गंगा का उपकार

श्री गंगा जी की महिमा,मां गंगा! श्री गंगा जी के बारे में जितना भी कहा जाए कम होगा। भारतीय सनातन वेद संस्कृति में उपकार का महत्व बहुत बड़ा है। थोड़ा भी यदि कोई कुछ करें तो व्यक्ति उसे ईश्वर के सदृश्य मान लेता है। परमेश्वर को मानने की क्रिया इतनी प्रबल है, भक्त देव दानव मानव तथा संपूर्ण चराचर में मौजूद सभी को परमेश्वर का अंश मानता है। सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा गुण है, श्री राम के साथ रावण भी सम्मान पाता है। माता श्री दुर्गा के साथ महिषासुर भी प्रतिष्ठा पाता है। देवी देवता तो पूजे जाते हैं साथ में उनके सभी भक्त भी पूजे जाते हैं।

Ganga Ka Upakar

सनातन वेद साहित्य का उद्देश्य व्यक्ति के भाव को अनेक से निकालकर एक में प्रतिष्ठित करना है। दूसरे को ऐसा लगता है जैसे मानो अनेक परमेश्वर हो। परंतु उच्च कोटि का भक्त उस जगह पर पहुंच जाता है जहां से उसे सब एक ही दिखता है।

सनातन साहित्य में सभी धर्म ग्रंथ एक ही परमेश्वर की तरफ इशारा करते हैं। जैसा कि सनातन में मानने की क्रिया प्रबल है इसलिए भक्त अपनी आंखों से संपूर्ण जगत को परमेश्वर के रूप में देखने की कोशिश करता है, और एक दिन यह पूरी दुनिया उसके लिए परमेश्वरमय बन जाता है।

आप सोचेंगे की बात मैंने श्री गंगा से की और कहां गया, माफी चाहूंगा परंतु श्री गंगा को समझने के लिए गंगा जी को “मां” मानने वाले को भी समझना होगा, तभी श्री गंगा का महत्व समझ में आएगा। भारत में जितनी भी नदियां धारा में चलती है, सभी को गंगा जी माना गया है। यहां तक की धरती पर जितने भी अपने आप से बहने वाली नदियां हैं सभी गंगा जी की ही एक धारा है। धर्म शास्त्र कहता है, धरती पर गंगा जी के सवा लाख धाराएं निरंतर बहती हैं।

श्री गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरित्र मानस में कहते हैं –
दरश, परस, मज्जन अरु पाना ।हरहिं पाप, कह वेद पुराना।।
नदी पुनीत अमित महिमा अति ।कही न सकई सारदा बिमल मति।।

अर्थात ” गंगा के दर्शन , स्पर्श , स्नान और पान से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते है.यह नदी बड़ी पवित्र है, इसकी महिमा अनंत है, जिसे विमल बुद्धि वाली सरस्वती भी नहीं कह सकती”।
जब श्री माता सरस्वती गंगा जी की महिमा पूर्ण रूप से नहीं कह सकती तो शेष सभी अल्पज्ञ हैं। एक मंत्र समाज में बहुत प्रयोग में आता है।

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु।।

समाज में प्रचलित है, जब कभी कोई शुभ कार्य होता है, अथवा धार्मिक अनुष्ठान में सनातनी जब श्री गंगा जी से दूर रहते हैं, तो इस मंत्र के द्वारा, गंगा जी तथा उनके सभी स्वरूपों को आवाहन के जरिए पास बुलाया जाता है, श्री गंगा जी की नाम की महिमा इतनी बड़ी है, मात्र उनका नाम लेने से कोई भी साधारण जल, पवित्र गंगाजल में परिवर्तित हो जाता है।

इस मंत्र के जरिए समस्त गंगा जी के स्वरूप को याद करके सम्मान पूर्वक अपने कल्याण के लिए बुलाते हैं, और मंत्र के जरिए कहते हैं  ”हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी नदियों! मेरे इस जल में आप सभी पधारिए,हमें पूर्ण रूप से पवित्र कर हमारा कल्याण करें।”

अपने देश में गंगा जी के महत्व, गंगा जी का अवतरण कैसे हुआ, गंगा जी अपनी धाराओं से जगत का कितना कल्याण करती है, इससे संपूर्ण जगत परिचित है।

गंगा जी के महत्व को समझने के लिए, आज वैज्ञानिक पद्धति क्या कहता है एक बार इसके ऊपर भी रोशनी डालना चाहिए। भौतिक युग कहता है –
“नदियां सिर्फ और सिर्फ नदी है, यह नदीयां अपने आप से प्रकट हुआ है। जगत को किसी परमेश्वर ने नहीं रचा , यह प्रकृति में अपने आप से ही निर्माण हो गया है।”

अब हम इस आधार पर चिंतन करें। इस संपूर्ण धरती पर मीठा पानी कितना है, मीठे पानी के बगैर, हम सभी का अस्तित्व कब तक रहेगा। जो जन्म देती है वही माता कहलाती है और वही माता है। भारतीय सनातन संस्कृति उसी माता को माता तो मानता है, माता से कहीं गुना बढ़कर पतित पावनी जगत माता मानता है।

