गम की दुनिया बहुत बड़ी है। इतनी बड़ी की गम में पड़ा हुआ इंसान उसकी गहराई माप नहीं सकता। जो व्यक्ति गम में जी रहा होता उसे गम की दुनिया एक प्रकार से दलदल के समान प्रतीत होता है। इन्हीं भावनाओं को यदि शायरी में व्यक्त किया जाए।
कोई यह न सोचो, गम में सिर्फ हम ही जीते हैं।
करीब से देखो गम की गहराई को ,
गिन नहीं पाओगे गम, दिख रहे दुनियां के परछाई को।
गम की दुनिया को देखो, गम में दुनियां वालें कैसे जीते हैं।
आभास होगा गम के साम्राज्य को जानकर, गम में दम है,
दुनियां में कितने गम हैं और मेरा गम कितना कम है।
गम अर्थात सुख के पीछे एक दूसरी दुनियां है। वास्तविकता में देखें तो सुख और दुख प्रकृति के समान है। जैसे प्रकृति में सर्दी गर्मी और बरसात का मौसम आता है। वैसे हीं मानव जीवन में सुख और दुःख आता है। प्रकृति में जैसे किसी चीज का निर्माण होता है तो उसकी समाप्ति का भी एक समय निश्चित है।
वैसे हीं जीवन में सुख और दुःख का भी एक निश्चित समय होता है। श्रीमद् भागवत गीता में कहा है जो बना है वह खत्म होगा। जो जन्मा है उसकी मृत्यु भी होगा। कोई बच्चा है तो वह युवा भी बनेगा। कोई युवा है तो वह वृद्धावस्था भी प्राप्त करेगा। किसी ने यदि कुछ पाया है तो निश्चित तौर पर वह उसे खोएगा भी।
इन सब सत्य बातों को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। हां एक बात जरूर होता है कि व्यक्ति के अंदर जब तक समर्थ और साहस होता है तब तक इन सब बातों को नजर अंदाज करते जाता है। क्या विचार कर रहे हैं शायद यह वक्त भी गलत है। नहीं यह बिल्कुल वास्तविक बात है। जो आपने पाया है उसे या तो आप खो दोगे या तो जो आपके पास है वह आपको खो देगा।
यह सब विचार कर आश्चर्य लगता है ना! आश्चर्य लगा भी चाहिए। हमारा वेदांत कहता है इस सृष्टि के अंतर कोई भी अमर नहीं है। सब की मृत्यु होने वाली है। यहां तक की शास्त्रों में उल्लेख! कथाओं में चर्चित! देवता भी अमर नहीं है। स्वयं श्री राम शंकर रूपी एक शक्ति को भजन करते थे। भोलेनाथ शंकर स्वयं एक परम शक्ति के चिंतन में खोए रहते हैं।
शास्त्रों में देखेंगे अनेक जन्म मृत्यु की कथाएं देवताओं की मिलती है। शास्त्री यहां स्पष्ट कहता है कल्प के अंत में सब कुछ खत्म हो जाता है। आज का विज्ञान कहता है कि एक दिन एक विशाल ब्लैक होल संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने अंदर समेट लेगा। ब्लैक होल बहुत बड़े आकार में होते जाएगा और एक दिन उसके अंदर भी विस्फोट होगा। इस गति के बाद फिर से एक नए ब्रह्मांड की रचना होगी।
आप सोच रहे होंगे की कहां गम की बात करते-करते मैं सृष्टि के निर्माण और अंत की बात करने लगा। यह उदाहरण आवश्यक है। क्योंकि यह आपके अंदर स्पष्ट ध्यान में रहना चाहिए कि इस सृष्टि में सब कुछ नाशवान है। ऐसे में जब सृष्टि में सब कुछ नाशवान है फिर आपके पास जो है वह सदैव के लिए स्थित कैसे रह सकता है।
