Bhav Bhakti/ भाव-भक्ति

चिंतन विचार इस भाव भक्ति में अत्यंत आवश्यक भूमिका निभाते हैं। जब हम निरंतर ईश्वर के स्वरूप, उनकी लीलाओं, गुणों और उनके प्रति अपने संबंध का चिंतन-मनन करते हैं, तो हमारे भीतर की भक्ति भावना और भी अधिक प्रबल होती है। यह चिंतन हमारे मन को एकाग्र करता है, अहंकार को कम करता है, मार्ग प्रशस्त करता है और हृदय में प्रेम, करुणा व दया जैसे भावों का विकास करता है।

सनातन में ईश्वर नहीं थोपे जाते, चुने जाते हैं

सनातन धर्म में रामायण एक अद्वितीय ग्रंथ है, और उसमें वर्णित पुरुषोत्तम श्रीराम का चरित्र सर्वोपरि माना जाता है। रामायण केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक चरित्र-प्रधान ग्रंथ है, जो अनेक भाषाओं और टीकाओं में उपलब्ध है। समाज में इस ग्रंथ के साथ-साथ उसमें वर्णित चरित्रों की पूजा भी होती है। फिर भी कुछ लोग […]

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सनातन धर्म में ईश्वर का स्वरूप

सनातन धर्म एक अत्यंत प्राचीन और अनुभूत-आधारित विचारधारा है, जिसका उद्देश्य सृष्टि की वास्तविकता को जानना और समझना है। सनातन परंपरा में ईश्वर का स्वरूप अत्यंत गहन और व्यापक विचार का विषय है। समझ की कमी के कारण समाज में प्रायः देवताओं को ही जन्मदाता मान लिया जाता है, जबकि शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया

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वास्तविक भक्त

आज के समय में लोग हर दिशा में ईश्वर को खोजने निकल पड़ते हैं — कोई मंदिर जाता है, कोई तीर्थ, कोई ध्यान में डूब जाता है।लेकिन क्या कभी हमने यह सोचा है कि ईश्वर को खोजने की जरूरत ही क्या है?अगर हमारा मन सच्चा और हृदय पवित्र है, तो वह स्वयं हमारे जीवन में

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मृत्यु के बाद

“मृत्यु अंत नहीं, एक नई यात्रा की शुरुआत है।” वास्तविकता सदैव वास्तविक रहती है। किसी के कहने या सोचने से सत्य नहीं बदलता। प्राचीन इतिहास में अनेक महान आत्माएँ हुईं जिन्होंने मृत्यु के बाद के अनुभवों का वर्णन किया। सभी का दृष्टिकोण अलग था — किसी ने इसे आत्मा की यात्रा कहा, तो किसी ने

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ब्रह्म-जिज्ञासा एवं ईश्वर चिंतन

परब्रह्म परमेश्वर का चिंतन करने से पहले “ब्रह्म” शब्द के अर्थ और भाव पर विचार करना आवश्यक है।वेद-साहित्य की मूल भाषा संस्कृत है, और यह वह भाषा है जिसमें मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन विचारों ने शब्द पाया।इसलिए ब्रह्म-जिज्ञासा की चर्चा संस्कृत और वैदिक परंपरा को समझे बिना अधूरी है। संस्कृत का महत्व और ज्ञान

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भक्त का तकलीफ

परमेश्वर एक माँ की तरह हैं। जिस प्रकार माँ अपने बच्चे से प्रेम करती है और उसके बदले में कुछ नहीं चाहती, उसी प्रकार परमेश्वर भी अपने भक्तों से निस्वार्थ प्रेम करते हैं। यद्यपि परमेश्वर सबके प्रति समान व्यवहार करते हैं, परंतु जो उनका अनन्य भक्त होता है, परमेश्वर उसके साथ माँ की तरह स्नेहपूर्ण

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जादू-टोना की वास्तविकता

यदि वास्तव में आत्माएं हमारा पीछा करती, तो आज पता नहीं, हर एक व्यक्ति के पीछे, कितनी आत्माएं पड़ी होतीं। अफसोस व्यक्ति अपने आप में चिंतन करें तो सब समझ सकता है। लेकिन भावनाओं का जाल ऐसा होता है, कि व्यक्ति स्वयं से स्वयं को चाह कर भी नहीं निकाल सकता। जादू टोना वास्तविकता में

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भ्रम और प्रार्थना

परमेश्वर भक्ति में अनेकों प्रकार के क्रियाएं कहा गया है। उन क्रियाओं में सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है परमेश्वर से प्रार्थना। प्रार्थना पर भ्रम के ऊपर चिंतन करें उससे पहले हम कुछ और चिंतन करें। आप एक सामान्य व्यक्ति हैं और कोई भी आपके पास आकर अपने प्रेम का इजहार करें। जब वह प्रेम का इजहार

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ईश्वर-मंदिर अंधविश्वास चिंतन

भगवान और मंदिर क्यों चाहिए? सनातन संस्कृति में भगवान और मंदिर का महत्व किसी से छिपा हुआ नहीं है। यह सवाल उठता है,कुछ प्रतिशत लोगों के अविश्वास से। एक सवाल अनेक महत्वपूर्ण सवाल को जन्म देता है, जिसे जानना प्रत्येक सनातन अनुयाई को अवश्य है। “क्या वाकई में भगवान है, और वह भी है! तो

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भक्ति रस एक अमृत

भक्ति हीन गुण सब सुख कैसे,लवण बिना बहु व्यंजन जैसे।भक्ति हीन सुख कवने काजा,अस बिचारि बोलेऊं खगराजा॥ अर्थात : भक्ति के बिना गुण और सब सुख ऐसे फीके हैं, जैसे नमक के बिना विभिन्न प्रकार के व्यंजन। भजन विहीन सुख किस काम का। यह विचार कर पक्षीराज कागभुशुण्डि जी बोले। इस सुन्दर चौपाई चौपाई के

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