एक ताकतवर को खत्म करने के लिए भगवान दूसरा पैदा करता है। यदि वास्तविकता में देखें तो यह प्रकृति का महामंत्र है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 4.7-8 ॥
जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ ।
साधुजनों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए, मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।
यह बात श्रीमद् भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं। हे अर्जुन! तेरे नहीं मारने पर भी मैं इन सबको करने वाला हूं। मैं स्वयं हीं काल का भी महाकाल हूं। भगवान यहां कितने स्पष्ट तरीके से समझने की कोशिश करते हैं। और कहते हैं कि देख तेरे सामने जितने खड़े हैं ना वह आगे भविष्य में अमर रहने वाले नहीं है सब मरने वाले हैं।
इस नियम को कोई सिर्फ हिंदू धर्म की व्याख्यान समझता है। किसी को श्रीमद् भागवत गीता से दिक्कत है तो वहां इस पद्धति को नहीं मानता। परंतु कहीं ना कहीं प्रकृति के इस नियम को वह जरुर जानता है और मानने पर मजबूर भी होता है।
क्योंकि यह प्रकृति का नियम है हर शेर को एक सवा शेर मिलता है और मिलता रहेगा। हर नहले पर एक दहला होता है। इस सिस्टम को कोई झूठ ला नहीं सकता। दुनिया में एक से एक तानाशाह व्यक्ति आए। सब ने ईश्वर से अपने लिए मौत की भीख मांगी। ईश्वर ने भी मौत उनके अनुसार से उनको नहीं दिया। वह ऐसे लोगों पर हंसता है और कहता है कि घबरा मत तेरे पीछे मैं एक काल छोड़ रखा है जो तुझे आएगा और निकल जाएगा।
तू कुछ भी कर ले तू आज लड़ सकता है, कल भी लड़ सकता है परंतु परसों क्या होगा। यह दुनिया का दस्तूर है जो पूरी दुनिया को सहारा देता है। एक दिन उसके शरीर को भी किसी के सहारे की जरूरत पड़ती है। भगवान सिर्फ एक को ताकत देकर पैदा नहीं करता। यदि किसी ताकतवर को पैदा करता है तो उसे खत्म करने के लिए भी अथवा ताकत दिखाने के लिए भी दूसरा ताकतवर पैदा करता है।
प्रकृति किसी ताकतवर से कहता है क्यों आंखें दिखा रहे हो। एक दिन ऐसा आएगा कि यह समाज तुम्हें आंखें दिखाएगा और तुम कुछ नहीं कर पाओगे। किसी के लाचारी पर हंसो मत क्योंकि एक दिन लाचारी तुम पर हंसेगी। वही ईश्वर कहते हैं तुम अपने आप को ताकतवर समझ कर अधर्म करोगे तो मैं स्वयं हीं एक नए रूप में तुमसे बड़े ताकतवर का इंसान का निर्माण करूंगा और उससे तुम्हारे अधर्म का नाश करूंगा।
प्रकृति में आज तक अनेकों लोग उत्पात मचाने के लिए आए और उत्पात मचाया। उन सभीं के ऊपर प्रकृति ने उत्पात मचाया। उन सभीं लोगों का नाश हो गया। ताकतवर होना बहुत उत्तम बात है परंतु ताकत का नाजायज फायदा उठाना सर्वनाश की ओर लेकर जाता है। बार-बार कहे जाते हैं “विनाश काले विपरीत बुद्धि।” जब किसी को विनाश आता है ना तो उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।
इसीलिए सिद्ध महापुरूष अनेंक शक्तियों का संचयन करने के बाद भी वह नहीं मानते की शक्ति हमारे अंदर हमारी अपनी है। वे सदैव उन शक्तियों को ईश्वर की शक्ति मानते हैं। इसके पीछे भी कहावत है बहुत अधिक बल इंसान के बुद्धि को खो जाता है। संसार में रावण से ज्यादा बलशाली कोई नहीं हुआ। रावण के पास बुद्धि भी कूट-कूट कर भरी थी। फिर भी रावण का बल उसके सारे सगे संबंधियों सहित का नाश कर दिया।
इसलिए हमारे महामानवों ने जो कुछ भी अच्छा किया उसका क्रेडिट भगवान को दिया। साथ ही जितना उसके जीवन में बुरा हुआ उसके पीछे स्वयं अपने आप को रखा। क्योंकि उन्हें यह बात भली-भांति पता था ईश्वर हर एक ताकतवर को मारने के लिए उससे बड़े ताकतवर को पैदा करता है। यह प्रकृति का वह नियम है जो कभी बदलता नहीं।