जो शरीर दो दिन या दस दिन के अस्वस्थ के कारण मानव शरीर का क्या स्थिति होता है वह अपने अगल-बगल में दिख जाते हैं। शास्त्र कहता है यह संसार भावनाओं के ऊपर स्थित है। मिट्टी का शरीर वापस मिट्टी में मिलकर पूर्ववत हो जाता है। जीव शारीरिक भोगों के चक्कर में पड़कर अपने लिए स्वयं एक भावनाओं का जाल तैयार करता है। एक ऐसा भावनाओं का जाल जिसे तोड़ पाना उसके स्वयं की बस की बात नहीं होता।
वह पूरे जीवन उस भावनाओं में पड़कर फड़फड़ाते रहता है। वह जितना निकालने की कोशिश करता है उतना फंसते जाता है। वास्तव में वह उस जाल को स्वयं तोड़ना चाहता भी नहीं। वह तोड़ भी सकता है परंतु वह तोड़ेगा नहीं। मैंने कहा क्योंकि उस भावना रूपी जाल को उसने स्वयं अपने हाथों से बुना है। उसे अपने भावनाओं से प्रेम है।
तभी तो दुख में यदि कोई रोता है तो वह उसे अपना आंसू भी प्यारा लगता है। वह गिरे हुआ आंसू भी उसे शांति देकर जाता है। उसे रोना कबूल होता है परंतु भावनाओं का जाल तोड़ना कबूल नहीं होता। यह प्रकृति है और प्रकृति में हम हैं। मैंने ऊपर कहा करीब से देखो दुनिया को। दुनिया में बहुत गम है और तुम्हारा गम बहुत कम है।
वास्तव में मेरा मानना है व्यक्ति अपने दुखों को तब तक छुपाता है दूसरों से जब तक वह बर्दाश्त करता है। यह सत्य भी है, क्योंकि दुनिया में अधिकांश लोग अपने दुःखों को छुपा कर दूसरों के सामने खुश रहने का नाटक करते हैं। यह नाटक हुए तब तक करते हैं जब तक उनमें फड़फड़ाने की शक्ति होती है। वास्तविक बात बहुत कड़वा होता है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक अहम होता है जिसे वह समाज के सामने छोड़ना नहीं चाहता। बेचारा वह करें तो क्या करें क्योंकि उस अहम रूपी भ्रम का मायाजाल उसने स्वयं बुन रखा है।
समझदार के लिए इशारा काफी होता है परंतु व्यक्ति की भावना समझता सब है परंतु मानने को तैयार नहीं होता। यही दुनिया में गम युक्त भावनाओं की सच्चाई है। इसलिए मैंने कहा गम में दम है। इसीलिए हमारे महात्माओं ने ईश्वर से दिल लगाने की बात कही है। जब भक्त ईश्वर से प्रेम कर लेता है ऐसी स्थिति में उसमें हर एक गम से निकलने की पावर प्राप्त हो जाता है। या ऐसे कह सकते हैं भगवान उसे गम से निकाल लेता है। या ऐसे कह सकते हैं भगवान गम से निकलने की उसे शक्ति प्रदान करता है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं इस चिंतन से व्यक्ति अपने अंदर उस गम से लड़ने की शक्ति एकत्र कर लेता है ।
जब व्यक्ति को आभास हो जाता है कि दुनियां में कितना गम है और मेरा गम कितना काम है। ऐसे में वह गम की दुनियां में रहकर भी गम की दुनियां से बाहर निकल जाता है। तभी तो लेखक दुनियां को पागल कहता है और दुनियां लेखकों को पागल कहती है। संत महात्माओं को भी ऐसे ही कहा जाता है। गीता में कहां गया है जो अनंत आनंद में स्थित है। उसके लिए सुख रात्रि के समान हैं और दुःख दिन के समान। पूरी दुनिया जिन भावनाओं में जागता है एक महापुरुष उन भावनाओं में सोता है। और जिन भावनाओं में पूरी दुनियां सोती है अर्थात जिन भावनाओं से दुनियां दूर रहती है उन भावनाओं में वह महापुरुष सोया करता है।