“सामाजिक दुश्मन एक बार के लिए पीछा छोड़ सकता है, परंतु अपना हीं भावना रूपी दुश्मन कभी पीछा नहीं छोड़ने वाला।”
bharose kee pahachaan
कोई हम से प्रेम कैसे करें? यदि विचार करें तो कोई भी व्यक्ति किसी को भी अपने को प्रेम करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। नफरत और प्रेम दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं। किसके दिल में हमारे लिए क्या है यह समझना बहुत ही गहन विषय है। यदि सामने वाले के दिल में रही हुई बातें हम समझ जाएं तो उसके साथ निर्वहन करने के लिए आसान हो जाएगा।
इस दृष्टि से पक्का खिलाड़ी वही है,जो अपने अंदर की भावनाओं को बाहर प्रकट नहीं होने देता। धरती पर कुछ ऐसे जीव हैं, जिनका लक्ष्य सिर्फ शिकार करना होता है, उनके पास भी शिकार के अपने तरीके। हमले से पहले भी निश्चित करते हैं कि हमारे द्वारा किया गया हमला सटीक हो, और शिकार हुआ जीव हमारे ऊपर पलट कर वार न करें।
उदाहरण के तौर पर, यदि व्यक्ति के हाथ में डंडा हो तो कोई भी बंदर जल्दी वार नहीं करता अथवा करीब नहीं आता। हम उसके बगल से गुजरते हैं हमें लगता है कि हम उसको देख रहे हैं और वह हमको नहीं देख रहा है।वास्तव में हमसे ज्यादा उसकी तेज आंखें हमें पढ़ रही होती है। और वो सामने वाला बंदर हमारी आंखों को देख कर ही रीड करता है, कि हम उसके मित्र हैं अथवा शत्रु।
इस दृष्टि से मानव बंदे से कहीं गुना तेज दिमाग रखता है। तू क्या हमारे सामने वाला व्यक्ति हमें नहीं पढ़ता। जिस प्रकार हम सामने वाले व्यक्ति को पढ़ा करते हैं वैसा ही हर व्यक्ति हमें पढ़ता है।
जिस प्रकार हम किसी व्यक्ति के बारे में मित्र और शत्रु की भाषा को पढ़ने की कोशिश करते हैं, वैसा ही हर सामने वाला व्यक्ति हमारे बारे में सोचता है। जिस व्यक्ति की भावना चेहरे पर जागृत नहीं होता,अथवा जो व्यक्ति अपनी भावनाओं को चेहरे पर प्रदर्शित नहीं होने देता, उस व्यक्ति को पढ़ना मुश्किल होता है। परंतु चेहरे की भावना को देखकर ही वास्तविक मित्रता और शत्रुता का बोध होता है।
मित्र और शत्रु एक सिक्के के दो पहलू हैं, यदि शत्रुता मिटाना हो,तो पहले अपने अंदर छुपी शत्रु भावना को मिटाना होगा, और यदि मित्र भावना को जागृत करना हो, तू पहले अपनी भावनाओं में मित्रता को जागृत करना होगा। अर्थात सीधे तौर पर यह कहें, की प्रेम को पाने के लिए सबसे अंदर अपने भावनाओं में प्रेम जागृत करना होगा, अपने चेहरे पर प्रेम हो, शब्दों में प्रेम हो, आंखों में प्रेम हो, अपने हाव-भाव के अंदर प्रेम हो, तो इस प्रकार का प्रेम निश्चित तौर पर सामने वाले को प्रभावित करता है। इतिहास गवाह है ”जो ना तीर से मरा, न तलवार से मरा, और नहीं कुछ तुम्हारा सिर्फ और सिर्फ प्यार की धार से मरा”
प्रेम तो वह है जिसमें व्यक्ति प्रेम के चक्कर में अपने स्वार्थ को भूल जाता है। प्रेम रूपी फ्रेम वह है जो बनाया हुआ है, जो महज प्रेम का ढांचा तैयार किया हुआ है। इस प्रकार का प्रेम अधिक समय तक प्रभावित नहीं रहता।
जो प्रेम करता है, अपनी खुशियों को त्याग कर प्रेम करता है, वह वैसे ही प्रेम का तमन्ना भी करता है। एक होता है नि:स्वार्थ प्रेम, यहां उस प्रेम का बात नहीं हो रहा। जब प्रेम समय की कसौटी पर चढ़ता है तो वास्तविकता क्या है ,यह अपने आप पता चल जाता है। प्रेम का शुरुआत दिल से होता है, दिमाग के लाख मना करने के बाद भी, दिल प्रेम कर बैठता है।
