गर्म लोहे पर ठंडा हथौड़ा

“मनुष्य को ठंडा रहना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए. लोहा भले ही गर्म हो जाए, हथौड़े को तो ठंडा ही रहना चाहिए अन्यथा वह स्वयं अपना हत्था जला डालेगा। कोई भी राज्य प्रजा पर कितना ही गर्म क्यों न हो जाये, अंत में तो उसे ठंडा होना हीं पड़ेगा।”
विचार- श्री सरदार वल्लभभाई पटेल

Sardar Vallabh Bhai Patel


लोहे से लोहे को चपटा किया जाता है अथवा आकार दिया जाता है। परंतु एक को गर्म और एक को ठंडा रहना पड़ता है। श्री वल्लभभाई पटेल अपने निश्चय और कार्य कुशलता को लेकर जाने जाते हैं। समाज में उन्हें लौह पुरुष भी कहा जाता है। अर्थात लोहे से बना हुआ इंसान। 

यह वाक्य बोलकर उन्होंने साबित किया कि वह अंदर से कितना नरम और बाहर से कितना कठोर रहे होंगे। किसी दूसरे के फैसलों ने उन्हें कभी विचलित नहीं किया। वे यह शब्द का कर यह भी कह रहे हैं कि आपको भी विचलित नहीं होना है।

लोहा गरम होता है होने दो! वह जितना गर्म रहेगा उतना वह नरम भी रहेगा। कहते हैं सिद्ध पुरुषों की वाणी अमृत के समान है और वह जीवन की मार्ग को नई दिशा प्रदान करता है।  शायद सरदार साहब नहीं होते तो आज हिंदुस्तान की दशा कुछ और होता। उन्होंने अपने आचार व्यवहार से लोगों के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने को झुकाया परंतु अपने फैसलों को बदला नहीं।

कहते हैं वीर वह नहीं होता जो कायर पर वार करें। इंसान के अंदर शक्ति और वीरता तो उसे दृढ़ता प्रदान करता है। हमारा अध्यात्म शास्त्र कहता है की वीरता सामर्थ्य के साथ-साथ सहनशीलता भी प्रदान करता है। यहां पर वीरता की परिभाषा व्यक्त किया जा सकता है। संक्षेप में वीरता वह नहीं होता जो किसी पर अत्याचार किया जाए। अत्याचार क्रूरता का दूसरा नाम है।

पटेल साहब कितने सरल तरीके से कहते हैं – मनुष्य को ठंडा रहना चाहिए। यदि वह क्रोध करेगा तो लोहे के भांति के गर्म हो जाएगा। क्योंकि वास्तव में लोहा जब गर्म होता है तभी नरम होता है। यदि लोहे को एक रूप देना है तो हथौड़े को ठंडा रहना पड़ेगा। यदि वह हथौड़ा लोहे की तरह गर्म हो गया तो हाथ जल जाएगा।

“अर्थात सरदार साहब कहते हैं कि सामने वाला अपने आप में जल रहा होता है गुस्से में।  तुम भी यदि गुस्सा हो गए तो उसके साथ तुम भी जलने लगोगे अथवा जल जाओगे। अब यह सोचो कि तुम्हारे लिए क्या उचित है। तुम तो सदैव फायदे की बात सोचते हो। गर्म लोहे पर ठंडा हथौड़ा हीं कारगर होता है। फायदे के चक्कर में स्वयं से स्वयं का क्यों नुकसान करते हो।

यह भी सबको पता है गुस्सा बुद्धि को खो जाता है। दोष युक्त बुद्धि वर्तमान और भविष्य दोनों को खा जाता है। अपने भविष्य को बनाने की चेष्टा तो बहुत करते हो। साथ में यदि अपने बुद्धि के द्वारा कुछ गलत न हो जाए इसकी भी चेष्टा करो तो कितना उत्तम होगा।”

वे कहते हैं राज्य प्रजा के ऊपर कितना भी गर्म हो जाए उसे ठंडा होना पड़ेगा। क्योंकि प्रजा से हीं राज्य बनता है नहीं तो बिना प्रजा के राज्य का कोई अस्तित्व नहीं। सिद्ध पुरुषों की वाणी वह अमृत है जो पान करें वह अमर हो जाए। संसार में ज्ञानी तो बहुत हुई परंतु आत्मज्ञानी कोई कोई होता है। आत्मज्ञानी होने के लिए अनेंक महापुरुषों ने अपने जीवन की एक-एक खुशियों को त्याग दिया। जिनके अंदर वह आत्मज्ञान फूटा वे सदैव के लिए अमर हो गए।

श्रीमद् भागवत गीता में भी यही कहा गया है। शरीर की इंद्री बुद्धि को वश में करके अपनें अनुसार से स्वैच्छिक कार्य कोकरवा लेती। जिसका परिणाम जीव को अनंत समय तक दुःख उठाना पड़ता है। वैसे वास्तव में कोई दुःख  नहीं चाहता फिर भी वह अनचाहे में दुःख को निमंत्रण दे बैठता है। जब दुःख उसके पास चलकर आता है तो वह समझ नहीं पता वह दुःख कैसे आ गया। जबकि वह गहन विचार करें तो उसे पता चलेगा। उसके पास दुःख के आने का सबसे बड़ा जिम्मेवार स्वयं वही है।

इंसान ना चाहते हुए भी क्रोध और चाहत में बहुत कुछ ऐसा कर जाता है जो वह उसे नहीं करना चाहिए। आगे चलकर क्रोध और चाहत उसके पास अनेकों प्रकार के दुःखों को लेकर आता है। जिसके बाद इंसान को दुःखों को झेलने के अलावा कोई उपाय नहीं होता।

किसी महात्मा ने सत्य कहा है – वर्तमान अतीत का परिणाम है। वर्तमान कोई बना नहीं सकता। हां वर्तमान में अच्छा करेगा तो वह भविष्य निश्चित तौर पर अच्छा बन सकता है। अर्थात एक प्रकार से वर्तमान के परिश्रम का फल भविष्य है। भविष्य को भविष्य में जीया जा सकता है परंतु वर्तमान में नहीं जीया जा सकता।

इसलिए सदैव इंसान को यह कोशिश करनी चाहिए की वह अपने क्रोध को संयमित रखे। क्योंकि यह सत्य है क्रोध पहले उसी का नुक़सान करने वाला है। इंसान सदैव सामने वाले को गरम लोहा समझे और अपने आप को हथौड़े वाला लोहा।

 

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