Bhav Bhakti/ भाव-भक्ति

चिंतन विचार इस भाव भक्ति में अत्यंत आवश्यक भूमिका निभाते हैं। जब हम निरंतर ईश्वर के स्वरूप, उनकी लीलाओं, गुणों और उनके प्रति अपने संबंध का चिंतन-मनन करते हैं, तो हमारे भीतर की भक्ति भावना और भी अधिक प्रबल होती है। यह चिंतन हमारे मन को एकाग्र करता है, अहंकार को कम करता है, मार्ग प्रशस्त करता है और हृदय में प्रेम, करुणा व दया जैसे भावों का विकास करता है।

ईश्वर का चिंतन-विचार

दिल में बसा ईश्वर का चिंतन कौन करै।जब मोह-माया से फुर्सत मिलै तब करै।। ईश्वर के चिंतक को निश्चित तौर पर मार्ग मिलता है। परंतु ईश्वर का चिंतक तो बनना पड़ेगा। जब ईश्वर से अटूट प्रेम होगा तब वह दिल में बस जाएगा। वास्तव में सबको सिर्फ आनंद चाहिए। वह जो सिर्फ आज का आनंद […]

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ईश्वर नाम चिंतन

उलटा नाम जपत जग जाना,बालमीकि भये ब्रह्म समाना।। श्री गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में कहते हैं।”यह संपूर्ण जगत को पता है, उल्टा नाम जप कर भी वाल्मीकि जी ब्रह्म के समान हो गए।” वेदांत कहता है परम शक्ति ब्रह्म को किसी ने नहीं देखा। जिसने देखा वह शब्दों के जरिए व्यक्त नहीं कर सकता। वेदांत

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माया और मन की माया

माया मुई न मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर। कबीर जी महाराज अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं – मनुष्य का न तो मन मरता है और न ही उसकी इच्छाएँ समाप्त होती हैं। केवल उसका शरीर नश्वर है और वही मरता है। जीव जब तक मन और माया के मोह में फंसा रहता है,

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कृपा करहिं सब कोई

जा पर कृपा राम की होई।ता पर कृपा करहिं सब कोई॥ तुलसी बाबा अपने विचार से ईश्वर की कृपा का सरल शब्दों में प्रस्तुति करते हैं। जिस जीव अथवा व्यक्ति पर परम शक्ति श्री राम की कृपा रहता है उस पर सभीं प्राकृतिक तत्व कृपा करते।  यह सब जानते हैं ,संसार की समस्त शक्तियां परम

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सभी धर्म को छोड़

अपने-अपने विचार से कुछ लोग श्रीमद् भागवत गीता के ऊपर प्रश्न उठते हैं। एक बहुत ही चर्चित श्लोक है “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” सभी धर्म का परित्याग करो और मेरी शरण में आ जाओ। इसका अर्थ वे बताते हैं “सभी धर्म को छोड़कर कृष्ण का धर्म मान लो।”  उस समय हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चियन इत्यादि कोई

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संपूर्ण गीता सार

यत्र योगेश्र्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः |तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवो नीतिर्मतिर्मम || १८/७८ || यह श्लोक श्रीमद्भागवत गीता के अंत में संजय ने धृतराष्ट्र से कहा था। विचारणीय बात है इस श्लोक के पहले दिव्य दृष्टि युक्त श्री संजय संपूर्ण गीता का श्रवण कर चुके थे। वे संपूर्ण गीता सुनने के बाद कहते हैं ‘ हे

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शांति के लिए ईश्वर

हरि अनंत हरि कथा अनंता।कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥ हरि अर्थात दुःख को हरने वाले ईश्वर! जिस प्रकार हरि के रूप अनन्त है उसी प्रकार हरि की कथा भी अनंत है। परम शक्ति ईश्वर के बारे में जो कुछ भी कहा जाए वह सब हरि कथा है। दुःखों का निवारण करने वाले भक्त अपनें भगवान

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कृपा के लिए प्रार्थना

दीन दयाल बिरिदु संभारी।हरहु नाथ मम संकट भारी॥ अपने ईश्वर को खुश तथा प्रसन्न करने हेतु मानस में श्री तुलसी बाबा कहते हैं। दीनों और दुखियों के ऊपर स्वभाव से कतरूणा तथा कृपा करने वाले,  हे ईश्वर!  मेरे बहुत भारी संकट का निवारण करे। जिस प्रकार व्यक्ति ईश्वर के रूप का अपने अनुसार से चुनाव

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