विचित्र ग्रन्थ है। इसमें साधकके लिये उपयोगी पूरी सामग्री मिलती है, चाहे वह किसी भी देशका, किसी भी वेशका, किसी भी समुदायका, किसी भी सम्प्रदायका, किसी भी वर्णका, किसी भी आश्रमका कोई व्यक्ति क्यों न हो। इसका कारण यह है कि इसमें किसी समुदाय-विशेषकी निन्दा या प्रशंसा नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्वका ही वर्णन है।
वास्तविक तत्त्व (परमात्मा) वह है, जो परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा अतीत और सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें नित्य-निरन्तर एकरस-एकरूप रहनेवाला है। जो मनुष्य जहाँ है और जैसा है, वास्तविक तत्त्व वहाँ वैसा ही पूर्णरूपसे विद्यमान है। परन्तु परिवर्तनशील प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्तियोंमें राग-द्वेषके कारण उसका अनुभव नहीं होता। सर्वथा राग-द्वेषरहित होनेपर उसका स्वत: अनुभव हो जाता है।
भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी गीता जी के काफी करीब रहे-
“एक बार मैंने अपना अंतिम समय नजदीक आया हुआ महसूस किया तब गीता मेरे लिए अत्यन्त आश्वासनरूप बनी थी। मैं जब-जब बहुत भारी मुसीबतों से घिर जाता हूँ तब-तब मैं गीता माता के पास दौड़कर पहुँच जाता हूँ और गीता माता में से मुझे समाधान न मिला हो ऐसा कभी नहीं हुआ है।”
अमेरिकन महात्मा थॉरो जी का कथन है-
प्राचीन युग की सर्व रमणीय वस्तुओं में गीता से श्रेष्ठ कोई वस्तु नहीं है। गीता में ऐसा उत्तम और सर्वव्यापी ज्ञान है कि उसके रचयिता देवता को असंख्य वर्ष हो गये फिर भी ऐसा दूसरा एक भी ग्रन्थ नहीं लिखा गया है।
एफ.एच.मोलेम ने कहा है (इंग्लैन्ड)
बाईबल का मैंने यथार्थ अभ्यास किया है। उसमें जो दिव्यज्ञान लिखा है वह केवल गीता के उद्धरण के रूप में है। मैं ईसाई होते हुए भी गीता के प्रति इतना सारा आदरभाव इसलिए रखता हूँ कि जिन गूढ़ प्रश्नों का समाधान पाश्चात्य लोग अभी तक नहीं खोज पाये हैं, उनका समाधान गीता ग्रंथ ने शुद्ध और सरल रीति से दिया है। उसमें कई सूत्र अलौकिक उपदेशों से भरूपूर लगे इसीलिए गीता जी मेरे लिए साक्षात् योगेश्वरी माता बन रही हैं। वह तो विश्व के तमाम धन से भी नहीं खरीदा जा सके ऐसा भारतवर्ष का अमूल्य खजाना है।
गीता जी का अनन्य भक्त-श्री एकादश सेवक महाराज कहते हैं–
श्रीमद्भागवत गीता किसी व्यक्ति विशेष का वचन नहीं है, श्री कृष्ण का वाणी कहना, इसे छोटे रूप में बांधना हो जाएगा। क्योंकि गीता में भगवान स्वयं कहते हैं । हे अर्जुन ! मेरा और तेरा कितने जन्म हो चुके हैं, और इस ज्ञान को मैंने ही सूर्य से कहा था। गीता के लिए कृष्ण को छोटा नहीं कहा जा सकता, परंतु कृष्ण वैष्णव वंश के रहें, सनातन धर्म के रहें।
श्रीमद्भागवत गीता किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है। किसी जाति धर्म वंश स्थान के लिए नहीं है। यह श्रीमद्भागवत गीता संपूर्ण मानव के लिए। संक्षेप में कहें तो यह संसार बनने और चलने का आधार है। देश चलाने के लिए हर देश का अपना एक संविधान होता है। वैसा ही संसार चलाने के लिए एक संविधान है।गीता प्रकृति का संविधान है जिसके आधार पर सब कुछ निश्चित होता है।यदि प्रकृति के संविधान की बात करें तो प्रकृति का एकमात्र संविधान श्रीमद्भगवद्गीता है।

श्रीमद्भागवत गीता की प्रमाणिकता
यदि सभी महापुरुषों की बात करें तो गीता जी के बारे में किसी को प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता वास्तव में ब्रह्म की बानी है। उस परमेश्वर का वचन है जो रूप,जाति ,धर्म, वंश ,संप्रदाय और स्थान से कहीं ऊपर है। यदि गीता जी को कृष्ण की वाणी कहेंगे, तो श्री कृष्ण संप्रदाय, वंश और जन्मे हुए पुरुष माने जाते हैं।
