R. Sevak

Writer, Vicharak

बोए पेड़ बबुल के

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।नाथ पुरान निगम अस कहहीं।। समस्त ग्रंथों का सार श्री रामचरितमानस में तुलसी बाबा कहते हैं: पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि  सबके हृदय में रहती है। अर्थात अच्छी बुद्धि और दुष्ट बुद्धि सबके हृदय में रहता है। तुलसी बाबा अपने विचार से कहते हैं- अच्छा […]

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रामचरितमानस चिंतन-विचार

एहि महँ रघुपति नाम उदारा।अति पावन पुरान श्रुति सारा॥मंगल भवन अमंगल हारी।उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥ श्री तुलसीदास जी महाराज रामचरितमानस के लिए अपना विचार रखते हुए कहते हैं  : रामचरितमानस में श्री रघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, मंगल  करने वाला और अमंगल को हरने वाला है,

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मन का माला फेर

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ श्री कबीर जी महाराज यहां कितनी सुंदर विचार प्रकट करते हैं। वे कहते हैं – “देखो माला फेरते हुए बरसों हो गए । परंतु अफसोस फिर भी मन का विचार नहीं बदला। हाथ का माल छोड़ दो ,

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उत्तम कर्म उत्तम कर्मफल

होइहि सोइ जो राम रचि राखा।को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ यहां श्री गोस्वामी तुलसी बाबा अपने विचार में रहते हैं : “जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे।” इस चौपाई के ऊपर अनेक लोगों का अनेकों प्रकार का मत है। परंतु यहां मेरा कहना है इसका क्या

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अजन्मा आत्मा

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |अजो नित्यः शाश्र्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे || २/२० || यहां भगवान  अपने विचार में स्पष्ट कहते हैं। “आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु | वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म

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सुख का दुश्मन

भोगैश्र्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||२/ ४४ || अर्थात श्रीमद् भागवत गीता में भगवान कहते हैं – जो लोग इन्द्रियभोग तथा भौतिक ऐश्र्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्त होने से ऐसी वस्तुओं से मोहग्रस्त हो जाते हैं, उनके मनों में भगवान् के प्रति भक्ति का दृढ़ निश्चय नहीं होता। मनुष्य जन्म से हीं अपने

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ईश्वर का चिंतन-विचार

दिल में बसा ईश्वर का चिंतन कौन करै।जब मोह-माया से फुर्सत मिलै तब करै।। ईश्वर के चिंतक को निश्चित तौर पर मार्ग मिलता है। परंतु ईश्वर का चिंतक तो बनना पड़ेगा। जब ईश्वर से अटूट प्रेम होगा तब वह दिल में बस जाएगा। वास्तव में सबको सिर्फ आनंद चाहिए। वह जो सिर्फ आज का आनंद

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ईश्वर नाम चिंतन

उलटा नाम जपत जग जाना,बालमीकि भये ब्रह्म समाना।। श्री गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में कहते हैं।”यह संपूर्ण जगत को पता है, उल्टा नाम जप कर भी वाल्मीकि जी ब्रह्म के समान हो गए।” वेदांत कहता है परम शक्ति ब्रह्म को किसी ने नहीं देखा। जिसने देखा वह शब्दों के जरिए व्यक्त नहीं कर सकता। वेदांत

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दुःख से भाग नहीं सकते

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |अगामापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || २/१४ || श्रीमद् भागवत गीता में सुख दुःख के ऊपर भगवान कितना सुंदर विचार रखते हैं। वे कहते हैं – हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है | हे भरतवंशी! वे

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माया और मन की माया

माया मुई न मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर। कबीर जी महाराज अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं – मनुष्य का न तो मन मरता है और न ही उसकी इच्छाएँ समाप्त होती हैं। केवल उसका शरीर नश्वर है और वही मरता है। जीव जब तक मन और माया के मोह में फंसा रहता है,

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