R. E. Sevak

प्राकृतिक सिद्धांत का मूल – गीता

श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा ग्रंथ है, कि शायद ही कोई ऐसा हो जो इनके बारे में ना जानता हो। सनातन पद्धति के लिए अनेकों वेद पुराण ग्रंथ मौजूद है। सभी अपने आप में परिपूर्ण है, वास्तव में किसी से किसी की तुलना नहीं हो सकता, परंतु गीता जी के लिए कहा गया है की गीत […]

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भक्ति रस एक अमृत

भक्ति हीन गुण सब सुख कैसे,लवण बिना बहु व्यंजन जैसे।भक्ति हीन सुख कवने काजा,अस बिचारि बोलेऊं खगराजा॥ अर्थात : भक्ति के बिना गुण और सब सुख ऐसे फीके हैं, जैसे नमक के बिना विभिन्न प्रकार के व्यंजन। भजन विहीन सुख किस काम का। यह विचार कर पक्षीराज कागभुशुण्डि जी बोले। इस सुन्दर चौपाई चौपाई के

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ईश्वर-शक्ति चिंतन

“जिसने ईश्वर को देखा है, वह ईश्वर को व्यक्त नहीं कर सकता। यदि कोई ईश्वर को व्यक्त किया है इसका मतलब उसने ईश्वर को नहीं देखा।” आज तक प्राप्त जानकारी से हमें पता है कि ईश्वर के ऊपर, चिंतन करोड़ों वर्षों से होते रहा है। जिस किसी ने भी उस परम शक्ति ईश्वर से मन

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इंद्रियों की भोग शक्ति

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || २/५९ || भगवान श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन से कहते हैं –  देहधारी जीव इन्द्रियभोग से भले ही निवृत्त हो जाय पर उसमें इन्द्रियभोगों की इच्छा बनी रहती है | लेकिन उत्तम रस के अनुभव होने से ऐसे कार्यों को बन्द करने पर वह भक्ति

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मानव में त्रिगुण का जाल

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || २/४५ || भगवान श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन से स्पष्ट कहते हैं।वेदों में मुख्यतया प्रकृति के तीनों गुणों का वर्णन हुआ है ।हे अर्जुन! इन तीनों गुणों से ऊपर उठो | समस्त द्वैतों और लाभ तथा सुरक्षा की सारी चिन्ताओं से मुक्त होकर आत्म-परायण बनो ।

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अमृत छोड़ विष सेवन

एहि तन कर फल बिषय न भाई।स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥ ये श्री रामचरितमानस का बहुत चर्चित दोहा है। तुलसी बाबा यहां स्पष्ट कहते हैं।  हे भाई! इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषयभोग नहीं है। क्योंकि शरीर के सामने  स्वर्ग का भोग भी बहुत

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मंगल विचार सुमंगल फल

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ श्री गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं : जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ  अर्थात सुख और समृद्धि रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ विभिन्न प्रकार की विपत्ति-दुःख का वाश होता है। यह विचार प्रचलित है – जब व्यक्ति को धन ऐश्वर्य आता है

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विचारों से कर्म और सफलता

अनुचित उचित काज कछु होई,समुझि करिय भल कह सब कोई। तुलसी बाबा कार्य में सफलता के लिए स्पष्ट कहते हैं: किसी भी कार्य का परिणाम उचित होगा या अनुचित, यह जानकर करना चाहिए, उसी को सभी लोग भला कहते हैं। जैसे कहा गया है धनुष से तीर निकालने के बाद वापस नहीं होता। जिह्वा से

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कर्म के द्वारा फल

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || २/३० || भगवान ने कितने सरल भाषा में अपने शब्दों को कहा है। वे अर्जुन से कहते हैं- “हे भारतवंशी! शरीर में रहने वाले (देही) का कभी भी वध नहीं किया जा सकता । अतः तुम्हें किसी भी जीव के लिए शोक करने की

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