सनातन में ईश्वर नहीं थोपे जाते, चुने जाते हैं

सनातन धर्म में रामायण एक अद्वितीय ग्रंथ है, और उसमें वर्णित पुरुषोत्तम श्रीराम का चरित्र सर्वोपरि माना जाता है। रामायण केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक चरित्र-प्रधान ग्रंथ है, जो अनेक भाषाओं और टीकाओं में उपलब्ध है। समाज में इस ग्रंथ के साथ-साथ उसमें वर्णित चरित्रों की पूजा भी होती है। फिर भी कुछ लोग ग्रंथ और उसके पात्रों पर आक्षेप करते रहते हैं, जबकि किसी के लिए श्रीराम देवता हैं, किसी के लिए भगवान, किसी के लिए आदर्श पुरुष और किसी के लिए केवल साहित्यिक पात्र।

Sanatan Dharm


सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी-देवताओं का उल्लेख है। प्रश्न उठता है—इतने सारे देवता क्यों? हम इतने देवताओं की पूजा क्यों करते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि हमने बस सुन लिया, मान लिया और पूजना प्रारंभ कर दिया। परंतु जब कोई आक्षेप करता है तो हम प्रायः शांत रह जाते हैं—क्यों?

हमारे भीतर श्रीराम को मानने का एक स्वाभाविक मापदंड है। हमारा भगवान ऐसा है कि उसके बारे में कोई कुछ भी कह दे, हम सुन लेते हैं; हमें क्रोध करने या प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। समाज में कभी-कभी कहा जाता है कि “अमुक व्यक्ति बहुत बड़ा भगत है”, और हम यह सुनकर संतुष्ट हो जाते हैं कि हम स्वयं भी राम के निकट हैं। परंतु क्या यह सत्य है?



परमेश्वर की खोज

मानव आदिकाल से ही परमेश्वर की खोज में लगा है। महापुरुषों, संतों, ऋषियों, तपस्वियों ने अनेक प्रकार से उस परमसत्ता को समझने और अनुभव करने का प्रयास किया। उनमें से कुछ सफल भी हुए और उन्होंने अपने अनुभव को आने वाली पीढ़ियों के लिए विभिन्न रूपों में व्यक्त किया। वेद, शास्त्र, पुराण, उपनिषद, गीता—सभी यही बताते हैं कि परमेश्वर निराकार है, अनंत है, नित्य है, स्त्री-पुरुष से परे है, और समस्त शक्तियों का स्रोत है। वह ब्रह्मांड के कण-कण में विद्यमान है और संपूर्ण सृष्टि उसी में स्थित है।



33 करोड़ देवता क्यों?

अब प्रश्न आता है—राम क्यों? कृष्ण क्यों? लक्ष्मी क्यों? दुर्गा क्यों? गंगा-यमुना क्यों?
उत्तर सरल है—सनातन पद्धति में चरित्र ही पूजन का आधार है।
सनातन मार्ग में इष्ट का चयन सामाजिक दबाव से नहीं, बल्कि अपनी स्वेच्छा से होता है। वेद-शास्त्र बार-बार कहते हैं कि परमेश्वर बल, बुद्धि, योग या तप से प्राप्त नहीं होता; वह उसी को स्वीकार करता है जो उसके योग्य बनता है।

इसी स्वेच्छा के कारण सनातन परंपरा में बाध्यता कभी नहीं रही। यही कारण है कि उसके अनुयायी भी स्वतंत्र हैं और विरोधी भी आलोचना करते रहते हैं। चाहे बाहर के हों या भीतर के—जो सनातन मार्ग की आलोचना करते हैं, वे वास्तव में उसके मूल सिद्धांत को समझ नहीं पाते।



चरित्र का महत्व

एक सत्य यह है कि संसार में हर संबंध चरित्र के आधार पर ही सम्मान देता है—पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र, परिवार, समाज—सब चरित्र के आधार पर मान देते हैं। इसे कोई झुठला नहीं सकता।

इसी प्रकार सनातन पद्धति में भी चरित्र सर्वोपरि है। इसलिए 33 करोड़ देवताओं का पूजन उनके चरित्र के कारण किया जाता है—किसी दबाव या क्रूरता के कारण नहीं। किसी भी देवता ने कभी किसी पर यह नहीं थोपा कि उसे मानना ही पड़ेगा। भक्तों ने स्वयं उनके चरित्र से प्रभावित होकर उन्हें इष्ट बनाया।

इसीलिए सनातन पद्धति अद्वितीय है—यह चरित्र की स्वतंत्र पूजा है।

राम-आलोचना और सत्य

जो आलोचक हैं, वे प्रायः न अपने मूल को जानते हैं, न अपने चरित्र को। जो अपने चरित्र को नहीं समझता, वह दूसरों के चरित्र की निंदा करने में संकोच नहीं करता। आज भी समाज में सम्मान, पुरस्कार, निंदा, दंड—सब चरित्र पर आधारित हैं।
इसीलिए उत्तम चरित्र वाला अनुयाई नहीं बनाता, उसका चरित्र स्वयं उसके अनुयाई बनाता है।



श्रीराम का चरित्र क्यों सर्वोपरि है?

राम चाहे ऐतिहासिक हों या काल्पनिक, पर उनका चरित्र सर्वश्रेष्ठ है। उनका अनुयायी उन्हें भयवश नहीं, प्रेमवश मानता है। इसलिए वे भगवान, परमेश्वर, ब्रह्मस्वरूप माने जाते हैं।

राम ने अपना जीवन दूसरों के लिए जिया।

पिता की आज्ञा के लिए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया।

विजय के बाद भी राज्य पर अधिकार नहीं जताया।

सदैव सबको मान दिया।

समाज में किसी प्रकार की विपरीत धारणाएँ न उभरें—इस हेतु अपनी पत्नी तक का त्याग कर दिया।

सत्ता रहते हुए भी जनता की इच्छा को सर्वोपरि रखा।


ऐसे ही पुरुषों को पुरुषोत्तम कहा जाता है।
रामराज्य की तुलना स्वर्ग के अमरावती से इसलिए की जाती है, क्योंकि वहां न्याय, करुणा और धर्म सर्वोच्च थे।

कोई किसी को कुछ समय के लिए भ्रमित कर सकता है, पर उत्तम चरित्र की छाप मिटा नहीं सकता। जब-जब किसी युग में पुरुषोत्तम चरित्र प्रकट होगा, तब-तब वह राम कहलाएगा। और उस राम के लिए युगों-युगों तक पूजा, जप, तप और योग होते रहेंगे।



निष्कर्ष अमृत

श्रीराम का चरित्र ही उन्हें भगवान बनाता है।
सनातन पद्धति में कोई बाध्यता नहीं, केवल चरित्र का आकर्षण है।
जो राम को नहीं मानते, वे भी राम जैसा पुत्र, पति, भाई, राजा—सबकी इच्छा रखते हैं।
यही रामचरित की वास्तविकता है।

उत्तम चरित्र सदैव पूजनीय होता है, और राम-चरित्र सर्वोपरि है।
आनंद।

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