भगवान श्री कृष्ण गीता जी को कहते समय अपने ब्रह्म रूप का दर्शन करवाया था। वह भी दर्शन अर्जुन दिव्य दृष्टि प्राप्त करने के बाद कर पाए थे। भगवान ने तो यह जिक्र ही नहीं किया, कि मैं जन्मा हुआ हूं और अपने गुरु से शिक्षा लेकर तुझे उपदेश दे रहा हूं।श्रीमद्भागवत गीता जी के बारे में जो कुछ भी जितना भी कहा जाए सब कम होगा।
कोई भी परमेश्वर भक्तों, किसी भी मत संप्रदाय विशेष का व्यक्ति ही क्यों ना हो, यदि अपने इष्ट की वाणी समझकर, श्रीमद्भागवत गीता जी का स्वाध्याय करें, तो परमेश्वर की कृपा से गीता जी का कुछ अंश निश्चित तौर पर समझ पाएगा। श्रीमद्भागवत गीता में वर्ण का उल्लेख भी, मानवता के आधार पर किया गया है।
चरित्र-आचरण अपने आप भविष्य में अपना वर्ण तैयार कर लेता है। वर्ण का निर्माण चरित्र ने किया है। वर्ण ज्ञान के अंदर है, ज्ञान वर्ण के अंदर नहीं होता। गीता जी में आचरण के अनुसार सेवन बताया गया है। वर्ण के अनुसार से आचरण नहीं बताया गया है।
आचरण का निर्माण पहले हुआ और वर्ण का निर्माण बाद में हुआ। इसलिए श्रीमद्भागवत गीता वर्णाश्रम का व्याख्या तो करता है, पर चरित्र- आचरण के आधार पर करता है।
वो चरित्र का मापदंड हो सकता है। इसलिए गीता जी में व्यक्ति को चरित्र सुधारने की बात कही गई है। और उसके लिए नाना प्रकार के, योग बताए गए। कोई अपने कुलदेवता, संप्रदाय देवता को छोड़कर किसी दूसरे की भक्ति में लग जाए, यह पाप कर्म कहा गया है।
कोई भी भक्त किसी की भी भक्ति करता हो। वह चाहे किसी को भी अपना परमेश्वर मानता हो। वह उसे हीं अपना परमेश्वर माने, परंतु पूर्णतया माने। जगत का एकमात्र रचयिता माने। वास्तव में परमेश्वर रूप जाति धर्म अथवा संप्रदाय से कहीं ऊपर है। गीता को श्रीकृष्ण की दृष्टि से न देखकर अपने इष्ट की दृष्टि से देखें, गीता जी का निश्चित तौर पर आशीर्वाद प्राप्त होगा।
श्रीमद्भागवत गीता विचार दर्शन
इसे समझने के लिए हमें इन के मुख्य स्थान महाभारत पर एक बार रोशनी डालनी पड़ेगी। महाभारत में कर्म की विशेष प्रधानता है। कोई व्यक्ति अपने से कुछ करना नहीं चाहता, सभी वह कर्म के निहित करते जाता है। पांडवों ने कहा हमने कर्म किया, दुर्योधन ने भी कर्म की ही बात करें। भीष्म पितामह ने भी कर्म किया और राजा धृतराष्ट्र ने भी कर्म का ही नाम लिया।
कोई भी व्यक्ति अपने आप को दोष नहीं देता, ओ सही है या गलत भविष्य इसका निर्णय स्वयं ले लेगा। और आज के युग में सभी अपने अपने अनुसार से सही और गलत निश्चय करते आए हैं।
व्यास जी ने अपने अनुमान से सर्वोत्तम ग्रंथ महाभारत का निर्माण किया। यदि कर्तव्य कर्म को समझना है तो वास्तव में महाभारत से उत्तम दूसरा कोई ग्रंथ नहीं है। महाभारत को लोग सिर्फ युद्ध की तौर पर देखते हैं, महाभारत सिर्फ युद्ध का नाम नहीं है। महाभारत कर्तव्य कर्मों से किसी भी परिस्थिति में पीछे नहीं हटने का एक मार्ग देता।
श्रीमद्भागवत गीता एक तरीके से कहा जाए तो पूरे महाभारत के ज्ञान का सारांश है। जो सिर्फ कर्तव्य कर्मों की शिक्षा देता, वास्तविकता की शिक्षा देता है, सृष्टि के मूल सिद्धांत का शिक्षा देता है। कहते हैं वेदव्यास जी को महाभारत ग्रंथ के रचना के बाद उन्हें पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुई तो उन्होंने इसी के अंदर श्रीमद्भागवत गीता का विस्तार किया। जोकि महाभारत का मूल सिद्धांत के रूप में आज प्रचलित है, श्रीमद्भागवत गीता।