जहां दिल का बात होता है, वहां चोट भी दिल पर लगता है। दिमाग समझाने की कोशिश भी करता है तो भी दिल मानने को तैयार नहीं होता। दिल बेचारा क्या करें, प्रेम अंधा होता है। प्रेमी अपने लिए भी वैसा ही प्रेम खोजता है, परंतु ऐसा संभव नहीं हो सकता, चाहत! तो ऐसा ही होता है।
फ्रेम की बात करें तो, यह दिमाग के द्वारा गढ़ा जाता है, जिसे जमाना झूठ और फरेब के नाम से जानता है। ऐसा व्यक्ति प्रेम करने का नाटक करता है, परंतु कहते हैं ,स्वांग बहुत समय तक नहीं चलता, जब वास्तविकता से पर्दा उठता है, तो पता चलता है कि यह प्रेम नहीं था महज एक फ्रेम था।
प्रेम और फ्रेम में जमीन और आसमान का अंतर होता है। दिल बहुत ही नाजुक होता है, कब कौन से बात को लेकर टूट जाएगा, यह तो दिल को भी पता नहीं होता। इसीलिए लेखक कहता है प्रेम करो, परंतु यह जरूर देखो, कि कहीं सामने से प्रेम के रूप में फ्रेम तो नहीं है।
प्रेम अंधा होता है उसके बावजूद प्रेम पवित्र होता है, क्योंकि एक प्रेमी व्यक्ति के अंदर में घात नहीं छुपा होता। एक प्रेम ! अपने प्रेम को बचाने के लिए, सबसे पहले तैयार होता है त्याग करने के लिए। इतिहास गवाह है इसीलिए सच्चे प्रेमी, सदा के लिए अपना नाम कर जाते हैं।
समाजिक दृष्टि से जो बेवजह हमें अथवा किसी व्यक्ति का नुकसान पहुंचाए वह दुश्मन है। परंतु वास्तव में जो बेवजह किसी को नुकसान पहुंचाता है, वह तो मानव हो ही नहीं सकता, उसे दुश्मन की गिनती में नहीं ले सकते।
अब बात आता है ,जो हमारा दोष देखता है, क्या वह हमारा दुश्मन है? दोष देखने वाले को भी दुश्मन नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दूसरे यदि हमारा दोष न देखें, तो हमें अपना दोष कभी नजर ही नहीं आएगा। यानी कि एक दृष्टि से दोष देखने वाला हमारा हितेषी है। जो कोई अपना हित साधने के लिए हमारा अहित करने को तैयार है, क्या वह दुश्मन है? नहीं वह भी दुश्मन की कैटेगरी में नहीं आता, क्योंकि कोई अपना हित साधने के लिए दूसरे का नुकसान पहुंचाए, वह इस तरीके से दुश्मन नहीं है, वह मूर्ख की श्रेणी में आएगा। क्योंकि दूसरे के हक को लेने की जो कोशिश करता है, वह एक तरीके से लालची इंसान है।
कोई दूसरे का लेकर अमीर तो बन जाता है, परंतु उसका उसके बाद भी हाथ खाली रहता है। एक पेट भरा इंसान , किसी से खाना मांगे तो उसे क्या कहेंगे, और यदि पेट भरा इंसान रोटी की चोरी करे उसे क्या कहेंगे? उसे मूर्ख के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता।
अब यदि इन लोगों को हम अपना दुश्मन न कहें तो किसे कहें। वास्तव में विचार तंत्र कहता है। व्यक्ति स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं अपना शत्रु है। यदि व्यक्ति अपने अंदर गलत भावना को जन्म देता है, तो वह अपने आप ही अपना शत्रु है। क्योंकि जहां शत्रुता की बात है, सामाजिक दुश्मन एक बार के लिए पीछा छोड़ सकता है, परंतु अपना भावना रूपी दुश्मन कभी पीछा नहीं छोड़ता।
जैसे व्यक्ति के साथ मौत साथ – साथ चलता है, वैसे ही गलत भावना रूपी दुश्मन सदैव साथ – साथ चलता है। यह दुश्मन तो बंद कमरे में, किसी गुफा के अंदर भी हो, यहां तक कि रात के सोए में भी, पीछा नहीं छोड़ने वाला है। इसलिए अपने भावना रूपी दुश्मन को पहचाना पड़ेगा। यदि भावना एक बार दूषित हो गया, तो यह न चैन से जीने देगा और न चैन से मरने देगा। इसलिए संसार में सबसे बड़ा दुश्मन अपना ही दूषित भावना हो सकता है।