परमेश्वर एक माँ की तरह हैं। जिस प्रकार माँ अपने बच्चे से प्रेम करती है और उसके बदले में कुछ नहीं चाहती, उसी प्रकार परमेश्वर भी अपने भक्तों से निस्वार्थ प्रेम करते हैं। यद्यपि परमेश्वर सबके प्रति समान व्यवहार करते हैं, परंतु जो उनका अनन्य भक्त होता है, परमेश्वर उसके साथ माँ की तरह स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं।
माँ अपने बच्चे के हित के लिए हर वह कार्य करती है जो आवश्यक होता है। यदि बच्चे के भले के लिए उसे रुलाना भी पड़े, तो वह संकोच नहीं करती। क्योंकि उसका उद्देश्य केवल बच्चे का कल्याण होता है। ठीक उसी प्रकार, भगवान भी अपने भक्तों के लिए सदैव शुभ ही करते हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो भगवान के हृदय में भक्तों के लिए वात्सल्य का असीम भंडार है, जो कभी समाप्त नहीं होता।
बच्चे को क्या चाहिए, यह माँ से बेहतर कोई नहीं जानता। उसी प्रकार, भक्त को क्या चाहिए, यह भगवान से बेहतर कोई नहीं जानता। जैसे किसी सेवक की आवश्यकताओं को उसका स्वामी भली-भाँति जानता है, वैसे ही परमेश्वर अपने भक्तों की हर आवश्यकता को जानते हैं।
दुनिया में कौन बेचैन है, यह उससे पूछो जिसे रात में नींद नहीं आती। तकलीफ़ क्या होती है, यह उससे पूछो जिसे मृत्यु के समय पानी पिलाने वाला कोई अपना न मिले। और यह भी समझो कि जो व्यक्ति बार-बार भगवान से मृत्यु की भीख माँग रहा हो, उसे तकलीफ़ का वास्तविक अर्थ पता होता है।
निष्कर्ष
ईश्वर अपने भक्तों को कभी दुख नहीं देते। वे केवल उन्हें परखते हैं, तपाते हैं और योग्य बनाते हैं — ताकि वे अंततः उस परम शांति और प्रेम को प्राप्त कर सकें जो स्वयं ईश्वर हैं। जैसे माँ के डाँटने में भी स्नेह छिपा होता है, वैसे ही भगवान की हर परीक्षा में उनके अनंत प्रेम का आशीर्वाद छिपा होता है।
इसलिए, परमेश्वर के विधान में उनके क्रोध को मत देखो। वास्तव में, परमेश्वर अपने भक्तों को अपने समीप बुलाने से पहले उन्हें अपने जैसा बना देना चाहते हैं। संसार में जहाँ भी किसी को कोई बड़ी वस्तु दी जाती है, तो पहले उसे उसके योग्य बनाया जाता है; क्योंकि जो अयोग्य है, वह उस वस्तु को संभाल नहीं सकता। इसी प्रकार, परमेश्वर भी अपने भक्तों को कुछ देने से पहले उन्हें योग्य बनाते हैं।
इसलिए, परमेश्वर की भक्ति में अपने दुख या तकलीफ़ को मत देखो। स्वयं को उस परमेश्वर की स्मृति में पूर्ण रूप से समर्पित कर दो। उनसे विनम्रता पूर्वक प्रार्थना करो —
“हे परमेश्वर! मेरे लिए कुछ भी शेष न रखना। यदि तू मुझे नरक में भी भेजेगा, तो भी मैं जाने को तैयार हूँ। यह तन छूट जाए, परंतु तेरे मिलने की आस कभी न छूटे।
मेरा जीवन तेरा है, और इस पर तेरा संपूर्ण अधिकार है।
हे प्रभु! मेरी समस्त इच्छाओं पर तू ही अधिकार कर। मुझे व्यर्थ सांसारिक भावनाओं में भटकने मत दे।
हे स्वामी! मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं अपने जीवन के इस धर्मयुद्ध को सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर पूर्ण कर सकूँ।
यह शरीर नष्ट हो जाए, परंतु तुझ पर मेरा विश्वास कभी न टूटे।”