Ved-Puran Vichar वेद-पुराण विचार

वेद और पुराण भारतीय संस्कृति में ज्ञान-परंपरा के दो महत्वपूर्ण आधार स्तंभ हैं, जो न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान का भंडार हैं, बल्कि चिंतन, जीवन चर्या, दर्शन और मनुष्य के आचरण से जुड़ी गूढ़ और गहन अवधारणाओं को भी प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में वेद-पुराण में चिंतन और विचार केवल ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और आत्मा की गहराई को समझने का माध्यम हैं।

प्राकृतिक सिद्धांत का मूल – गीता

श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा ग्रंथ है, कि शायद ही कोई ऐसा हो जो इनके बारे में ना जानता हो। सनातन पद्धति के लिए अनेकों वेद पुराण ग्रंथ मौजूद है। सभी अपने आप में परिपूर्ण है, वास्तव में किसी से किसी की तुलना नहीं हो सकता, परंतु गीता जी के लिए कहा गया है की गीत […]

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ईश्वर कहां नहीं

ईश्वर कहां नहीं,जगत के कन-कन में भगवान।जिनका गुणगान करते थकते नहीं वेद पुराण।। विज्ञान इस ब्रह्मांड को गुरुत्वाकर्षण के बल पर संचालित होने की बात करता है। परंतु ईश्वर का सत्ता स्वीकार नहीं करना चाहता क्योंकि वह ईश्वर नजर नहीं आता। वेद विज्ञान से पहले से कहता  हुआ आ रहा है , एक चींटी को

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वेद मंत्र संदेश

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यंभर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ विश्व में भारत अपनें उत्तम विचारों को लेकर विशेष कर जाना जाता है। यहां के विचार का आधार भारत की प्राचीन संस्कृति है और वह संस्कृति वेद के ऊपर आधारित है। श्री वेद का महामंत्र है, गायत्री मंत्र जो अपने वेद के मूल आधार

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उत्तम कर्म उत्तम कर्मफल

होइहि सोइ जो राम रचि राखा।को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ यहां श्री गोस्वामी तुलसी बाबा अपने विचार में रहते हैं : “जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे।” इस चौपाई के ऊपर अनेक लोगों का अनेकों प्रकार का मत है। परंतु यहां मेरा कहना है इसका क्या

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अजन्मा आत्मा

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |अजो नित्यः शाश्र्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे || २/२० || यहां भगवान  अपने विचार में स्पष्ट कहते हैं। “आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु | वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म

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दुःख से भाग नहीं सकते

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |अगामापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || २/१४ || श्रीमद् भागवत गीता में सुख दुःख के ऊपर भगवान कितना सुंदर विचार रखते हैं। वे कहते हैं – हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है | हे भरतवंशी! वे

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