आत्मा का रहस्य 03

सबको पता है शरीर से आत्मा जब निकलता है उसे वक्त कुछ भी नजर नहीं आता। जैसा कि मैंने कहा आत्मा दिखता नहीं इसका मतलब यह नहीं कहा जा सकता की आत्मा नहीं होता। आत्मा शरीर के अंदर रहकर यह जग को प्रमाणित करता है कि मैं हूं और मेरी शक्ति है। आत्मा बार-बार कहता है मुझे कोई झूठ ला नहीं सकता क्योंकि मेरी शक्ति से ही शरीर शक्तिमान है।

Aatma ka Rahasya


जब आत्मा शरीर से निकलता है उसके बाद भी शरीर में सभी अंग मौजूद रहता है। परंतु आत्मा के निकल जाने के बाद आंखें रहते हुए काम करना बंद कर देता। दिल भी रहता है परंतु वह धड़कना बंद कर देता है। हाथ पर सभी रहते हैं परंतु उसमें का शक्ति खत्म हो जाता है। शरीर के अंदर खून भी रहता है परंतु वह क्रिया करना बंद कर देता है। एक प्रकार से कहें तो आत्मा जब तक रहता है शरीर शक्तिमान रहता है और आत्मा जब जाता है तो शरीर की समस्त शक्तियों को निचोड़ कर चला जाता है।

जैसे हवा सामने तो रहता है परंतु दिखाई नजर नहीं आता। हम जिस ऑक्सीजन को लेकर जीवित हैं वह ऑक्सीजन भी दिखाई नहीं देता। ऐसे अनेक बहुत कुछ है जो आंखों से नजर नहीं आता परंतु हम यहां नहीं कह सकते कि वह नहीं है। मैंने पीछे भी कहा है की आत्मा को व्यक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि आत्मा नजर आने वाली वस्तु नहीं है।

वेदांत कहता है कि समस्त आत्माएं उस परमात्मा का अंश है। परमात्मा सर्वव्यापी है। इसे हम अलग प्रकार से समझने की कोशिश करेंगे। शरीर के लिए एक से बड़े एक वैज्ञानिक हुए परंतु उन्होंने यह स्थान नहीं बताया की आत्मा वास्तव में रहता कहां है। पहले कहा जाता था कि सब दिल के ऊपर निर्भर करता है। परंतु आजकल तो दिल भी बदले जा रहे हैं। ऐसे में आत्मा उसे बदले हुए दिल में नहीं हो सकता। हम अपने शरीर के सभी अंगों पर आत्मा को अनुभव कर सकते हैं।

शरीर पर हम आत्मा को अनुभव कर सकते हैं यह कैसे यह भी एक आश्चर्यच है। जिस मैं को हम मैं कहते हैं।  वह मैं तो हाथों के उंगली में भी है और पैर की उंगली में भी। क्या हम अपने शरीर के ऊंचाई अथवा मोटी को देखकर हम आत्मा बड़े और छोटे का कल्पना कर सकते हैं। नहीं… !  आत्मा या तो वह बच्चे का शरीर हो अथवा बड़े का आत्मा तो अपने एक निश्चित साइज में है।

एक चींटी अथवा मच्छर के अंदर भी आत्माएं वही है। ऐसा नहीं है कि चींटी के अंदर छोटी आत्मा है और हाथी के अंदर बाद आत्मा है। यह ईश्वर का कमाल है अथवा यह कर सकते हैं कि इस प्रकृति का कमाल है। धरती का छोटा से छोटा जीव जो हमें नजर नहीं आता वह भी खाता है वह भी गाता है वह भी हंसता होगा। उसकी भी अपनी दुनिया है।

जिन जीवो की हम भाषा नहीं समझ सकते जिन जीवों का हम भावना नहीं समझ सकते उन जीवों के बारे में जो कुछ भी कहे वह एक कल्पना होगा। आत्मा और शरीर के बीच में यह जीव की चर्चा कैसे हो गई। मित्रों अपनी आत्मा को समझने के लिए इस संसार में जितने प्रकार की आत्माएं हमें नजर आता है उन्हें सभी को समझना होगा अथवा समझने की कोशिश करना होगा।

कहते हैं कि अपने से तो अपने आप को सभी बुद्धिमान कहा करते हैं। दोस्तों ऐसा कोई इंसान नहीं है जिसे भगवान ने बुद्धि ना दिया हो बल ना दिया हो। परंतु सभी जीवो में इंसान अपने आप को सबसे बुद्धिमान समझता है। मेरे अनुसार से इंसानों में एक सबसे खास चीज है कि वह सबको अपनी मुट्ठी में करने का बल रखता है। परंतु ऐसा नहीं है कि दूसरे जीवों का महत्व हम इंसान से कम हो।


धरती पर हमें अनेक प्रकार के जीव मिलते हैं, जो अपने बुद्धिमत्ता, गतिशीलता, और समर्थता के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां कुछ उदाहरण हैं जो हमें यह सिखाते हैं कि जीवन की असीम सामर्थ्य और बुद्धिमत्ता किस प्रकार से विकसित होती है:

कॉरवेल कोबरा सांप: यह सांप अपनी बुद्धि और चालाकी के लिए प्रसिद्ध है। इसकी धारावाहिक गति और चेतना उसे अपने शिकार को पकड़ने में मदद करती है।

