मन का रणक्षेत्र: सुमति–कुमति और सुख–दुःख का सत्य

वास्तव में शरीर के भीतर ही इंसान और शैतान दोनों बसे होते हैं। जहाँ इंसान का जिक्र होता है, वहीं शैतान का भी उल्लेख होता है। किसी व्यक्ति के अंदर इंसानियत है तो वह इंसान है, और यदि उसके भीतर शैतानीयत है तो वह शैतान है। शैतान कहीं बाहर नहीं, बल्कि शरीर के अंदर ही मौजूद है।

बचपन में लगभग सभी ने दादा-दादी की कहानियाँ सुनी होंगी और तरह-तरह के रंग-बिरंगे शैतानों की कल्पनाएँ की होंगी। संसार में जो अच्छा करता है वह इंसान है और जो बुरा करता है वह शैतान है। सनातन सत्य के एक लेख में कहा गया है कि देवता और दैत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—जो देने का काम करता है वह देवता है और जो लेने का काम करता है वह दैत्य।

मन का रणक्षेत्र: सुमति–कुमति और सुख–दुःख का सत्य

इसी प्रकार इंसान और शैतान भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक-दूसरे से जुड़े हुए। परमेश्वर ने शैतान के लिए अलग से कोई फैक्ट्री नहीं बनाई। यदि मनुष्य मनन करे तो उसे स्वयं पता चल जाएगा कि अच्छा और बुरा दोनों उसके भीतर मौजूद हैं। जिसके अंदर बुराई को दबाने की क्षमता है वह इंसान है, और जिसके भीतर अच्छाई को दबाने की क्षमता है वह शैतान है।

एक ही मनुष्य के भीतर इंसान और शैतान रूपी दो प्रवृत्तियाँ रहती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि दोनों ही जीवित हैं। किसी व्यक्ति के अंदर जो गुण अधिक प्रभावी होता है वही दूसरे गुण को दबा देता है। जिसके भीतर शैतानी गुण अधिक हों वह अपने इंसान-स्वभाव को दबा लेता है। वह व्यक्ति भी इंसान ही है, परंतु उसके भीतर के इंसानी गुण दबे हुए होते हैं, जिसके कारण वह शैतान के गुणों से प्रभावित होकर व्यवहार करता है। इसी कारण शैतानी भावना उसे अपने वश में कर लेती है।

दूसरी ओर जिसके भीतर इंसानियत अधिक है, वह इंसानी गुणों से प्रभावित होता है और अपने आचरण से स्वयं को एक श्रेष्ठ इंसान सिद्ध करता है।

यह सब गुणों के आधार पर निर्धारित होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में गुणों का विस्तार से वर्णन है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। गीता में इन गुणों के लक्षण तथा इनके प्रभाव बताए गए हैं। गीता का संदेश यही है कि मनुष्य को तीनों गुणों से ऊपर उठकर निर्गुण अवस्था में प्रवेश करना चाहिए। शरीर के भीतर भावना ही सबसे महत्वपूर्ण है। यही भावना गुण बनकर शरीर और मन को अपने कब्जे में रखती है। सनातन वेद-पुराण बार-बार कहते हैं कि सांसारिक भावनाओं से ऊपर उठकर परमेश्वर की भावना में डूब जाओ। सनातन साहित्य सदैव मुक्ति की बात करता है। संक्षेप में कहें तो गुण ही संसार है और गुण ही बंधन। जो व्यक्ति इन भावनाओं से ऊपर उठ जाता है वह मानो अमर हो जाता है। मृत्यु भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती, क्योंकि वह जन्म और मृत्यु से ऊपर उठ चुका होता है।

श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई है—

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥

तुलसीदास जी कहते हैं—
हे नाथ! पुराण और वेद कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि सभी के हृदय में रहती हैं। जहाँ सुबुद्धि होती है वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ (सुख) रहती हैं, और जहाँ कुबुद्धि होती है वहाँ अनेक प्रकार की विपत्तियाँ (दुःख) निवास करती हैं।

मनुष्य के भीतर अच्छा और बुरा दोनों ही मौजूद हैं। वह किन गुणों को सामने लाता है, यह उसी पर निर्भर करता है। अच्छा गुण व्यक्ति के लिए लाभकारी होता है और बुरा गुण विनाशकारी।




