Sadhu Sant-Vichar / साधु-संत चिंतन-विचार

साधु-संत अपना संपूर्ण जीवन समाज को समर्पण करते आए हैं।
उनका चिंतन-विचार आध्यात्मिक ज्ञान, नैतिकता, करुणा, सेवा और आत्मकल्याण पर आधारित होता है। वे जीवन के सत्य, आत्मा-परमात्मा के संबंध, और संसार की नश्वरता पर गहन मंथन करते हैं। उनके विचार मनुष्य को संयम, सत्य, अहिंसा, प्रेम,दया और त्याग का मार्ग दिखाते हैं। साधु-संतों की वाणी जीवन को दिशा देने वाली होती है, जो व्यक्ति को मोह-माया से हटाकर ईश्वर की ओर ले जाती है।

तत्वदर्शी- गृहस्थ संत सुदर्शन सिंह

लेखक अपने विचारों के माध्यम से एक दार्शनिक तत्व को प्रकट करता है। मेरे लिए यह लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज जो कुछ भी मैं लिखता हूं, अथवा मेरे विचारों में जो भी उत्तम शब्द हैं, उनमें से अधिकांश का श्रेय मेरे पूज्य, गृहस्थ संत तत्वदर्शी गुरु जी श्रीमान श्री सुदर्शन सिंह जी को […]

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अद्भुत साधन- कर्म योग

भारतवर्ष में संत महात्मा का हमेशा से ही विशेष प्रभाव रहा है। यह वाणी-लेख ”संत एकादश सेवक महाराज” की है । मेरे विचार से यें एक उच्च कोटि के संत हैं और यदा-कदा मेरा उनसे मुलाकात भी होता है। मैंने बहुत संतो को देखा परंतु बिना लाग लपेट के सीधा बोलने वाला यह संत मुझे

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रामप्रसाद जी महाराज रामसनेही

सनातन संस्कृति में आज भी कितने महान महामानव उपस्थित है इसका गणना नहीं हो सकता। परधर्मी विचारक अपनें को अच्छा बनाने के लिए सनातन धर्म का परिहास करते हैं और अपने अनुसार परधर्म की खूबियां गिनाते हैं। सनातन संस्कृति के महामानव खामोश! अपनें योग साधना में अथवा अपने कर्म में लीन रहते हैं। चुकी सनातन

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निष्काम कर्म का विशेष फल

निष्काम कर्म  के आरम्भ का नाश भी नहीं होता और उल्टा फल भी नहीं होता। थोडा-सा भी निष्काम कर्म  महान भय से तार देता है। अन्त काल का थोडा भी भजन-ध्यान तार देता है। अंतकाल का थोडा भी निष्काम भाव भी वृद्धि को प्राप्त होकर कल्याण करता है।                  स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज इंसान पूरे

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ईश्वर की प्राप्ति धर्म

मनुष्य जिस वर्ण,धर्म,आश्रम,संप्रदाय, वेश-भूषा आदि में है। वह वहीं रहते हुए परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज। स्वामी श्री ने स्पष्ट कहा है व्यक्ति किसी भी वर्ण धर्म आश्रम का पालन करता हो। किसी भी संप्रदाय से हो अथवा किसी भी वेशभूषा में रहने वाला हो। वह वहीं

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