प्रेम, चिंतन और चेतना

क्या बलपूर्वक प्रेम प्राप्त किया जा सकता है? — नहीं, कभी नहीं।
प्रेम में यदि समर्पण न हो, तो वह प्रेम नहीं रह जाता। प्रेम में यदि आशा, स्वार्थ या अपेक्षा जुड़ जाए, तो वह भी प्रेम की श्रेणी से बाहर हो जाता है। ऐसा भाव मात्र शारीरिक आकर्षण या सोचा–समझा बौद्धिक आकर्षण हो सकता है, परंतु हृदय का शुद्ध प्रेम नहीं।

यदि दिल से दिल की बात करें, तो कोई भी व्यक्ति यदि किसी अन्य का चिंतन करता है, तो उसका प्रभाव अनिवार्य रूप से सामने वाले व्यक्ति पर पड़ता है। यह प्रभाव कितना गहरा होगा—यह इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों व्यक्तियों के बीच लगाव कितना प्रबल है। इतिहास गवाह है कि जब दो दिल एक-दूसरे के लिए धड़कते हैं और चिंतन करते हैं, तो दोनों परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। एक व्यक्ति दूसरे को अपने बारे में सोचने पर बाध्य कर देता है, और दूसरा व्यक्ति चाहकर भी उसके चिंतन के जाल से बाहर नहीं निकल पाता। यही बात प्रेम की भाषा भी हो सकती है और शत्रुता की भी।

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चिंतन का संबंध और उसका प्रभाव

मान लीजिए कि एक प्रेमी ने दूसरे को देखा। देखने मात्र से एक के भीतर प्रेम जागृत हो गया, जबकि दूसरे में वह भाव नहीं उभरा। फिर भी दोनों के बीच एक संबंध स्थापित हो चुका है। इसलिए जिसने प्रेम का चिंतन प्रारंभ किया, वह बार-बार अपने विचार सामने वाले की ओर भेजता है, और दूसरा व्यक्ति चाहे न चाहे, उनके प्रभाव में आने लगता है।

दूसरा उदाहरण यह कि दो व्यक्ति हों, जिनमें से एक ने दूसरे को देखा है और एक ने नहीं। जिसने देखा, वह उसका चिंतन करने लगेगा; परंतु जिसने न देखा, न सुना—उसके भीतर कोई विचार उत्पन्न नहीं होगा। ऐसी स्थिति में दोनों का चिंतन एक-दूसरे पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डालता।

इसी प्रकार दो शत्रु भी एक-दूसरे का निरंतर चिंतन करते हैं, जिससे शत्रुता जीवित रहती है और बढ़ती है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि जब एक पक्ष का कड़वाहट निकल जाती है, तो वही द्वेष धीरे-धीरे प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। यदि गहराई से देखें, तो प्रेम हो, द्वेष हो या लगाव—सबका मूल केंद्र चिंतन ही है। मन जिस विषय को जितना सोचता है, उतना ही वह उसके निकट खिंचता चला जाता है।

वेदों की दृष्टि से प्रेम और विषय-चिंतन

वेद साहित्य के अनुसार शरीर की सभी इंद्रियों को भोगी कहा गया है, क्योंकि यही इंद्रियाँ प्रकृति के विविध विषयों का अनुभव कराती हैं। सभी इंद्रियों का सीधा संबंध मन से है। जब तक कोई विषय इंद्रियों से संपर्क में न आए, तब तक वह मन के चिंतन में नहीं उतर सकता।

किसी विषय को सुनकर, देखकर, छूकर, सूँघकर या चखकर—मन उसके संबंध में विचार करने लगता है। यही विचार व्यक्ति को विषय की ओर झुकाव प्रदान करते हैं। चाहकर भी वह उस व्यक्ति या विषय के प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाता और उसमें प्रेम जैसा आकर्षण उत्पन्न हो जाता है।

किसी सामने वाले के प्रेम को समझने से पहले आवश्यक है कि हम अपने प्रेम की वास्तविकता को समझें। क्या हमारा प्रेम वास्तव में प्रेम है? या मात्र आदान-प्रदान पर आधारित एक संबंध है? यदि प्रेम पाने पर ही प्रेम बना रहे और न मिलने पर समाप्त हो जाए, तो वह प्रेम नहीं—केवल एक फ्रेम है।

कहते हैं—प्रेम तो परमेश्वर को भी झुका देता है, फिर प्रकृति की क्या औकात!
बलपूर्वक प्रेम कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता। प्रेम में समर्पण हो, तो प्रेमी स्वयं झुकता है।

प्रेम की सार्वभौमिकता

हम सभी प्रकृति के प्रति पहले से ही झुके हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति केवल ‘अच्छा’ चाहता है। विषय कभी किसी से प्रेम नहीं करते; प्रेम तो हम ही उनसे करते हैं। यह विषय की कमजोरी नहीं—यह हमारी प्रवृत्ति है, हमारी मानवता है। इसीलिए कहा गया है—
जिस हृदय में प्रेम बसता है, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं।


निष्कर्ष अमृत

प्रेम, चिंतन और मानव चेतना का मूल एक ही है—मन का आकर्षण।
मन जिस व्यक्ति या विषय का चिंतन करता है, उसे वही जीवन में महत्वपूर्ण लगने लगता है। प्रेम हो या द्वेष, दोनों एक ही मानसिक प्रक्रिया से उत्पन्न होते हैं—चिंतन से।

बलपूर्वक प्रेम न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही प्राप्त।
प्रेम तभी जन्म लेता है जब मन और हृदय स्वेच्छा से किसी के प्रति झुकते हैं। समर्पण, निष्काम भावना और हृदय की पवित्रता ही प्रेम को स्थायी बनाती है।

इंद्रियों के द्वारा विषय मन तक पहुँचते हैं और मन ही प्रेम या द्वेष का निर्माण करता है। अतः संबंधों की दिशा भी चिंतन से ही निर्धारित होती है। यदि चिंतन प्रेमपूर्ण है, तो प्रेम बढ़ेगा; यदि कड़वाहट है, तो शत्रुता टिकेगी; और यदि मन निर्लेप है, तो विषय का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अंततः—
प्रेम न तो बल से पाया जाता है, न आग्रह से; प्रेम तो हृदय की सहज प्रवृत्ति है।
जहाँ समर्पण है, वहीं प्रेम है; जहाँ स्वार्थ है, वहाँ प्रेम मात्र भ्रम है।

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