सनातन धर्म में ईश्वर का स्वरूप

सनातन धर्म एक अत्यंत प्राचीन और अनुभूत-आधारित विचारधारा है, जिसका उद्देश्य सृष्टि की वास्तविकता को जानना और समझना है। सनातन परंपरा में ईश्वर का स्वरूप अत्यंत गहन और व्यापक विचार का विषय है। समझ की कमी के कारण समाज में प्रायः देवताओं को ही जन्मदाता मान लिया जाता है, जबकि शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि कल्प के अंत में देवताओं का भी अंत होता है। यदि उनका अंत है तो उनका कोई जन्मदाता अवश्य होगा। अतः वह परम ईश्वर देवताओं से भी भिन्न है, और स्वयं देवता भी उसी परम सत्ता का ध्यान करते हैं।

ग्रंथों और पुराणों में ईश्वर का स्वरूप कहीं भगवान विष्णु, कहीं शिव-शंकर या कहीं आदिशक्ति के रूप में प्रकट किया गया है। जिसने देवताओं सहित सम्पूर्ण प्रकृति का निर्माण किया—उस परम सत्ता की कल्पना एक महान भक्त अपने भाव, श्रद्धा और अनुभव के अनुसार कर सकता है। भक्त उसे जिस रूप में देखता है, वह उसकी व्यक्तिगत श्रद्धा का परिणाम होता है।

सनातन धर्म में ईश्वर का स्वरूप


गायत्री मंत्र का वास्तविक संदेश

वेदों का एक महान मंत्र अत्यंत प्रसिद्ध है—

।। ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यम्
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

अर्थ: हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, पापनाशक, तेजस्वी परमात्मा को अपने अंतःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

सनातन धर्म में यह मंत्र सभी प्रकार के शुभ और परमार्थिक कार्य के आरम्भ में लिया जाता है। गायत्री मंत्र की तुलना किसी अन्य से नहीं की जा सकती। यह अपने आप में सर्वशक्तिमान, पवित्र और पूर्ण है।

गायत्री मंत्र वास्तव में कहता क्या है?

यह मंत्र ईश्वर से एक विनम्र प्रार्थना है—
*“हे ईश्वर! मैं तुम्हें पूर्ण रूप से नहीं जानता। तुम्हारा वास्तविक स्वरूप क्या है? तुम कहां निवास करते हो? तुम कैसे प्राप्त होते हो? तुम्हारे नियम और विधान क्या हैं? मुझे यह सब ज्ञात नहीं। हे जगत के रचयिता! तुम ही प्राणस्वरूप, तुम ही दुखों को नष्ट करने वाले, तुम ही सुख और पवित्रता के स्रोत हो। मेरे पापों का नाश केवल तुम कर सकते हो। मुझे वह चिंतन शक्ति दो, वह विवेक दो, जिससे मैं तुम्हें अंतःकरण में धारण कर सकूं। मेरा कल्याण करो और मेरी बुद्धि को सत्य मार्ग में प्रेरित करो।”

गायत्री मंत्र प्रत्येक जीवात्मा के लिए मार्गदर्शक है। इसमें कोई जाति, पंथ या संप्रदाय नहीं है। यह मंत्र केवल उस परम ईश्वर की ओर संकेत करता है जिसने संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की—चाहे उसे कोई भी नाम या रूप दिया जाए।




सनातन धर्म में ईश्वर की धारणा

दुनिया के अनेक धर्मों से पृथक, सनातन धर्म में ईश्वर का स्वरूप ऋषियों के प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित है। उन्होंने ईश्वर की कल्पना नहीं की—उन्होंने ईश्वर को जाना, अनुभूत किया और जो जाना वही कहा।

सनातन दृष्टि के अनुसार—

ब्रह्म ही सत्य है।
ब्रह्म न पुरुष है, न स्त्री। वह केवल ब्रह्म है—न भगवान, न देवी, न देवता, न ब्रह्मा, विष्णु, महेश। वह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश भी नहीं। वह दुर्गा, राम, कृष्ण या बुद्ध नहीं है। उसके न माता-पिता हैं, न स्वामी।

तो फिर ईश्वर कहां है?