संसार में कुछ लोग बुरे कर्म करते हैं और पूछते हैं—भगवान ने हमें ऐसा करने क्यों दिया? अनेक लोग प्रश्न करते हैं कि जब सब कुछ परमेश्वर की इच्छा से होता है तो वह बुरा करने क्यों देता है? कोई पूछता है—ईश्वर एक को अमीर और दूसरे को गरीब क्यों बनाता है?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है—

परमेश्वर न किसी को सुख देता है, न दुःख; न किसी को अमीर बनाता है, न गरीब; न किसी को इंसान बनाता है, न शैतान। वह न किसी के अच्छे की इच्छा करता है, न बुरे की।

ईश्वर और प्रकृति एक सिक्के के दो पहलू हैं—शगुन दृष्टि से दोनों ही एक-दूसरे पर आश्रित हैं। परमेश्वर सृष्टि के निर्माण के लिए प्रकृति का सहारा लेते हैं और प्रकृति अपनी क्रियाओं के लिए परम शक्ति का।

सुख और दुख परमेश्वर द्वारा निर्मित नहीं; जीव स्वयं अपने कर्मों द्वारा सुख और दुख का निर्माण करता है। जो कहते हैं कि भगवान ने दुख क्यों बनाया, वे यह नहीं समझते कि सुख और दुख दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं। जैसे दिन और रात साथ-साथ चलते हैं, वैसे ही सुख और दुख भी एक-दूसरे के बिना अस्तित्वहीन हैं। जिसने सुख का अनुभव न किया हो वह दुख को नहीं पहचान सकता, और जिसने दुख न देखा हो वह सुख का अर्थ नहीं समझ सकता।

व्यक्ति की समस्त क्रियाएँ उसकी भावनाओं से संचालित होती हैं। वही भावनाएँ उसके कर्मों को जन्म देती हैं और वही कर्म उसे सुख-दुख का भोग कराते हैं। संत-महात्मा बार-बार कहते आए हैं—सुख की तमन्ना छोड़ दो, दुख आपके पास नहीं आएगा।

तुलसीदास जी का कथन याद आता है—
सुमति और कुमति सबके भीतर रहती है। सुमति है तो आनंद है, कुमति है तो दुख का भंडार।




अनेक प्रश्न करते हैं—एक व्यक्ति अमीर घर में क्यों जन्मता है और दूसरा गरीब घर में?
प्रकृति हर समय निर्माण में लगी है। मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने कर्मों और भावनाओं के आधार पर स्वयं सुनिश्चित करती है कि उसे कहाँ और किस प्रकार जन्म लेना है। अच्छा और बुरा—जो भी कर्म मनुष्य करता है, उसका फल उसे स्वयं भोगना पड़ता है। कोई अपनी बुद्धि या तर्क से प्रकृति को धोखा नहीं दे सकता। प्रकृति का यह नियम है कि कोई भी अपने कर्मफल को दूसरे को हस्तांतरित नहीं कर सकता।

भगवान ने जब अवतार लिया, तब भी उन्हें अपने कर्मफल भोगने पड़े—इससे प्रकृति के इस नियम की पुष्टि होती है।

कर्म करने में सावधानी अनिवार्य है। यदि कर्म में चूक हो जाए तो उसका फल सहना ही होगा, चाहे रोकर या हँसकर।

ईश्वर किसी प्रकार भी दोषी नहीं है, क्योंकि वह किसी के लिए कर्मफल का निर्माण नहीं करता। मनुष्य स्वयं ही अपने सुख-दुःख का निर्माता है।

जो लोग दुखी हैं यदि गहन चिंतन करें तो पाएँगे कि संसार में कौन है जो दुखों से रहित है? सुख का अभाव ही सबसे बड़ा दुःख है। यदि व्यक्ति सुख के पीछे झाँककर देखे तो पाएगा कि उसके पीछे भी दुःख खड़ा है।

ईश्वर या प्रकृति किसी के लिए नियम नहीं बदलते। जो इन नियमों के विरुद्ध जाता है उसका अहंकार प्रकृति के चक्र में पिसकर नष्ट हो जाता है। इस विराट प्रकृति के सामने किसी का अहंकार नहीं टिक सकता। प्रकृति उन सबकी हस्ती मिटा देती है जो अहंकार में उससे टकराते हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *