R. Sevak

Writer, Vicharak

माता को माता मत कहो

किसी को धरती को माता कहने में तकलीफ होता है। गंगा को गंगा माता कहने में तकलीफ होता है। प्रकृति को माता कहने में तकलीफ होता है। पंचतत्व से निर्मित यह प्रकृति अनेक जीव और वनस्पतियों का निर्माण करती है। एक दिन अंत समय में सभी निर्माण वनस्पति और जीव स्वत: पंचतत्व में विलीन हो […]

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यह पल वापस कल नहीं

जीवन का सफ़र बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता है। जो पल बीत जाते हैं, वे कभी लौटकर नहीं आते। अगर हम ज़रा गहराई से देखें, तो महसूस होगा कि समय हमसे कितनी तेज़ी से निकल रहा है। हर दिन, हर क्षण हमारे जीवन से कुछ न कुछ ले जाता है और कुछ नया दे जाता

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पहचान अपना कौन

कहने को तो इस संसार में सभी अपने होते हैं, कोई पराया नहीं लगता। परंतु जब जीवन में मुसीबत या लाचारी का समय आता है, तब वास्तविकता का अनुभव होता है और हमें सच्चे अपनों की पहचान मिलती है। सुख के समय जो साथ दिखाई देते हैं, वे दुःख के क्षणों में प्रायः दूर हो

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नाच न जाने आंगन टेढ़ा

इस कहावत का गूढ़ अर्थ यह है कि जब किसी कार्य में असफलता मिलती है, तो व्यक्ति अपनी असमर्थता स्वीकार करने के बजाय बाहरी कारणों को दोष देता है। जैसे नृत्य करना न आना कोई असामान्य बात नहीं है – कोई भी हर क्षेत्र में दक्ष नहीं हो सकता। लेकिन दोष अपने अभ्यास या प्रयास

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कृपा के लिए प्रार्थना

दीन दयाल बिरिदु संभारी।हरहु नाथ मम संकट भारी॥ अपने ईश्वर को खुश तथा प्रसन्न करने हेतु मानस में श्री तुलसी बाबा कहते हैं। दीनों और दुखियों के ऊपर स्वभाव से कतरूणा तथा कृपा करने वाले,  हे ईश्वर!  मेरे बहुत भारी संकट का निवारण करे। जिस प्रकार व्यक्ति ईश्वर के रूप का अपने अनुसार से चुनाव

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दिल में ईश्वर के लिए जगह

जिनके कपट, दम्भ नहिं माया।तिनके ह्रदय बसहु रघुराया॥ तुलसी बाबा कहते हैं जिनके अंदर पहले से कपट, दंभ और माया का निवास है उनके अंदर ईश्वर का वास नहीं होता। यदि हृदय में ईश्वर का वास कराना हो तो पहले इन सब तत्वों का त्याग आवश्यक है। घर में ईश्वर को बुलाने के लिए बहुत

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वैदिक पूजन व्यर्थ

शास्त्रोक्त जो भी पूजन क्रिया पूजन के लिए प्रचलित है। वह सभी एक भक्त के द्वारा अंतःकरण की भावना को प्रस्तुत  करने के लिए है। परंतु आश्चर्य की बात है आज के समय प्रयोजन के लिए क्रिया किया जाता है , वह प्रयोजन मात्र क्रिया बनकर रह गया है और क्रिया सिर्फ एक दिखावा के

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पोथी का ज्ञान

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित   भया   न   कोइ। श्री कबीर दास जी महाराज कहते हैं, पोथी पढ़कर अनेंक लोग इस दुनिया से चले गए फिर भी पोथी पढ़ कर कोई ज्ञानी नहीं हुआ।तार्किक ज्ञान और आत्मिक ज्ञान में जमीन आसमान का अंतर होता है। तार्किक ज्ञान व्यक्ति को उलझा कर रखता है जबकि आत्मज्ञान व्यक्ति

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