काश दिल के अंदर दो दिल होता। टूटे हुए दिल के लिए क्या कहें, इस दुनिया में एक दिल ही तो है जो कहते हैं मानता नहीं! दिल को हर समय कुछ न कुछ चाहिए, दोस्तों से तो चाहिए साथ में दुश्मनों से भी चाहिए।

एक मशहूर कहावत है ,टूटा हुआ दिल कहता है- काश! शायद दुनिया में ऐसा होता, कि दिल के अंदर दो दिल होता और एक के टूट जाने पर, दूसरा दिल गमसीन नहीं होने देता।
वास्तव में व्यक्ति का उम्र कुछ भी हो, परंतु उसके दिल का उम्र बिल्कुल बच्चे के जैसा होता है। किसी बच्चे को बहला कर स्थिर रखना मुश्किल होता है। बच्चा बार-बार जिद करता है, कभी बच्चे को बहला कर चुप कराया जाता है, कभी डरा कर चुप कराया जाता है। बच्चे को कितना भी प्यारा खिलौना दे दो, थोड़ी देर खेलने के बाद, वह उस खिलौने को छोड़कर दूसरी तरफ चल पड़ता है।
या यूं कहें कि बच्चे को हर बार, नई-नई प्रकार के खिलौने चाहिए। बच्चा किसी भी खिलौने से कुछ ही समय संतुष्ट होता है। वापस उसी स्थिति में चला जाता। क्या संभव है बच्चे के दिल को समझा लेना। एक वयस्क का दिल कभी कभी टूटता है, परंतु बच्चे का दिल तो क्षन-क्षन टूटता है।
वयस्क में कोई गंभीर मुद्रा वाला होता है, तो वह दूसरों के सामने अपने टूटे दिल को जाहिर नहीं होने देना परंतु, उसका दिल बेचारा तो अंदर ही अंदर रोते रहता है।
दिल बार-बार कहता है,
मुझे रोज एक खाना नहीं चाहिए,
मुझे रोज एक ही गाना नहीं चाहिए,
रोज एक ही कपड़ा पहनना नहीं चाहिए
मुझे रोज एक ही जगह रहना नहीं चाहिए
दिल बेचारा नित्य समय, नित्य दिन अपना फरमाइश करते रहता है, और व्यक्ति उस फरमाइश को पूरा करने हुए अपना जीवन व्यतीत कर देता है। दिल बेचारा कभी दुआ देता है, तो कभी बद्दुआ भी देता है। यही दिल ताउम्र व्यक्ति को अपना गुलाम बनाये रखता है।
सब करने के बाद भी यही दिल अंत समय में व्यक्ति को कोसते रखता है। यह दिल बचपन में भूखा था, युवावस्था में भूखा था, बुढ़ापे में भी भूखा रहा। व्यक्ति उम्र भर ! दिल के भूख को भरने की कोशिश करता ना।
इसीलिए कहते हैं कमबख्त दिल है कि मानता नहीं, फिर भी दिल का दर्द तो प्यारा ही लगता है, दिल है जो हंसते हुए को आनंद देता है, कभी कभी रोते हुए को भी आनंद देता है।
इसलिए श्रीमद्भागवत गीता भगवान कहते हैं है-
योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
अर्थात ,हे अर्जुन-कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं ,तू कर्मफलका हेतु मत बन और तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो।
व्यक्ति को कर्म करने का तो अधिकार है, परंतु उसके पास फल को प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार नहीं है। किसी को अपना दिल खुश करने की कोशिश तो करेगा परंतु, वह किसी को कब तक खुश रख पाएगा। अपने बच्चे को मां बाप कुछ बनाने की कोशिश तो कर सकते हैं, परंतु बच्चा वहीं बनेगा, जो मां बाप का दिल कहेगा, अथवा क्या बच्चा वही रहेगा, जैसा कि मां-बाप का दिल चाहे, यह पूर्णतया संभव नहीं।
दिल टूटता हीं रहेगा, इसलिए व्यक्ति अपने बुद्धि के ऊपर भरोसा करके, दिल को शांत रखें। यदि बुद्धि रहते हुए भी, दिल है कि मानता नहीं , तो फिर व्यक्ति का बुद्धि किस काम! दिल का काम है कहना, और बुद्धि का काम है यूं ही दिल की बातें सुनते रहना।