चिंगारी वाला कीड़ा: यह कीड़ा अपनी अत्यधिक गति के लिए प्रसिद्ध है, जो उसे उसके शिकार को पकड़ने में मदद करती है। इसका शरीर विशेष तरीके से विकसित होता है ताकि वह अपने लक्ष्य तक जल्दी से पहुंच सके।

पक्षी, जंगली जानवर, और समुद्री जीव: इन जीवों में भी अद्वितीय समस्याओं का सामना करने के लिए अनूठे तरीके से गुणवत्ता और उत्तरदायित्व दिखाया गया है। उनकी समझ, समन्वय, और विनियमितता उन्हें अपने परिसर में सहनशील बनाती है।

इन उदाहरण से पता चलता है कि धरती पर जीवों में बुद्धिमानता, गतिशीलता, और समर्थता की अद्भुत विविधता है।


ऐसे में हम यह नहीं कह सकते हैं कि की धरती का एकमात्र बुद्धिमान जीव इंसान हैं। धरती पर जीवों में ममता एक ऐसी चीज है जिसे हम इंसान अनेक जीवन में महसूस कर सकते हैं। प्रयास सभी जीवो में अपने बच्चों के प्रति ममता देखने को आया है। कहा गया है ममता एक प्राकृतिक गुण है।

इन बातों से यह सिद्ध हो गया की आत्मा का कोई रूप अथवा साइज नहीं है। या यह भी नहीं कह सकते हैं की आत्मा का कोई एक स्थान है। आत्मा एक कोने में भी बैठा हो सकता है और एक कोने में बैठकर शरीर के सभी अंगों में समान रूप से एक ही समय हो सकता है। अभी जैसा कि हमने कहा कि शरीर के अंदर स्थिति नहीं है किसी को पता की आत्मा कहां बैठा है। वैसे ही शरीर से निकलने के बाद आत्मा इस संसार में कहां बैठा है यह कोई नहीं कह सकता।

परंतु हम इन उदाहरण के आधार पर कह सकते हैं आत्मा शरीर से निकाल कर कहीं नहीं गया आत्मा तो वही है जहां पहले था। ऐसा भी नहीं है की आत्मा यहां है तो चांद पर नहीं है। क्योंकि आत्मा प्रकृति का हिस्सा नहीं है आत्मा उसे ईश्वर का हिस्सा है अथवा कह सकते हैं आत्मा इस ब्रह्मांड का हिस्सा है। एक ही आत्मा ब्रह्मांड के कोने-कोने में स्थित पाया जा सकता है।

ईश्वर के लिए व्याख्या भी ऐसा ही कहा जाता है। ईश्वर आत्मा रूप से हमारे अंदर विराजमान है। और हमारे अंदर विराजमान हैं इसका मतलब यह नहीं कि वह दूसरे के अंदर नहीं है। क्योंकि ईश्वर आत्मा स्वरूप है और वह एक जगह रहकर भी अनेक जगह अनेक रूपों में अनेक शक्ति के साथ स्थित है।

आत्मा को समझने के लिए परमात्मा का चिंतन करना भी अनेक आवश्यक है। मैंने जैसा कहा की आत्मा शरीर से निकाल कर कहीं नहीं जाता वह ब्रह्मांड का एक हिस्सा है और ब्रह्मांड में ही विलीन हो जाता है। हां यदि करने के उपरांत यदि कुछ जीवित रहता है तो वह भावनाएं जीवित रहता है।


क्योंकि शरीर में स्थित भावनाएं जिसे हमने स्वयं जन्म दिया हैं जिसका निर्माता हम स्वयं हैं। यह भावनाएं किसी का गुलाम नहीं है। भावनाओं का गुलाम हम हैं। जब शरीर से आत्मा निकलता है उसे समय इन भावनाओं का आत्मा एक प्रकार से गुलाम होता है। करने के उपरांत जीव अपनी भावनाओं के अनुरूप शरीर का तलाश करता है। प्रकृति में अनेक प्रकार के अनेक जीव विचरण कर रहे हैं। शरीर से निकला हुआ भावना रूपी प्राण अपने अनुरूप जीवन तलाश करता है। उसे फिर इस दुनिया से कोई लेना देना नहीं होता। हां यह बात जरूर है कि उसके भावना को किसी दूसरी भावनाओं ने यदि कैद कर रखा हो। सीधे शब्दों में कहें कि मरे हुए इंसान की भावनाओं को यदि दूसरे भावनाओं ने मजबूर कर रखा हो। तो वह भावनाएं अनिश्चितकाल तक उन अपने प्रेमी भावनाओं के इर्द-गिर्द घूम करती है।

इसलिए कहते हैं सब कुछ करो अपने भावनाओं को गंदा मत करो। इन भावनाओं से तुम ही आनंद उठाते हो और इन्हीं भावनाओं से दुख भी उठाते हो। यही भावनाएं कल्पनाओं में तुम्हें स्वर्ग का सुख भी देता है और कल्पनाओं में ही दुख भी दे जाता है। यह भावनाएं ही सर्वोपरि है।

अगले भाग में पढ़ें अपनी भावनाओं से कैसे खेले। क्योंकि जिस दिन आप अपने भावनाओं से खेलना सीख जाओगे उसे दिन आनंद नहीं परमानंद है।

 

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