श्रीमद्भागवत गीता कहा जाए तो यह मात्र एक वेद ग्रंथ सारांश नहीं है। यह तो सृष्टि का संविधान है। एक ऐसा नियम जिसके आधार पर जीव अथवा प्रकृति अपने आप पर चलने के लिए बाध्य है। कोई कहे कि हम को यह नियम स्वीकार नहीं है कोई बात नहीं, इससे नियम को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, इससे व्यक्ति को फर्क पड़ेगा। नियम तो जैसा कहा वैसा क्यों रहने वाला है।
एक हमारे ना मानने से प्रकृति किसी प्रकार भी अपना नियम नहीं बदलती। क्योंकि वास्तव में हर प्रत्येक व्यक्ति यह बात भली-भांति जानता है कि हम सब प्रकृति के अधीन हैं, प्रकृति किसी प्रकार भी हमारे अधीन नहीं है। इसी प्रकार यह संपूर्ण जगत एक परमेश्वर की अधीन है, परमेश्वर किसी प्रकार भी अंश मात्र भी दूसरे किसी की अधीन नहीं है।
धरती पर अनेकों ने अपने अनुसार से नियम बना दिए और बहुत उसका पालन भी करते हैं। परंतु हमारे अपनी नियम बनाने से वास्तविक नियम को कोई फर्क नहीं पड़ता।प्रकृति अपने द्वारा सृष्टि की रचना करती है और एक दिन प्रकृति ही अपने द्वारा सृष्टि का विनाश कर देती है यह सत्य और चित्र परिचित हैं।
श्रीमद्भागवत गीता को श्री कृष्ण ने कृष्ण बनकर नहीं कहा, नहीं उन्होंने विष्णु बनकर कहा, यह सभी उन्होंने एक अधिष्ठाता बनकर कहा, जो श्री कृष्ण और विष्णु से भी कहीं ऊपर। इसीलिए मैं कहता हूं कि श्रीमद्भागवत गीता विष्णु और श्री कृष्ण की वाणी नहीं है।
श्रीमद्भागवत गीता उस परमेश्वर की बानी है, जो कहीं कृष्ण बनकर, कहीं शंकर बनकर, कहीं श्री गणेश बनकर, कहीं बुद्ध बनकर तू कहीं पीपल का पेड़ बनकर इस सृष्टि को नियमित संचालित कर रहा है। वही परमेश्वर देवता भी है, दानव भी है, मानव भी है, और स्वयं ही प्रकृति भी हैं।
लोग कहते हैं कि गीता श्री कृष्ण की वाणी है विष्णु की वाणी, इसलिए फिर आती है कि यह वैष्णव का है। गीता की रचना वेदव्यास जी के हाथों द्वारा हुआ तो श्रीमद्भागवत गीता को वेदव्यास जी की वाणी नहीं कहा जा सकता।
श्रीमद्भागवत गीता बिना किसी लाग लपेट प्रकृति का संविधान प्रस्तुत करता है। कहीं-कहीं सनातन धर्म में ही मतआंतर की बात आती है। जिसके आधार पर सनातन धर्म कहीं-कहीं परिहास का विषय बनता है। जबकि वास्तव में जितने भी वेद ग्रंथ है सभी हमारे वेदों पर ही आधारित है। शिव स्वरूप से नहीं है, शिव भक्तों के लिए स्वरूप से है। अनंत परमेश्वर भी स्वरूप से नहीं है, वह फिर भक्तों के लिए स्वरूप से है।
शिव शंकर अपनी शक्ति के लिए पूजे जाते हैं। श्री राम और कृष्ण ने कभी नहीं कहा मेरी पूजा करो, उनके चरित्र को लेकर भक्तों ने, अथवा प्राचीन सनातनी ने, उन्हें अपना भगवान माना, और यह माना कि ऐसा कर्म, ऐसा चरित्र सिर्फ और सिर्फ भगवान ही कर सकते हैं और कोई दूसरा नहीं कर सकता।
वास्तव में परमेश्वरी एक ही है, यदि हम संक्षेप में कहें, तो शिव ही स्वरूप से विष्णु है कृष्ण है राम है। श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा सहयोग ग्रंथ है जिसे व्यक्ति बहुत कम समय में, इस ब्रह्मांड के रहस्य, परमेश्वर के रहस्य, भक्ति के रहस्य, कर्म के रहस्य, स्वरूप के रहस्य तथा अपने आप की स्थिति के रहस्य को व्यक्ति बहुत आसानी से समझ सकता है। किसको श्रीमद्भागवत गीता कहते हैं।
श्रीमद्भागवत गीता बहुत ही सरल है और गीता जी को वेद उपनिषद का सारांश कहा जाता है। धरती पर अनेक ग्रंथ मौजूद है और व्यक्ति ग्रंथ के कुछ भाग को अपने स्वभाव के अनुसार स्वीकार कर लेते हैं तथा अस्वीकार किए गए भाग को नजरअंदाज कर जाते हैं। इस प्रकार इतिहास में भी होता था अभी भी होता है और आने वाले भविष्य में भी होता रहेगा।