ईश्वर वह है जो समय और स्थान से अप्रभावित है। वह न धरती पर है, न आकाश में, फिर भी सर्वत्र है—एक साथ दूर भी और अत्यंत निकट भी। सृष्टि से पहले भी वही था और अंत में भी वही अकेला रहेगा। वह सभी प्राणियों की आत्मा में स्थित है, और आत्मा ही परमात्मा का अंश है। परंतु उसे तभी अनुभव किया जा सकता है जब मनुष्य आत्मवान हो।

माया के आवरण के कारण परमात्मा प्रत्यक्ष नहीं होता। परंतु वही इस संसार का आधार है, दिव्यलोक का अधिष्ठाता है, और इस विश्व में सदा विद्यमान सत्य है।




ईश्वर कैसा है?

सनातन धर्म में ईश्वर को सच्चिदानंद कहा गया है—

सत् — जो सनातन, साश्वत, अनादि-अनंत, अविनाशी है।

चित् — शुद्ध चेतना, बुद्धि, विचार और अनुभूति का स्रोत।

आनंद — वह परम सुख जिसकी प्राप्ति हीं जीवन का उद्देश्य है।


ईश्वर शुद्ध प्रकाश स्वरूप है, पर स्वयं प्रकाश नहीं। वह निराकार, निर्विकार और निर्विकल्प है। भक्तों द्वारा बनायी गयी मूर्ति में भी स्थित होते हुए भी उसकी कोई मूर्ति नहीं बन सकती, क्योंकि उसका स्वरूप जड़ नहीं, चेतन है। वह अजन्मा है—जिसका जन्म और मृत्यु हो, वह ईश्वर नहीं।

वह स्थिर होते हुए भी गतिमान है, और गतिमान होते हुए भी स्थिर। वह इस विश्व के भीतर भी है और बाहर भी।




सनातन धर्म में ईश्वर का कार्य

ब्रह्म न न्याय करता है, न अन्याय।
परंतु जो उसका ध्यान करते हैं, उनके साथ कभी अन्याय नहीं होता।

ईश्वर न किसी को भयभीत करता है, न किसी का पक्ष लेता है।
वह न आदेश देता है, न दंड या पुरस्कार बांटता है।

इस सृष्टि में हर जीव अपने कर्मों का फल स्वयं पाता है।
भाव और कर्म ही अगले जन्म या गमन का निर्धारण करते हैं।

इस ब्रह्म से ही सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है और उसी प्राण-शक्ति से गतिमान है। जो ब्रह्म को वज्र के समान अटल शक्ति मानते हैं, वे अमरत्व को प्राप्त होते हैं।




आत्मा से परमात्मा की ओर

समस्त वस्तु, विचार, भाव और सिद्धांतों से ऊपर आत्मा है।
आत्मा को जानना ही परमात्मा को जानने का मार्ग है। यही सनातन धर्म का मूल सत्य है।

हर युग में असत्य गढ़े जाते हैं, पर सत्य सदैव प्रकट होकर आता है। सनातन विचारधारा कोई गढ़ा हुआ दर्शन नहीं—यह प्रकृति से स्वयं उत्पन्न हुआ अद्वैत और सार्वभौमिक दर्शन है। भारतीय संस्कृति का आधार यही सनातन सिद्धांत है, जिसका मूल है—“वसुधैव कुटुम्बकम्”।


निष्कर्ष अमृत
सनातन धर्म के अनुसार ईश्वर किसी रूप, देवता या प्रतिमा तक सीमित नहीं, बल्कि निराकार, अनादि-अनंत, सर्वव्यापक ब्रह्म है। देवता भी उसी परम सत्य से उत्पन्न शक्तियाँ हैं। ईश्वर सृष्टि के बाहर भी है और भीतर भी, परंतु उसकी अनुभूति केवल आत्मबोध से होती है।

गायत्री मंत्र ईश्वर से बुद्धि, विवेक और सत्य मार्ग की प्रेरणा की प्रार्थना है। ईश्वर न दंड देता है, न पुरस्कार—प्रत्येक जीव अपने कर्मों के फल का अनुभव करता है। सनातन धर्म का मूल सत्य है—सच्चिदानंद ब्रह्म और सिद्धांत है—वसुधैव कुटुंबकम्।

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