प्रेम की वास्तविकता

श्री कबीर दास जी को आज संसार में कौन नहीं जानता! संसार की वास्तविकताओं को अपने दोहों के माध्यम से सरलता से प्रस्तुत करने वाले कबीर दास जी भारत के अतुलनीय संतों में गिने जाते हैं। वे लंबे-चौड़े भाषणों की अपेक्षा संक्षेप में, दोहों के माध्यम से, गहनतम सत्य कह देने में विश्वास रखते थे। उनके दोहों को समाज ने बड़ी सरलता से समझा और अपनाया। कबीर दास जी के जीवन और वाणी पर विशेष चर्चा हम संत साहित्य में पाते हैं।

प्रेम की वास्तविकता

कबीर दास का एक अत्यंत प्रसिद्ध दोहा है—

“प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा प्रजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।। ”

अर्थ यह कि प्रेम न तो किसी खेत में उपजता है और न ही किसी बाजार में बिकता है। यह ऐसा तत्व है जिसे राजा हो या प्रजा—जो इसे चाहता है, उसे अपने अहंकार और गर्व का त्याग कर इसे अपनाना पड़ता है।

कबीर दास जी ने प्रेम का जो स्वरूप प्रस्तुत किया है, वह अत्यंत सरल, सत्य और जीवन के निकट है। यदि प्रेम किसी की जागीर होता, तो लोग उसका व्यापार कर लेते। परंतु वास्तविक प्रेम की कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। वह अपने आप में अमूल्य है—बेशकीमती है।

प्रेम को प्रकृति ने पृथ्वी पर मौजूद हर जीव के लिए एक अनिवार्य तत्व बनाया है। सबसे छोटा जीव भी अपने बाल्यकाल में माँ के स्नेह का आकांक्षी होता है। खेल की अवस्था में वह अपने हमउम्र साथियों का प्रेम चाहता है, और वयस्क होने पर उसे अपने जीवन-साथी के प्रेम की आवश्यकता पड़ती है।

आज संसार में जो लोग प्रेम की कीमत लगाने की कोशिश करते हैं, वास्तव में वे भ्रम में जी रहे हैं। वास्तविक प्रेम कभी बिकता नहीं। जो लोग मानते हैं कि वे अपने बल या प्रभाव से प्रेम प्राप्त कर लेंगे, वे मोहजाल में फँसे होते हैं। वे जो पाते हैं, वह प्रेम नहीं—प्रेम का केवल एक फ्रेम होता है।

वास्तविक प्रेम का मूल्य केवल प्रेम है।
“प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।”
प्रेम न खेत में उपजता है, न किसी बाजार में मिलता है। उसके लिए राजा और प्रजा दोनों समान हैं।

जिस भावना को लेन-देन या लाभ-हानि की कसौटी पर तौला जाता है, वह प्रेम नहीं बल्कि सौदा है। किसी कारणवश की गई हमदर्दी या व्यवहार में प्रयुक्त सौजन्य भी प्रेम का स्थान नहीं ले सकता। व्यापार में इस्तेमाल होने वाला प्रेम कभी मुद्रा नहीं बन सकता।

प्रेम तो मानो एक ऐसे ‘प्रेम-नगर’ का राजा है, जहाँ केवल प्रेम चलता है। वहाँ कोई मुद्रा, कोई दिखावा, कोई बाहरी आवरण नहीं चलता। प्रेम के साम्राज्य में केवल प्रेम का ही शासन होता है।

कबीर कहते हैं—

“राजा प्रजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।”

प्रेम अंधा कहा जाता है क्योंकि वह सामाजिक बंधनों को नहीं मानता। प्रेम का परिभाषा स्वयं प्रेम है। उसका संसार भी प्रेम है और उसकी कीमत भी प्रेम ही है।

मनुष्य को यदि संसार की सभी सुविधाएँ भी मिल जाएँ, तब भी तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति तो केवल वास्तविक प्रेम से मिलती है। कहा गया है कि भगवान भी प्रेम से ही प्राप्त होते हैं। सनातन साहित्य बार-बार स्पष्ट करता है कि परमेश्वर जप, तप, हवन या पूजन से नहीं—बल्कि प्रेम से प्राप्त होते हैं।

भावना-विहीन व्यक्ति एक पशु के समान है। भावना प्रकृति का सबसे मूल्यवान गुण है।

हर कोई प्रेम को समझता है और प्रेम चाहता भी है। परंतु प्रेम पाने के लिए अपने भीतर भी प्रेम होना आवश्यक है। यदि व्यक्ति प्रेम के बदले प्रेम न देकर केवल ‘फ्रेम’ देगा, तो उसे बदले में फ्रेम ही मिलेगा।

शारीरिक आकर्षण या क्षणिक आलिंगन को भी प्रेम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसमें निस्वार्थ भाव नहीं होता। कुछ क्षणों के लिए किया गया समर्पण वास्तविक प्रेम नहीं, बल्कि मात्र शारीरिक आवश्यकता होती है।

वास्तविक प्रेम स्वार्थ की पूर्ति के बाद भी अटूट रहता है। स्वार्थ के लिए किया गया प्रेम, प्रेम नहीं—फ्रेम मात्र है। क्योंकि प्रेम का मूल्य केवल प्रेम है।

इसीलिए हमारे पूर्वजों और महात्माओं ने कहा है—
प्रेम चाहिए तो प्रेम बाँटो।
अपने प्रेम का विस्तार करो। दिखावे का प्रेम कभी मानसिक शांति नहीं देता। व्यक्ति पूरी उम्र अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने में संघर्ष करता है और कई बार अधूरी प्यास लिए ही संसार से विदा हो जाता है।

वास्तविक प्रेम पवित्र होता है। वह संसार में बदबू नहीं, बल्कि सुगंध फैलाता है—ऐसी सुगंध कि राजा भी अपना सिर झुका दे। प्रेम वह तत्व है जिसमें जीने का भी आनंद है और मरने का भी। सुख में भी प्रेम आनंद देता है और दुःख में भी, क्योंकि प्रेम स्वयं आनंद का स्वरूप है।

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