भविष्य में यदि श्री गंगा जी का प्रवाह रुक जाए तो समाज वहां तक सोच नहीं सकता, की मानव के साथ क्या क्या होगा। किसी को पूजने का अर्थ दुनिया यही निकालता है, कि वह अंधविश्वासी है, परंतु उस अंधविश्वास के अंदर पूज्य देवता का सम्मान नहीं दिखता। इसमें देवता को मानने के लिए कोई बाध्य नहीं करता, ऐसा भी नहीं , कि कहने वाला व्यक्ति एक ही हो और आगे कोई हो नहीं सकता।

क्या परमेश्वर किसी का गुलाम हो सकता है, की दूसरी बार वह अपने लिए दूसरा दूत पैदा नहीं करेंगा। परमेश्वर सबका बराबर है, जो उस परमेश्वर को स्वीकार कर लेता है, परमेश्वर उसे स्वीकार कर लेता है, और यह परमेश्वर की ही लीला है की वह अपने भक्तों को भी अपने सदृश्य बना लेता है।

हां आज दुख के साथ कहना पड़ता है, कि भारतीय संस्कृति में भी कुछ ऐसे तत्व हैं, जो श्री गंगा को गंगा तो कहते हैं, परंतु गंगा जी का सम्मान नहीं करते। कहते हैं “गीता, गंगा ,तुलसी , श्री विष्णु, गायत्री” यह सभी अपने नाम से पवित्र हैं। इनके स्मरण मात्र से व्यक्ति पवित्र हो जाता है।

श्री गंगा जी के बारे में जितना भी कहा जाए वह कम है। श्री गंगा सिर्फ हमारे पूर्वजों की माता नहीं है, वे तो आज भी सबकी माता है। वे अपने शरण में आने वाले का, दोष ना देखते हुए, उसे पवित्र करती हैं साथ में वे अपने शुद्ध जल से, हम संपूर्ण मानव सभ्यता का भरण पोषण कर रही हैं।

श्री गंगा जी के बिना हम सबका कोई अस्तित्व नहीं, श्री गंगा वह हैं जो सूर्य की भांति योग और कुयोग दोनों को समान रूप से सबके ऊपर कृपा करती हैं। आज के  इसी श्री गंगा में हमारे पूर्वजों ने कभी डुबकी लगाया, अपने मोक्ष की कामना की, आज हम भी उसी श्री गंगा जी में डुबकी लगाते हैं, और अपने मोक्ष की कामना करते हैं।


मेरे शब्द श्री गंगा मां को समर्पित हैं, और मैं श्री गंगा जी से प्रार्थना करता हूं “हे माता, हे जगत कल्याणी, मैं आपको दसों दिशाओं से, दसों दिशाओं में कोटि कोटि प्रणाम करता हूं ‌। आज तक आपने हमारे करोड़ पूर्वजों का कल्याण किया, हे माता आप से ही हम हैं, आपके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। हे माता हमने आपका वास्तविक रूप नहीं देखा, परंतु आपके कल्याण को देखा है। आपने अपने भक्तों का कल्याण किया है, आपने अपने अभक्तों का भी कल्याण किया है। हे माता आपकी कृपा सदैव यूं ही समस्त संसार के ऊपर बरसती रहे। हम आप श्री माता को बारंबार फिर से नमन करते हैं।”

कोई कहता है परमेश्वर कहां है? वास्तव में परमेश्वर कहां नहीं है। जिसके ऊपर हमारा अस्तित्व है वही परमेश्वर है। यह सब किसी को पता है “पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश” इसके बिना हम अपनी कल्पना नहीं कर सकते।
और भारतीय सनातन वेद साहित्य यही बार-बार कहता है, इनके पीछे जो शक्तियां हैं, वह शक्तियां उस परमेश्वर की हीं शक्ति है, जिसका वास्तविक रूप किसी को पता नहीं ।सनातन पद्धति मैं परमेश्वर की स्वीकार्यता अपने इच्छा के ऊपर है। दुनिया में किसी को परमेश्वर का जादू ना दिखता हो, परंतु सनातनी को दिखता है।

एक सनातनी अपने गुरु, पूर्वज, अन्य देवी देवता, प्रकृति जहां कहीं भी, परमेश्वर का चमत्कार देखता है, उसी को उस परम शक्ति परमेश्वर का स्वरूप मानता है जो परमेश्वर सब क्रियाएं करते हुए, किसी के सामने नहीं आता। वास्तव में श्री गंगा जी अपने आचरण से पूजी जाती है।

सनातन पद्धति में 33 करोड़ देवी देवता अपने आचरण से ही पूजे जाते हैं। सनातन को खत्म करने के लिए अनेकों बार कोशिश किया गया, फिर भी सनातन खड़ा रहा। इसका मूल कारण, यहां पर वास्तविकता है। कहते हैं वास्तविकता कभी नहीं बदलता, वास्तविक तो अपने आप में ही वास्तविक है।

असत्य हमेशा ही सत्य को झूठलाना चाहता है, परंतु अनेक प्रकार के बाद भी असत्य असत्य ही रहता है, वह कभी भी सत्य का जगह नहीं लेता है। जगत में श्री गंगा जी की महिमा अपरंपार है। श्री गंगा जी मानवों के लिए सदैव से जीवनदायिनी है, और यह सभीं को मान्य होगा। श्री गंगा जी की लहरें यूं हीं सदैव संपूर्ण जगत का कल्याण करती रहें।

  

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