भक्ति रस एक अमृत

भक्ति हीन गुण सब सुख कैसे,
लवण बिना बहु व्यंजन जैसे।
भक्ति हीन सुख कवने काजा,
अस बिचारि बोलेऊं खगराजा॥

अर्थात : भक्ति के बिना गुण और सब सुख ऐसे फीके हैं, जैसे नमक के बिना विभिन्न प्रकार के व्यंजन। भजन विहीन सुख किस काम का। यह विचार कर पक्षीराज कागभुशुण्डि जी बोले।

भक्ति रस एक अमृत


इस सुन्दर चौपाई चौपाई के व्याख्या से पहले हम एक उदाहरण को समझते हैं। इंसान अपने युवा शरीर को भलीभांति समझ चुका है अथवा समझता है। सबको किसी न किसी तत्व से प्रेम होता है अथवा हुआ होगा। किसी को ऐश्वर्या से प्रेम होता है किसी को खाने से प्रेम होता है। किसी को धन संपत्ति से प्रेम होता है। किसी को व्यक्ति विशेष से प्रेम होता है। किसी को ईश्वर के रूप में भक्ति रूपी प्रेम भी होता है।

यह प्रेम अनेंक प्रकार से इंसान को दर्द भी देकर जाता है। दर्द ज्यादातर खोने का होता है। जो व्यक्ति  कुछ पाने वाला होता है उसकी अनुभूति होती है। जितना आनंद व्यक्ति को वस्तु को प्राप्त करने में आता है उससे कहीं गुना उसका चिंतन करने से आनंद प्राप्त होताहै।

चिंतन मन की भूख है और वस्तु शरीर की भूख है। मन हमेशा कहीं ना कहीं लगा रहना चाहता है। इसीलिए गीता में भगवान ने कहा है “मन बहुत चंचल स्वभाव का होता है।” अर्थात मन को वश में करना काफी कठिन होता है।  बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि मन को वश में करने के लिए अनेंक प्रकार से तप और योग करते हैं। 

बहुत लोग ऐसे मिलेंगे हैं जो शरीर से तो कुछ और करते हैं परंतु मन की कल्पनाओं में उनके कुछ और होता है। ऐसे में विचारनिय बात है मन और शरीर दोनों अलग-अलग क्रिया करते हैं और कर सकते हैं। वैसे देखा जाए तो मैं एक बात बार-बार कहता हूं। इंसान का मन शरीर की गुलामी में लगा हुआ है।

शास्त्र कहता है कर्म को पूरी तरह से कोई त्याग ही नहीं सकता। ऐसा कभी नहीं होता कि एक प्रेमी अपने प्रेमिका का चिंतन जब करता है उस वक्त शरीर से और कोई क्रिया नहीं करता। वह सदैव प्रेमिका के चिंतन में संपूर्ण कार्यों को करते रहता है।

पत्नी पति की चिंतन में रहती है परंतु साथ में वह घर के संपूर्ण कार्यों को करती है। किसी कंपनी अथवा मालिक की नौकरी करने वाला शरीर से तो पूर्ण रूप से उसी का कार्य करता है परंतु मन से अपनें परिवार और अपनें सुख-दुख की चिंता करता है। इसी तरह इंसान संसार में आसक्त रहते हुए अपने सारे कर्मों को करता है। परंतु वह जीस किसी में आसक्त रहता है उसका चिंतन सदैव उसी में होता है।

वह हर प्रकार के संघर्ष करता है। वह हर प्रकार से जीवन के युद्ध को लड़ता है। परन्तु आसक्ति रुपी प्रेमीका को कभी भुलता नहीं। इस बात को समझना कोई मुश्किल नहीं है व्यक्ति चिंतन करें तो समझ सकता है। यहां बात कुछ भी छोड़ने की हो ही नहीं रही है। भक्ति में भी कुछ भी छोड़ने का जिक्र नहीं। कोई भक्त अपनें है के द्वारा भक्ति पाने के लिए कुछ छोड़ने का संकल्प करता है। जबकि श्रीमद् भागवत गीता जी कहती है “संकल्प युक्त व्यक्ति कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता।”