जैसे सभी प्रकार के अच्छे आचरणों में कोई एक भी बुरा आचरण प्रदर्शित हो जाता है, तो वह एक आचरण सभी अच्छे आचरण पर प्रभाव डालता है। वैसे ही एक धर्म ग्रंथ का जो भाग व्यक्ति अस्वीकार कर जाते हैं, वही एक भाग उस व्यक्ति के स्वीकार किए गए भाग के ऊपर असर डालता है। वास्तव में कहा जाए तो व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण व्यक्ति स्वयं करता है। जैसा कि श्रीमद्भागवत गीता में ७०० श्लोक है, और व्यक्ति कौन से श्लोक को स्वीकार करेगा अथवा नजरअंदाज करेगा यह उसके मनोभाव के ऊपर निश्चित रहता है।
यह बात हर जगह लागू होता है, किसी के सामने दिए गए वक्तव्य का कौन सा हिस्सा व्यक्ति स्वीकार करेगा यह उस व्यक्ति के अपने आदत, मानसिक स्थिति के ऊपर निर्भर करता है। एक छोटे विद्यार्थी का दिमागी स्तर खाली कंप्यूटर के सदृश्य होता है, उसके सामने जो कुछ दिखाया जाए वह उसे स्टोर करता है। इसीलिए सनातन भारत में गुरुकुल का सिद्धांत चला रहा था, जहां बच्चे को अपने और पराए तथा मित्र और शत्रु से दूर रखा जाए। जब वह बच्चा बड़ा हो तो किसी ऐसे व्यक्ति का प्रभाव उसके ऊपर ना पड़े जो गलत और उसके पूरे जीवन पर प्रभाव डालता हो। वह विद्यार्थी बड़ा होकर अपने सगे संबंधियों के विचारों से भी दूर अपने विचार से निश्चित करें कि क्या अच्छा है अथवा क्या बुरा।
दुनिया का परिचय एक विद्यार्थी किताब के द्वारा पाता है, परंतु जीने की कला उसे अपने साथ के परिवेश से मिलता है। एक विद्यार्थी के खाली दिमाग रूपी कंप्यूटर में यदि कोई अनुचित सिद्धांत स्टोर हो गया हो, तो वह विद्यार्थी पूरा जीवन उसी सिद्धांत के ऊपर गलत करता रहेगा। क्योंकि वह सिद्धांत उसके जीवन में जगह ले चुका होता है। उस स्टोर हुए सिद्धांत को कोई डिलीट नहीं कर सकता। स्वयं वह विद्यार्थी भी थोड़े समय के लिए उस सिद्धांत को नजरअंदाज तो कर सकता है, परंतु वह भी डिलीट नहीं कर सकता।
पहले समाज में गुणवान का प्रधानता था, और आज धनवान का प्रधानता है। किसी के पास धन होना कोई गलत नहीं है, परंतु किसी विद्यार्थी को, अथवा एक मानव बीज को जो कल का आने वाला भविष्य होगा उसके अंदर धनवान का बीज बोना गलत है। क्योंकि जब वह वयस्क होता है तब वह सिर्फ धन के बारे में नहीं सोचता बल्कि वह धनवान बनने के चक्कर में अंधा बन चुका होता है। तब तक उसके सामने रिश्तेदारी और दुनियादारी का कोई महत्व नहीं रहता। यही कारण है कि आज समाज में एक पिता अपने पुत्र के लिए बहुत सारा धन एकत्र तो करता है परंतु उसे एकत्र करने का फल उस पिता को नहीं मिलता तथा वही धन उसके पुत्र को कुपुत्र बनाने में मदद करता है।
श्रीमद्भागवत गीता में एक श्लोक है-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(तृतीय अध्याय, श्लोक 21)
अर्थात- श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण यानी जो-जो काम करते हैं, दूसरे मनुष्य भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं।
श्रेष्ठ होना अच्छा है परंतु एक अश्रेष्ठ को श्रेष्ठ होने का मतलब समाज में उसके द्वारा अश्रेष्ठता का प्रचार करना होगा, ऐसे सिद्धांत का प्रचार करना होगा जो समाज को गर्त में लेकर जाएगा। सनातन वेद साहित्य उस गलत प्रचारक को समाज का दुश्मन कहता है।
“श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान का एक समंदर है, जो डूब गया वह तृप्त हो गया।”
ॐ आनंद: