अजन्मा आत्मा

न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |
अजो नित्यः शाश्र्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे || २/२० ||

यहां भगवान  अपने विचार में स्पष्ट कहते हैं। “आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु | वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म लेगा |वह अजन्मा, नित्य, शाश्र्वत तथा पुरातन है | शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता।”

विचार तंत्र – अजन्मा आत्मा

अर्थात एक दृष्टि से देखा जाए तो मानव शरीर में जो महत्वपूर्ण है वह आत्मा है। क्योंकि आत्मा एक हीं रहता है और शरीर बदलते रहता है। किसी भी जीव की भावना को जीवित बताया जाता है। क्योंकि हमारा शास्त्र भावना से हीं मुक्त होने की बात करता है।

जीव की भावना आत्मा का आश्रय लेकर अपने शरीर का निर्माण करता है। जीव की आत्मा की व्याख्या भगवान अपने शक्ति से करते हैं। जैसे स्वयं ईश्वर अजन्मा है, ना जन्म लेता है और वह सदैव शाश्वत कहा गया है। भगवान वैसे ही आत्मा को भी बताते हैं। भगवान कहते हैं।जीव भोग के चक्कर में पढ़कर अपने आप को महत्व नहीं देता।

जैसे किसी भी जीव के शरीर का सबसे जो महत्वपूर्ण तत्व है वह आत्मा है। आत्मा के शरीर से निकलते ही शरीर निष्क्रिय हो जाता है। यह संसार भी उस शरीर को महत्व नहीं देता। परंतु भोग में फंसकर जीव आत्मा को महत्व नहीं देता। 

प्राचीन सभी महात्माओं ने भी अपने वक्तव्य में सदैव यही कहा है। ईश्वर की खोज पहले अपने अंदर करो। क्योंकि वह ईश्वर का अंश भी हम जीव के अंदर विद्यमान है। महात्माओं ने संसार में जीवन को ऐसे समझाया है। जैसे मानो समंदर के अंदर एक बर्फ का टुकड़ा हम स्वयं हैं। वह ईश्वर समंदर स्वरूप है।  जैसे हीं बर्फ को आभास होता है कि मैं भी पानी हूं,  वैसे हीं वह समंदर में विलीन हो जाता है।

रामायण में भी श्री तुलसी बाबा कहते हैं “ईश्वर अंश जीव अविनाशी।” जीव और ईश्वर अलग-अलग नहीं है। जीव जब तक ईश्वर को अपने से अलग मानता है तब तक वह अलग है। जैसे हीं वह मानता है कि वह भी ईश्वर का अंश है वह भी ईश्वर स्वरूप हो जाता है।

जीव की भावना ही बार-बार जन्म का कारण है। जबकि भगवान तो यहां कहते हैं। जीव की आत्मा तो नित्य, शाश्वत और पुरातन है। यह किसी के मारे जाने पर भी नहीं मारा जाता।

इसलिए महात्मा कहते हैं “ईश्वर से दिल लगाओ। अपने ईश्वर से प्रेम करो। भोगों से दिल लगाओगे , तो वहां छन भंगुर के जैसा होगा। क्योंकि प्रकृति में सब कुछ नष्ट होने वाला है। तुम उससे दिल लगाओगे जो नष्ट होने वाला है तो वह दुःख ही देगा। यदि ईश्वर से दिल लगाओगे तो ईश्वर इन सबसे ऊपर है। ईश्वर अमर है, ईश्वर से प्रेम करके तुम स्वयं भी अमर हो जाओगे।”

इस दृष्टि से देखा जाए तो जीव की आत्मा भोग का गुलाम है। या इसे ऐसा भी कहा जा सकता है जीव ने स्वयं अपने आप को भोगों के गुलाम बना रखा है। जिन महात्माओं ने इस पद्धति को समझा वे सदैव के लिए अमर हो गए। आज समाज में उन्हें भी भगवान का दर्जा प्राप्त है।

2 thoughts on “अजन्मा आत्मा”

    1. I said that you have a special art of playing with words. You travel very deeply in thoughts. In simple words, a person with a good personality also likes good things. Special thanks to you for sharing your thoughts and liking them! 🙏🙏

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