kadvi baat-/कड़वी बात

“कड़वी बातों पर विचार करना आसान नहीं होता, लेकिन अक्सर वही बातें हमें सच्चाई से अवगत कराती हैं। यह लेख उन कटु सत्यों के मनन पर आधारित है जो हमें भीतर तक झकझोर सकते हैं, लेकिन अगर हम इन पर गंभीरता से चिंतन करें, तो जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने की समझ मिल सकती है। कभी-कभी वही बात जो आज चुभती है, कल हमारी सबसे बड़ी सीख बन जाती है।”

अमृत छोड़ विष सेवन

एहि तन कर फल बिषय न भाई।स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥ ये श्री रामचरितमानस का बहुत चर्चित दोहा है। तुलसी बाबा यहां स्पष्ट कहते हैं।  हे भाई! इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषयभोग नहीं है। क्योंकि शरीर के सामने  स्वर्ग का भोग भी बहुत […]

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सफल होने में विशेष गुण

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ किसी किसी को धर्य बिल्कुल नहीं होता। हर समय जल्दबाजी करते हैं। कबीर दास जी सुंदर विचार प्रकट करते हैं। वे कहते हैं “रे मन आराम से, धीरे-धीरे सब कुछ होता है। बाग में माली एक पेड़ को सैकड़ो घड़ों से

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विचारों का अधार

जीव का  रूप, आचरण और विचार उसके प्रकृति को व्यक्त करता है। प्रकृति अपने आप में एक रहस्य है। लोगों ने अनेक एलियन के बारे में चर्चा सुना होगा। वैज्ञानिक कहते हैं ब्रह्मांड में ऐसे सैकड़ो पृथ्वी हो सकते हैं जहां पर जीवन हो।   यह सत्य बात है। यदि चिंतन-विचार करें आभास होगा की

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मंगल विचार सुमंगल फल

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ श्री गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं : जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ  अर्थात सुख और समृद्धि रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ विभिन्न प्रकार की विपत्ति-दुःख का वाश होता है। यह विचार प्रचलित है – जब व्यक्ति को धन ऐश्वर्य आता है

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बोए पेड़ बबुल के

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।नाथ पुरान निगम अस कहहीं।। समस्त ग्रंथों का सार श्री रामचरितमानस में तुलसी बाबा कहते हैं: पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि  सबके हृदय में रहती है। अर्थात अच्छी बुद्धि और दुष्ट बुद्धि सबके हृदय में रहता है। तुलसी बाबा अपने विचार से कहते हैं- अच्छा

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विचारों से कर्म और सफलता

अनुचित उचित काज कछु होई,समुझि करिय भल कह सब कोई। तुलसी बाबा कार्य में सफलता के लिए स्पष्ट कहते हैं: किसी भी कार्य का परिणाम उचित होगा या अनुचित, यह जानकर करना चाहिए, उसी को सभी लोग भला कहते हैं। जैसे कहा गया है धनुष से तीर निकालने के बाद वापस नहीं होता। जिह्वा से

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मन का माला फेर

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ श्री कबीर जी महाराज यहां कितनी सुंदर विचार प्रकट करते हैं। वे कहते हैं – “देखो माला फेरते हुए बरसों हो गए । परंतु अफसोस फिर भी मन का विचार नहीं बदला। हाथ का माल छोड़ दो ,

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सुख का दुश्मन

भोगैश्र्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||२/ ४४ || अर्थात श्रीमद् भागवत गीता में भगवान कहते हैं – जो लोग इन्द्रियभोग तथा भौतिक ऐश्र्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्त होने से ऐसी वस्तुओं से मोहग्रस्त हो जाते हैं, उनके मनों में भगवान् के प्रति भक्ति का दृढ़ निश्चय नहीं होता। मनुष्य जन्म से हीं अपने

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कर्म के द्वारा फल

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || २/३० || भगवान ने कितने सरल भाषा में अपने शब्दों को कहा है। वे अर्जुन से कहते हैं- “हे भारतवंशी! शरीर में रहने वाले (देही) का कभी भी वध नहीं किया जा सकता । अतः तुम्हें किसी भी जीव के लिए शोक करने की

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दिल बेचैन

दिल कभी जिद करता है, कभी हँसता है, तो कभी रो देता है। उसकी बेचैनी भी वैसी ही होती है  मासूम, स्वाभाविक और अस्थायी। जैसे बच्चा खिलौना न मिलने पर रो देता है, वैसे ही दिल भी किसी अधूरे ख्वाब पर तड़प उठता है। अगर हम हर बार उसके पीछे भागते हैं, तो हम अपनी

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