यह समझने के लिए एक उदाहरण और लेते हैं। शास्त्रों में श्री जनक जी को विदेह है राज कहा गया है। वे शरीर से तो संसार के थे परंतु मन से वे सदैव ईश्वर के रहे। यह क्रिया कोई कठिन नहीं है किया जा सकता है। श्रीमद् भागवत गीता में इसी क्रिया को योग कहा गया है। सदैव नित्य निरंतर इस क्रिया को किया जाए वह योग है। 

प्रयास से सब कुछ संभव है। श्रीमद् भागवत गीता जी कभी भी कुछ छोड़ने की बात तो करती हीं नहीं। संसार के प्रति जो आकर्षण आसक्ति है उसे एक प्रकार से उसका रास्ता बदलकर अपने ईश्वर के ऊपर केंद्रित करना है।  जैसे एक प्रेमी अपने प्रेम में आसक्त होकर संसार से कहता है मैं अपनी प्रेमिका के लिए कुछ भी करूंगा। उसी प्रकार एक भक्त अपने ईश्वर के प्रेम में आसक्त होकर कहता है कि मैं उसके लिए कुछ भी करूंगा।

आप भी सोच रहे होंगे मैं कौन से विषय से शुरू करके कौन से विषय पर लेकर आ गया। परंतु ऊपर वाले चौपाई को यदि पूरी तरह से अर्थ समझना है तो इन बातों को समझना आपकी अत्यावश्यक है। देने वाले का गुण सभी गाते हैं अथवा यह बात मानेंगे कि देने वाले का गुण गाना चाहिए।

इस दृष्टि से संसार को बनाने वाले ने हमारे लिए सब कुछ दिया है। उस ईश्वर ने जब हम मां के गर्भ में थे तब भी उसने देखभाल किया।  संसार में उसने जो इतना बहुत कुछ दे रखा है क्या उसके लिए हमें उसका गुण गाने के लिए कोई प्रमाण चाहिए। वह कहीं यह भी नहीं कहता कि तुम उसका गुण गाओ। परंतु उसका आभार प्रकट करना तो हम सांसारिक लोगों का कर्तव्य है।

इस चौपाई के माध्यम से तुलसी बाबा ने कहा है कि कागभुशुण्डि जी दृढ़ता से यह बात कहते हैं। ईश्वर की भक्ति के बिना जीवन वैसा ही बिना रस का है जैसे कोई भी व्यंजन बिना नमक का स्वादहीन होता है। उस ईश्वर के भजन रूपी आभार के बिना कोई सुख किस काम का।

स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज इस बात को बहुत दृढ़ता से कहते आए। जैसे शादी के बाद स्त्री अपने मायके आती है। वह कितना दिन भी मायके में रहे परंतु वह यह कभी नहीं भूलते कि वह अपने पति की है। वह अपने मायके में सब कुछ करती। कभी-कभी तो वह अपनी मां से झगड़ा भी करती है परंतु फिर भी वह अपने पति की ही रहती है। वह यदि पति से झगड़ा करके भी मायके आई हो तब भी वह कभी नहीं भूलती कि वह किसी की पत्नी है।

अपने ईष्ट को भी ऐसे हीं अपना मान लेना चाहिए। इसीलिए कहते हैं दिल से रिश्ता यदि किसी से जोड़ना है तो अपने ईश्वर से जोड़ो। उसके बाद तुम सब कुछ करोगे संसार के लिए परंतु रहोगे अपने ईश्वर का। उसके लिए कुछ भी छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। संसार का चिंतन छोड़ना है और ईश्वर का चिंतन करना है। एक बार जब उससे दिल लगा लोगे तो वह सुख में भी साथ होगा और दुख में भी साथ होगा। इस लोक में भी साथ होगा और यदि कहीं कोई परलोक है तो निश्चित तौर पर उस परलोक में भी साथ होगा।

तभी बड़े-बड़े भक्तों ने भक्ति रस को अमृत के समान माना है। इसीलिए कहते हैं जब यहां भक्ति रूपी प्रेम रोग लगता है तो सारे रोग छोटे पर जाते हैं। उसके बाद शरीर संसार में रोये अथवा हंसें परंतु मन तो ईश्वर के प्रेम में गाना गाएगा। जब एक बार ईश्वर से प्रेम हो जाता है उसके बाद संसार का चिंतन उस ईश्वर के बिना! बिना रस का हो जाता है। ऐसे में आप पाठक आप स्वयं निर्णय करो कि भक्ति रस  अमृत रस  के समान है कि नहीं है।

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